प्यार में शाहीन बाग: प्रतिरोध की ज़मीन पर उगते प्रेम के फूल 

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इंकलाब प्रेम की आखिरी मंज़िल है। प्रतिरोध के पत्थर पर ही मुहब्बत के फूल खिलते रहे हैं। ‘प्यार में शाहीन बाग’ एक ऐसी ही कहानी है, जो खुद में सब कुछ समेटे है। अल्पसंख्यकों के हक़ के सवाल, ध्रुवीकरण की तीखी रेखाएं और इस बीच आम आदमी का जीवन, जो इन सब से प्रभावित होता है। शाहीन बाग की पहचान नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में महिलाओं के आंदोलन की है। विरोध के इसी स्वर में प्रेम के गीत किस तरह मिल जाते हैं। किस तरह नफरत पर इंसानी प्रेम भारी पड़ता है। उपन्यास के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार राठौर विचित्रमणि सिंह से जनचौक की कंट्रीब्यूटिंग एडिटर अल्पयू सिंह की लंबी बातचीत का संपादित अंश:

सवाल: कोई भी लेखक क्यों लिखता है और आपको ऐसा क्यों लगा कि आपको लिखना चाहिए?

जवाब: एक पुराना गीत है, जाना था जापान पहुंच गए चीन, मेरे साथ यही हुआ। मैं राजनीतिक-सामाजिक सवालों पर लिखने वाला पत्रकार हूं और जब इस देश में ये माना जा रहा था कि नेहरू नहीं पटेल महान हैं और पटेल का हक़ मारकर नेहरू को पीएम बनाया गया। उस दौर में मुझे लगा कि नेहरू और पटेल के संबंधों पर एक किताब लिखूं। आलेख तो अखबारों में बहुत लिखे हैं। लेकिन कोई किताब नहीं लिखी थी, इसलिए मैंने तीनमूर्ति लाइब्रेरी की सदस्यता ली और मैं रोज़ वहां जाता था। पढ़ने की कोशिश करता था नेहरू और पटेल के बीच के अर्तसंबंधों के, उनके द्वंद के, उनके बीच की समझदारी को, उनके बीच के मतभेद को समझने की कोशिश की।

ये काम चल ही रहा था कि उस बीच शाहीन बाग का आंदोलन शुरू हो गया। शाहीन बाग आंदोलन शुरू हुआ तो एक बात शुरू हुई कि ये आंदोलन आखिरकार क्यों हो रहा है? उस वक्त ज्यादातर लोगों ने ये कहा था कि इसकी वजह से ट्रैफिक जाम होता है। मेरा मानना है कि सरकार कहती है कि एनआरसी और सीएए दोनों सही हैं। लेकिन अगर समाज के एक वर्ग के मन में एक किसी बात को लेकर आशंका है तो उसका भी उन्मूलन भी होना ज़रूरी है। लोगों के इस शक को दूर करना सरकार का काम है, अगर उनकी आशंका को दूर नहीं किया गया तो लोग सड़क पर बैठेंगे। सड़क पर कोई आंदोलन पहली बार तो हो नहीं रहा था।

प्यार में शाहीन बाग

अगर हमें लगता है कि ये ट्रैफिक जाम का मसला है तो उनके लिए यह जीवन मरण का सवाल था, क्योंकि हमने इस उपन्यास में भी इसका जिक्र किया है, एक शख्स दूसरे शख्स को कहानी सुनाता है और कह रहा है कि एक जंगल में एक खरगोश भाग रहा था तभी उस पर एक चीते की नज़र पड़ी। खरगोश के पीछे चीता भी दौड़ा। लेकिन खरगोश कहीं जाकर छुप गया और चीते की पकड़ में नहीं आया।

