सतीश गुजराल : राजनीतिक त्रासदी और जीवन की उम्मीदों का चित्रकार

राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, दिल्ली में चित्रकार सतीश गुजराल की जन्मशती पर उनके चित्रों की प्रदर्शनी चल रही है। 15 जनवरी, 2026 से शुरू हुई उनकी यह प्रदर्शनी 30 मार्च, 2026 तक चलेगी। सतीश गुजराल 1960-70 के दशक में उभरकर आने वाले कलाकार हैं जिन्होंने भारतीय चित्रकला में दखल दिया और अपनी अलग पहचान बनाई।

सतीश गुजराल का परिवार भारतीय राजनीति का हिस्सा रहा है। उनके पिता और भाई राजनीति में सक्रिय रहे। भाई इंद्र कुमार गुजराल थोड़े समय के लिए भारत के प्रधानमंत्री भी रहे। सतीश गुजराल का पैतृक घर भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के समय झेलम में था। महज आठ साल की उम्र में एक पहाड़ी से गिरने के दौरान उन्हें गहरी चोट आई और वह हमेशा के लिए बहरे हो गये। जीवन के हरेक धड़कन का सुनाई देना बंद हो गया। सबकुछ सन्नाटा और मूक दृश्य में बदल गया।

22 साल की उम्र में उन्होंने बंटवारा देखा और उन्हें अपने घर से उजड़ जाना पड़ा। वह सड़क के रास्ते बाघा बार्डर पार करते हुए भारत आये। बंटवारे से उपजी भयावह हिंसा को वह प्रत्यक्ष देखते हुए आए जिसकी छाप उन पर गहरे बनी रही। जीवन थकान और उदासी से भरी हुई दिखाई दे रही थी।

उनके सामने एक बार फिर यही दृश्य आपात्काल के दौरान राजनीतिक उथल-पुथल, तानाशाही और हिंसा में दिखाई दिया। यह 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और सिख समुदाय के नरसंहार में बदल गया। सतीश गुजराल पर इसका काफी असर था और उसे अपनी चित्रकला का हिस्सा बनाया।

सतीश गुजराल की चित्रकला में प्रेम और जीवन का चित्रण प्रतीक-चिन्हों और सीधी रेखाओं में ढलकर आया है। घोड़े का चित्रण उर्जा से भरा एक अवगुंठित रूप लिए सामने आता है। 1980 के दशक में उनका पोलिटिकल आर्ट जले हुए काठ के बीच रह गई अधजली लकड़ियों के रंग में दिखाई देता है। इसके बाद के समय में वह म्यूरल और अन्य विधा पर काम करने लगे थे।

1990 के दशक में उनका झुकाव रेखाओं से चिंतन को प्रदर्शित करने वाले रूप की ओर झुका हुआ दिखा दिखता है। यह बहुत कुछ रजा के चित्रों की तरह भी दिखता है। उनके म्यूरल रचनाओं में इसका असर साफ दिखता है।

सतीश गुजराल के चित्रों से मेरा साबका इलाहाबाद में हुआ था। एक पत्रिका में उनकी पेंटिग्स छपी थी। चित्र में भेड़ का चित्रण, खासकर उसके चेहरा और आंख का मनोभाव इंसान की तरह प्यार में डूबा हुआ लेकिन आंख में उदासी लिए हुए है। उस पत्रिका में इस शृंखला के कई चित्र थे जिसमें भेड़ की उपस्थिति कई में थी। मेरे मन में पहला सवाल यही आया: ‘इंसान की जगह भेड़ क्यों?’ संयोग से जिससे इस चित्र के बारे में बात हुई, वह सतीश गुजराल के बारे में जानते थे।

उन्होंने बताया कि पेंटिग्स में भी बिम्ब की अवधारणा होती है। सतीश गुजराल को कान से सुनाई नहीं देता है। उन्होंने इस भेड़ को एक प्रतीक की तरह चुना है। यद्यपि भेड़ें बहरी नहीं होती, लेकिन उन्हें लोकप्रिय कथानकों में ऐसे ही देखा जाता है। सतीश गुजराल से यह मेरा पहला परिचय था। बाद में, सतीश गुजराल के चित्रों में घोड़े की उपस्थिति उर्जा और कोमल स्पर्श के साथ देखना एक अलग तरह का अनुभव था।

सतीश गुजराल की आधुनिक राष्ट्रीय कला संग्रहालय में चल रही प्रदर्शनी उनकी पेंटिग्स की मुकम्मल प्रदर्शनी है। क्यूरेटर ने कई कथानकों के सहारे उनके चित्रों को देखना आसान बना दिया है। देश बंटवारे से उजाड़ और रूदन का चित्रण उस विभीषिका से उपजी हिंसा में आम लोगों की गहरी हताशा को महिलाओं के रुदन और तबाहियों से उजड़े परिवारों में दिखता है। वृत्ताकार रेखाओं में गहरा रंग किसी की भी भावनाओं को झिंझोड़ देता है।

सतीश गुजराल का जीवन भारतीय राजनीति के अभिजन समूहों और शासक वर्ग के बीच गुजरा था। लेकिन, उनकी राजनीति को विषय बनाकर बनाई गई पेंटिग्स और अन्य रचनाएं अपने समय पर गहरी टिप्पणी है और एक भविष्यवाणी भी है। पेड़ के तने का बाहर और भीतर गहरे जल जाना, उसमें से रूपों का बनना, अधजली लकड़ियों का नया रंग ग्रहण करना एक गहरे संकट और थोड़ी सी उम्मीद को दिखाता है। उनकी इस श्रृंखला में जला हुआ काला रंग अपना प्रभाव देर तक बनाये रखता है।

सतीश गुजराल के चित्रों की यह प्रदर्शनी उनके समकालीनों के चित्रों के साथ रखकर देखने से अपने समय का वह मनोभाव भी देखा जा सकता है जो भारत का समकालीन आधुनिक चित्रकला का इतिहास बनाता है। सतीश गुजराल के चित्र जीवन के संकट, राजनीति की महत्वाकांक्षा और त्रासदी, तानाशाही और उससे उपजी हिंसा, आमूल संकट को अपने तरीके से सामने लाते हैं।

उनके बाद के चित्र आत्मिक तलाश में बदलते हुए दिखते हैं जो उन्हें रहस्यवादी और विचित्र रेखाओं में ले जाकर उलझा देते हैं। पेंटिग्स में रूचि रखने वाले लोगों को जरूर ही यह प्रदर्शनी देखनी चाहिए।

(अंजनी कुमार लेखक और पत्रकार हैं और कला, पुरातत्व, राजनीति समेत विभिन्न विषयों पर लिखते हैं।)

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