जनसंख्या के आधार पर परिसीमन के बाद खत्म हो जाएगी दक्षिणी राज्यों के वोटों की अहमियत : जस्टिस जोसेफ

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस केएम जोसेफ ने हाल ही में नई जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन (सीटों के बंटवारे में बदलाव) को लेकर चिंता जताई। उन्होंने चेतावनी दी है कि जनसंख्या के आधार पर संसदीय सीटों के नए बंटवारे से दक्षिणी राज्यों में वोटों की अहमियत कम हो सकती है।

जस्टिस जोसेफ ने यह बात केरल हाईकोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणापत्र की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणापत्र के मूल सिद्धांत “शासितों की सहमति”  पर चर्चा करते हुए कही। उन्होंने इस सिद्धांत को भारत की संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ा, जिसके तहत प्रतिनिधियों की संख्या जनसंख्या से जुड़ी होती है।

उन्होंने बताया कि प्रतिनिधित्व तय करने के लिए 1971 की जनगणना का इस्तेमाल किया गया और नई जनसंख्या गिनती के आधार पर परिसीमन करने को लेकर चिंता जताई।

जस्टिस जोसेफ ने कहा, “अगर हम अब ऐसा करते हैं तो खासकर दक्षिणी राज्यों को यह चिंता होगी कि अगर जनगणना के बाद चुने जाने वाले प्रतिनिधियों की संख्या तय की जाती है, तो स्थिति पूरी तरह से असंतुलित और असमान हो जाएगी, जिसमें दक्षिणी राज्यों के लोगों के वोटों की अहमियत तुलनात्मक रूप से बहुत कम रह जाएगी।”

उन्होंने तर्क दिया कि वोटों की अहमियत कम होने से संसद में दक्षिणी राज्यों के लोगों की सार्थक आवाज़ उठाने की क्षमता पर भी असर पड़ेगा। इसलिए उन्होंने इस चिंता का समाधान खोजने की बात कही। उन्होंने कहा, “वोटों की अहमियत कम होने का असल मतलब यह है कि संसद की कार्यवाही का हमारे लिए कोई खास मतलब नहीं रह जाएगा। इसका मतलब यह होगा कि हम इसके लिए अपनी सहमति नहीं दे रहे हैं। मैं इसे इसी तरह समझने की कोशिश कर रहा हूं। इसलिए मुझे लगता है कि इसका समाधान निकाला जाना चाहिए।”

उन्होंने इस मुद्दे को लोकतांत्रिक व्यवस्था के उस मुख्य सिद्धांत से जोड़ा, जिसके अनुसार सरकारों को अपनी वैधता लोगों की सहमति से मिलती है।

जस्टिस जोसेफ ने कहा, “अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणापत्र का मुख्य विचार यह है कि सभी तरह का शासन और सरकारें शासितों की सहमति के आधार पर ही जायज़ मानी जाती हैं।”

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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