भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने का प्रस्ताव आज़ादी के आंदोलन का अपमान है। हमारे देश की आज़ादी का आंदोलन जिन महान व्यक्तियों ने प्रारंभ किया था उनमें मौलाना बरकतउल्ला का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। मौलाना उन लोगों में से थे जिन्होंने महात्मा गांधी से पहले आज़ादी के आंदोलन की शुरूआत की थी। उन्होंने आंदोलन का झंडा दुनिया के अनेक देशों में लहराया।
भारत की आज़ादी की आवाज सारी दुनिया में बुलंद हो इसलिए उन्होंने राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में निर्वासित भारत सरकार का गठन किया। इस सरकार के मुखिया महेन्द्र प्रताप सिंह थे और वे स्वयं उसके प्रधानमंत्री बने। आज़ादी का संदेश सभी देशों में पहुंचे इसलिए उन्होंने अनेक भाषायें सीखीं। इस उद्देश्य से उन्होंने बम्बई के अलावा लंदन में भी कई भाषाएं सीखीं।
प्रथम महायुद्ध के दौरान मौलाना अपने सहयोगियों के साथ जर्मनी गये और उस देश से आजादी की लड़ाई में सहयोग मांगा। इस दरम्यान उनका संपर्क लाला हरदयाल द्वारा गठित गदर पार्टी से हुआ। गदर पार्टी हथियारबंद क्रांति में विश्वास करती थी। उन्होंने अपनी अंतरिम सरकार जिसका गठन 1915 में किया गया था, का मुख्यालय काबुल रखा। उसके लगभग चार वर्ष बाद यह सरकार मास्को चली गई। वहां उनकी मुलाकात सोवियत क्रांति के महान नेता लेनिन से हुई।
इस मुलाकात के याद स्वरूप मास्को में उनका एक स्मारक बना हुआ है। बताते हैं, मुलाक़ात के दौरान मौलाना ने लेनिन से कहा कि इस्लाम व कम्युनिजम में कोई अंतर नहीं है तो लेनिन ने सुझाव दिया कि वे यह संदेश सोवियत संघ के उन क्षेत्रों में जाकर दें जहां इस्लाम के मानने वाले रहते हैं।
प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की जीत के बाद अंतरिम सरकार की गतिविधियां कम हो गई, फिर भी मौलाना ने अपना प्रचार कार्य जारी रखा। वे इस उद्देश्य से बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, फ्रांस आदि देशों की यात्रा करते रहे। इस दरम्यान उन्होंने अन्य गुलाम देशों में जारी आज़ादी के आंदोलनों से संपर्क स्थापित किया। इस तरह मौलाना की प्रतिष्ठा दुनिया में एक जाने-माने क्रांतिकारी बतौर फैलती रही। अपने गिरते हुए स्वास्थ्य के बाद भी वे कैलिफोर्निया गये जहां गदर पार्टी का एक सम्मेलन आयोजित था।
अमरीका में उन्होंने अंतिम सांस ली। आज इस बात की आवश्यकता है कि मौलाना की याद में एक स्मारक बने। ऐसा करने के स्थान पर उनके नाम से बने विश्वविद्यालय का नाम बदला जा रहा है। यह कृत्य भारत के आज़ादी के आंदोलन का अपमान है। उम्मीद है कि भोपाल के लोग ऐसा नहीं होने देंगे।