चीते के एक मुंहलगे जीव ने चुटकी लेते हुए कहा कि, सबसे तेज़ बनते हो, लेकिन खरगोश का बच्चा भाग गया। तो चीते ने इस पर सारगर्भित बात कही, कि मेरे लिए दौड़ना तो एक वक्त की रोटी जुटाना था, उसके लिए दौड़ना अपने अस्तित्व को बचाना था। तो हमारे लिए शाहीन बाग 5-10 मिनट वक्त बिताने का है लेकिन उनके लिए उनकी आशंकाओं से बचने का है। इसी तरह जब शाहीन बाग को मैं उस वक्त देखता था कि कैसे शाहीन बाग इस देश में राजनीतिक विमर्श का प्रश्न बन गया था। वो राष्ट्रद्रोह या गद्दारी के समानान्तर सवालों का मंच बन गया था। तो दिमाग में कई तरह के सवाल आते थे

सवाल: प्यार में शाहीन बाग ने कैसे जन्म लिया?

जवाब: जब इतना सब कुछ चल रहा था तो ज़ेहन में हमेशा ये सवाल आता था कि ये शाहीन बाग उपजता क्यों है? विचार मंथन चलता रहा, इस देश में 85 फीसदी हिंदू हैं और 14 फीसदी मुसलमान हैं। देश भर में तकरीबन 6 लाख गांव हैं और हर गांव में हिंदू और मुसलमान हैं। आप प्रशासन के बल पर या एक वर्ग को सरंक्षण देने की राजनीति अपनाते हैं तो सबकी रक्षा तो नहीं की जा सकती। इस देश की नियति है कि बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों को सह अस्तित्व में ही रहना होगा। ये उपन्यास सह-अस्तित्व को एक नया विस्तार देता है। इस उपन्यास के मुख्य पात्र हिमांशु और सोफिया दोनों धर्म के सताए हुए हैं। दोनों की अपनी अपनी पीड़ा है। इस पीड़ा से निकलने के लिए उन्हें रास्ता नहीं दिख रहा है। और वो रास्ता कौन दिखाता है, वो रास्ता गांधी दिखाते हैं।

एक जगह सोफिया और हिमांशु में बातचीत के हिस्से से ही आप गांधीवाद की गहराई समझ सकते हैं। सोफिया हिमांशु से किसी रास्ते से बचने को कहती है, वो कहती है कि वहां से मत आना क्योंकि हो सकता है कि लोग तुम्हारी पिटाई कर दें, इस पर हिमांशु चुटकी लेते हुए कहता है क्यों-तुम्हारा गांधी नहीं बचाएगा। जिस पर सोफिया कहती है कि-गांधी शरीर नहीं आत्मा को बचाते हैं। ये पूरा उपन्यास हिंदू-मुस्लिम संबंधों के अंतर्द्वंद और इसके बरक्स हम कहां खड़े हैं, उसे दिखाने की कोशिश करता है।

सवाल: पिछले सालों में हमें समाज में नफरत और प्रेम के बीच हिंसा और अहिंसा के बीच तीखे अंतर्द्वंद दिख रहे हैं, अपने उपन्यास के ज़रिए आपने कैसे इसे उबारने की कोशिश की है?

जवाब: देखिए, ऐसा नहीं है कि हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव पहली बार देखने को मिल रहे हैं। ऐसा पहले भी होता रहा है। बल्कि इस देश में पहले भी दंगे हुए हैं, वो भी गुजरात में। उसके बाद और कई जगहों पर भी हुए। लेकिन वो कुछ इस तरह होते थे जैसे कि दो चचेरे भाइयों के बीच खेत को लेकर लड़ाई होती थी। लेकिन जब राम मंदिर का आंदोलन चला तो, उसके बाद मंदिर किसका बनेगा, मस्जिद किसकी बनेगी ये राज्य का विषय नहीं होना चाहिए था। लेकिन जब राजनीति में धर्म को औजार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा तो उसके बाद समाज बहुत तेजी से और बहुत साफ तरीके से बंटता चला गया। उस डिवीजन से स्थितियां काफी खराब हो गईं। आज लोगों में एक दूसरे को लेकर जो नफरत देखने को मिल रही है वो उनका स्वाभाविक गुण नहीं है।

