महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय : अपने ही घर में बेगाने हुए प्रेमचंद, अमरकांत, नामवर सिंह

हिंदी विश्वविद्यालय इस समय ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां प्रेमचंद की जयंती पर महज अभिवादन से काम चला लिया गया। इतना ही नहीं, आलोचक नामवर सिंह और कथाकार अमरकांत की तो सुध भी नहीं ली गई, जबकि इसी परिसर में व्यास पूजा और विशेष राजनीतिक छात्र दलों के आयोजनों में कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा शिरकत कर रही हैं।

बात हिंदी विश्वविद्यालय की है-देश के एकमात्र अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की। महाराष्ट्र के वर्धा में बसा यह परिसर महात्मा गांधी को समर्पित है। यह अलग बात है कि परिसर में विनायक दामोदर सावरकर संकुल और आरएसएस की महिला कार्यकर्ता लक्ष्मीबाई केलकर के नाम पर छात्रावास बन चुका है।

हिंदी विश्वविद्यालय में पिछले पांच-छह सालों से ऐसा कुछ घटित हो रहा है, जिससे साफ कहा जा सकता है कि यहां पठन-पाठन के अलावा सब कुछ हो रहा है। विभाग दस-दस साल पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। प्रयोगशालाओं में संसाधनों की कमी है, मगर सरकारी कार्यक्रमों के लिए शासन-प्रशासन के पास पूरा बजट है। दिन भर फाइलों में कौन-सा काम होता है, यह प्रशासन ही जाने। मुट्ठी भर विद्यार्थी हैं, और उसमें भी प्रशासनिक कार्य प्रबंधन ठीक नहीं। कुछ विभाग तो ऐसे हैं, जहां शिक्षक हैं, मगर छात्र एक भी नहीं। खुली प्रवेश प्रक्रिया का निर्देश जारी करना पड़ रहा है इस विश्वविद्यालय को। आखिर यह साख इतनी गिर कैसे गई? जिन उद्देश्यों के लिए यह विश्वविद्यालय स्थापित हुआ था, वह उनसे एकदम विमुख हो चुका है।

हाल ही में अमरकांत और नामवर सिंह की सौवीं जयंती पूरे देश में मनाई गई। प्रेमचंद की जयंती भी हाल ही में बीती। ऐसे में हिंदी विश्वविद्यालय को तो कोई बड़ा उत्सव या सम्मेलन आयोजित करना चाहिए था, मगर विभाग से लेकर परिसर तक खंडहर-सी शांति छाई रही। जैसी देखी गति, वैसी बदली मति के सिद्धांत का अनुसरण करते हुए प्रगतिवादी लोग गतिवादी हो चुके हैं।

यह संस्थान ऐसी जगह पर स्थित है, जहां की आबोहवा में सुखद और शीतल ताजगी का एहसास होता है। यह जगह इतनी रचनात्मक है कि लोग रचने और लिखने के लिए विवश हो जाएं। शायद यही कारण था कि इस विश्वविद्यालय ने आवासीय लेखक जैसी परंपरा को स्थापित किया, जहां साल भर के लिए देश के बड़े साहित्यकार इसी परिसर में रहकर लिखते और विद्यार्थियों से मिलते थे।

हबीब तनवीर, संजीव, जैनेन्द्र कुमार, आलोक धन्वा जैसे साहित्यकार यहां रहकर रचते, बुनते, और गुनते रहे। मगर अब कुछ नहीं बचा। विद्यार्थी ठीक से जानते तक नहीं कि उनके समय का आवासीय लेखक कौन है। जिसे कोई नहीं जानता और न ही जानने-समझने में कोई रुचि रखता है, उसे जबरन थोपा जा रहा है, और जिसे दुनिया जानती है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिचित कराना आवश्यक है, उसे बेगाना कर दिया गया है।

जब देश के छोटे-छोटे स्कूलों में भी प्रेमचंद की जयंतियां मनाई जा रही हैं, ऐसे में कुलपति कुमुद शर्मा और हिंदी साहित्य विभाग के प्रोफेसर जयंती को इतने चुपके से मना रहे हैं कि कहीं प्रेमचंद के पात्र बाहर निकलकर आंदोलन न छेड़ दें या अपने हक और अधिकारों की बात न करने लगें। जिस अमरकांत को देश के बड़े साहित्यिक मंचों और शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा याद किया जा रहा है, वहां साहित्यिक पृष्ठभूमि से आने वाली कुलपति द्वारा उनकी अनदेखी किस बात का संकेत देती है?

कथाकार अमरकांत से तो प्रो. कुमुद शर्मा का पारिवारिक संबंध भी है। इतना ही नहीं, साहित्य के महान आलोचक नामवर सिंह, जो स्वयं इस विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रहे, उन्हें भूल जाना? आखिर इतनी बड़ी साहित्यकार कुलपति के हाथ किसने बांध दिए?

हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति बनकर आने से पहले छात्रों में इस बात की खुसफुसाहट थी कि शायद विश्वविद्यालय की तकदीर संवरेगी। हालांकि, प्रो. कुमुद शर्मा अपने वक्तव्यों में यह कहती रहती हैं कि वे इस विश्वविद्यालय को समझने में थोड़ा समय चाहती हैं। यह भी ठीक है कि ‘धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय’ के सिद्धांत पर चलना चाहिए, मगर मन को एक विचार और एजेंडे की ओर झुका लेना, यह कैसा समझना?

विद्या परिषद के चुनाव में, बिना छात्रों की मंजूरी और सहभागिता के ही विद्यार्थी परिषद से जुड़े दो विद्यार्थियों को प्रतिनिधि चुन लिया जाना, वह भी एक लोकतांत्रिक संस्था में। यह कैसा समझना और जानना किसी संस्था को? व्यास पूजा जैसे कार्यक्रमों में कुलपति का सम्मिलित होना या ऐसे आयोजनों को कराने के लिए हामी भरना, क्या हिंदी विश्वविद्यालय में समावेशी और साहित्यिक अस्मिता का वातावरण पनपने देगा?

अशोक बाजपेई, जी. गोपीनाथन, विभूति नारायण राय, और गिरीश्वर मिश्र जैसे विद्वानों ने अपने-अपने समय में हिंदी को वैश्विक पटल पर आंदोलित किया। विद्यार्थियों का लगातार मोहभंग, संसाधनों की कमी, रैंकिंग में गिरावट-अब जब ऐसे समय में कोई हिंदी की विदुषी महिला कुलपति बनी हैं, तो अपेक्षाएं और शिकायतें बढ़ेंगी ही। यह शिकायत जायज भी है, जिस पर अमल किया जाना जरूरी है। क्योंकि अगर समय रहते अमल न किया गया, तो कहीं ऐसा दिन न आ जाए, जब हिंदी विश्वविद्यालय को महज दूर शिक्षा केंद्र की तरह प्रयोग में लाया जाए। इस परिसर में बच्चों का चहचहाना जरूरी है। हिंदी और अन्य भाषाएं हमेशा चहकते हुए एक-दूसरे को गले लगाती दिखें, ऐसी हम सबकी तमन्ना है।

(विवेक रंजन सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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