रिश्ता ही कुछ ऐसा है

हायरार्की और अनुशासन वाले रिश्तों की तो छोड़िए आधुनिक और लोकतांत्रिक समझ पर आधारित रिश्तों में भी बराबरी की तलाश अक्सर आपको कहीं का नहीं रहने देती। पिता-पुत्र, सास-बहू और पति-पत्नी जैसे पारंपरिक रिश्तों में सत्ता का समीकरण इतना पुराना, इतना स्पष्ट और इतना सख्त है कि सवाल और संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं होती। किसे आदेश देना है और किसे उसका पालन करना है यह पहले से तय है।

इन तय खांचों में जो भी लचीलापन दिखता है, जो भी थोड़ी-बहुत ढील नजर आती है कभी-कभार वह एक पक्ष की उदारता होती है और दूसरे पक्ष की खुशकिस्मती। रिश्तों के इन पारंपरिक खांचों की बनावट पर एतराज करना, उसे ज्यादा सम्मानजनक, ज्यादा गरिमापूर्ण बनाने का आग्रह रखना, उसमें बराबरी की भावना के लिए गुंजाइश बनाने की जिद ठानना आज भी खतरनाक है। हमारी सदियों पुरानी पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था इस तरह की जिद से खतरे में आ जाती है। संस्कृति के रक्षकों की भवें तन जाती हैं।

मगर इन पारंपरिक खांचों से अलग, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक भावनाओं पर आधारित रिश्तों की बात करें तो वहां भी यही दोषपूर्ण दृष्टि काबिज दिखती है। बराबरी की बातें वहां बहुत होती हैं, बल्कि अक्सर रिश्ते का ताकतवर सिरा कमजोर सिरे को अपना सब कुछ बताता नजर आता है। कुछ वैसे ही जैसे अपने यहां पति लोग खुद को पत्नियों का सताया हुआ बताकर पुलकित महसूस करते हैं। यह अलग बात है कि असलियत सभी पक्षों को उस हंसी-मजाक के दौरान भी अच्छे से पता होती है।

खैर यहां बात वोटर और लीडर के रिश्तों की हो रही है। सार्वजनिक मंचों से जरूर वोटर को सर्वशक्तिमान, अपना भगवान तक घोषित किया जाता है, लेकिन सचाई से कहने वाला ही नहीं, सुनने वाला भी पूरी तरह वाकिफ होता है। यह ठीक है कि संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था ने लीडर बिरादरी की सारी सत्ता, उसके सारे वैभव की कुंजी वोटर के हाथों में दे रखी है, वोट के अधिकार के रूप में।

लेकिन इस कुंजी का अपने हिसाब से इस्तेमाल करने के सौ-सौ तरीके लीडर बिरादरी ने कंठस्थ कर रखे हैं। यही नहीं, वह नए-नए तरीके खोजने और विकसित करने में भी लगातार लगी रहती है।

इस सबके बावजूद कभी-कभी बराबरी की चाहत जनता के किसी न किसी हिस्से को सत्ता के सामने ला खड़ा करती है। वह सत्ता को जवाबदेह बनाने की कवायद में पूरी शिद्दत से जुटती है। वैसे ही जैसे पिछले दिनों जेन ज़ी के युवा जंतर मंतर पर जुटे थे। लेकिन अंजाम क्या होता है? आप इस्तीफे पर न जाएं। वह भी हो जाता है कभी-कभी।

लेकिन रिश्तों का असली चरित्र दिखता है दोनों पक्षों की एक-दूसरे से अपेक्षा में, उनकी एक-दूसरे से शिकायतों में। यहां एक तरफ लड़के-लड़कियां अपने फूटे सिर, फटे कपड़ों और बदन में घुसी पैलेट गन की गोलियों के साथ विस्मय भरी क्षुब्ध दृष्टि से सत्ता को देख रहे थे कि तुमने हमारा क्या हाल किया, लेकिन सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति की सबसे बड़ी तकलीफ यह थी कि उसे जंतर मंतर पर पहुंचे कुछ ‘लड़कों ने ही नहीं, लड़कियों ने भी गालियां दीं’। 

अपनी उस तकलीफ के आगे उसे सब कुछ फीका लग रहा था। इतना कि अपनी महानता और उदारता का सबसे बड़ा सबूत पेश करते हुए भी वह यही कह सका कि ‘मैं इन बच्चों को माफ करना चाहता हूं।‘ सत्ता की ताकत के बेहूदा इस्तेमाल का सवाल उसे छू तक न सका। फिर सत्ता की जवाबदेही तय करने की बात ही कहां उठती है।

(रेखाचित्र प्रतीकात्मक : एआई की मदद से)

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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