उपन्यास के केंद्र में ये विचार बेहद अहम है कि इस दुनिया में दो भावनाएं सबसे प्रबल हैं। एक घृणा और दूसरा प्यार। दोनों सबसे तीव्र भावनाएं हैं और दोनों परस्पर विरोधी भावनाएं हैं। दोनों में लगातार संघर्ष चलता है और इसमें जो जीतेगा, दुनिया उस हिसाब से ही होगी। दुनिया बची हुई है और उसे बेहतर बनाने की कोशिश हो रही है तो इसलिए कि नफरत पर प्यार हावी है।

मेरा उपन्यास बताता है कि दुनिया बचेगी क्योंकि उसे प्यार बचाएगा। ये टिपिकल बॉलीवुड फिल्मों वाला प्रेम नहीं है। ये मानवता का प्यार है।

सवाल: एक सवाल राजनीति को लेकर भी है? लगातार ध्रुवीकरण हो रहा है और शाहीन बाग जैसे प्रदर्शन और उनके अंतर्विरोध देखते हैं। ऐसे में शाहीन बाग से आगे का समाज और आगे की राजनीति कहां जाएगी?

जवाब: कहा जाता है कि राजनीतिक गंदे लोगों का खेल है। लेकिन राजनीति साफ सुथरे लोगों का भी खेल हो सकता है। जब 1915 में गांधी हिंदुस्तान आए तो गांधी के सामने कोई बहुत साफ सुथरी राजनीति नहीं थी। दूसरी बात लोकतंत्र की एक खासियत ये भी है कि सरकार चलाने वाले लोगों की बातें करने के लिए मजबूर हैं।

हालांकि सच ये भी है कि राजनीति ने समाज को ज़रूर तोड़ा है। राजनीति ने कोशिश की है समाज को विकृत करने की। लेकिन इसी विकृति के खिलाफ़ जब जनता खड़ी होती है तो चीज़ें बदलती हैं। उपन्यास में भी इस बात का जिक्र है कि राजनीति करने वाले किस तरह लड़ा रहे हैं। हिंदू और मुसलमान, दोनों तरफ धर्म को लेकर उन्माद फैलाने वाले लोग तो मौजूद हैं। ऐसे में युवा वर्ग को जब समाज को बांटने वालों की चाल समझ आती है तो वो विद्रोही तेवर अख्तियार करते हैं और वही विद्रोही तेवर समाज को बदलने की कोशिश करता है।

सवाल: हाल के वक्त में युवा वर्ग की चेतना जगाने और प्रतिरोध करने के भी उदाहरण हमारे सामने हैं, लेकिन इसी के बरक्स चुनाव पर जब इसका असर ना दिख रहा हो तो आगे की दिशा तो और तीखे ध्रुवीकरण की ओर जाती दिख रही है?

जवाब: कुछ भी पहली बार नहीं हो रहा है, 84 के दंगों में किस तरह सिख अकेले पड़े, हम सबने देखा। अगर हम ये कहते हैं कि बीजेपी इस वक्त पूर्ण बहुमत में है और पीएम नरेंद्र मोदी की लोगों पर पकड़ इतनी मजबूत है तो 2024 में भी उनके हारने के आसार नहीं दिख रहे हैं तो ऐसी स्थितियां क्यों बनी?

इस देश के लोगों ने इतने सालों तक खुद को सेक्युलर कहने वाले दलों को वोट दिया और अब एक ऐसे दल की सरकार है जो धर्म की राजनीति करती है। सोचने वाली बात है कि ऐसे हालात क्यों बने, उसकी वजह ये है कि पिछली सरकारों में भी धर्म को औजार बनाया गया, धर्मनिरपेक्षता को औजार बनाया और इसके ज़रिए समाज को बांटने की कोशिश की। धर्मनिरपेक्षता का मतलब है कि राज्य धर्म में दखल नहीं देगा। राजीव गांधी की सरकार में एक ओर शाह बानो का केस तो दूसरी ओर राम जन्मभूमि का ताला खोल दिया गया, यानि धर्म की राजनीति तो हुई है ना। इसके बाद बीजेपी ने सबको हिंदुत्व के प्लेटफॉर्म पर लाकर पटक दिया।

अब बात रही ध्रुवीकरण की तो हर चीज़ की एक मियाद होती है। जब आदमी नींद की गोली ले लेता है तो जगने में समय लगता है। समय लगेगा। ऐसा नहीं है कि यही हालात रहेंगे। जो इंदिरा गांधी 1971 में प्रचंड बहुमत के साथ थीं और इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा का नारा गूंजता था लेकिन 1977 में वो बुरी तरह हरा दी गईं। ये सही है कि उस वक्त विपक्षी एकता थी और जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व था। लेकिन समाजशास्त्र का छात्र होने के नाते मैं मानता हूं कि विपक्ष हमेशा जनता होती है। जनता पर विश्वास करना चाहिए।

सवाल: पुस्तक मेले में दो बार बजरंगियों का हमला आपने देखा ही होगा, फ्रिंज एलिमेंट अब मेन स्ट्रीम बन गए हैं। ऐसा लग रहा है कि ध्रुवीकरण के नैरेटिव को जनता ने स्वीकार कर लिया है? मेले में ही सह-अस्तित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ी किताबें हैं और दूसरी ओर उग्र और असहिष्णु होती नारेबाज़ी, उम्मीद कहां है?

जवाब: जो लोग आज धार्मिक नारेबाज़ी कर रहे हैं वो तीस साल पहले किसे वोट दे रहे थे? कांग्रेस ने 1984 में अभूतपूर्व जीत हासिल की। लेकिन 1989 में जब एक बार हारी तो भले ही सत्ता में आई लेकिन बहुमत के साथ नहीं आ पाई। इसका संदर्भ इसलिए क्योंकि जनता की अवधारणा बदलने में वक्त लगता है। इस देश में अगर किसी ने लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का काम किया है तो वो नेहरू ही हैं।

इंदिरा गांधी के समय भी फ्रिंज एलिमेंट देखने को मिले। लेकिन फ्रिंज एलिमेंट से इंदिरा गांधी कमज़ोर नहीं हुई। बाद में जब वक्त बदला। जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गई तो समाज में नई समझ बनी। जनता पर चीज़ें छोड़नी की ज़रूरत है। लेकिन विपक्ष भी अपनी जिम्मेदारी ठीक तरीके से नहीं निभा पा रहा है। कांग्रेस जनता से जुड़ने की कोशिश क्यों नहीं कर रही ?

हिंदुस्तानी जनता के पास बहुत सब्र है और ये सब्र इतना है कि इसने अंग्रेजों की 200 साल की गुलामी झेल ली। जनता हालातों को बदल देती है। सब कुछ अब जनता है। उपन्यास के दोनों पात्र आम जनता के वर्ग से हैं। और वो भी प्रतिरोध में खड़े होते हैं। हमें जनता पर भरोसा रखना ही होगा।

(जनचौक की कंट्रीब्यूटिंग एडिटर अल्पयू सिंह की राठौर विचित्रमणि सिंह से बातचीत)

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    संजय कुमार पांडेय

    राठौर जी और मेरी मित्रता 30 साल से अधिक पुरानी है । मैं उन्हें और उनके विचारों को बहुत हद तक जानता और समझता हुं और बहुत हद तक उनकी लेखनी का प्रशंसक भी हुं। मुझे लगता है कि समाज को अगर एक करना है और लोगों के बीच मानवता का भाव पैदा करना है तो अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, अगड़ा पिछड़ा होने का एहसास ही खत्म करना होगा। हमें ऐसे शब्दों का प्रयोग ही बंद करना होगा जो लोगों को बांटने का काम करता हो।
    हमें सबको एक सूत्र में पिरोने के लिए धर्म और जात पात की तरफ इंगित करने वाले शब्दों का प्रयोग ही बंद करना होगा।

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