स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) ने सभी प्रमुख अख़बारों की सुर्खियाँ बटोरी हैं क्योंकि इसे लेकर सभी बड़े विपक्षी दलों की ओर से जबरदस्त विरोध सामने आया है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी इस संविधानिक अधिकारों पर हुए बड़े हमले के ख़िलाफ़ अभियान की अगुवाई कर रहे हैं और उनके साथ पूरा विपक्ष देश की जनता के दरवाज़े तक पहुँचने की कोशिश में जुटा हुआ है। भारी आक्रोश तब भड़का जब यह स्पष्ट हुआ कि स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत मतदाता सूचियों को नियमित वार्षिक सार-संशोधन की तुलना में और अधिक गहराई से संशोधित एवं अद्यतन किया जाता है।
भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, इस कदम से चुनावी प्रक्रिया को सुगम बनाने में मदद मिलेगी क्योंकि इससे फर्जी/डुप्लिकेट प्रविष्टियों को हटाया जा सकेगा। आयोग ने यह भी आश्वासन दिया है कि मतदाताओं की पहचान की प्रामाणिकता सुनिश्चित की जाएगी और जिन मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी है या जो अन्यत्र स्थानांतरित हो चुके हैं, उन्हें इस शुद्धिकरण या सुधार प्रक्रिया के माध्यम से सूची से हटाया या सुधारा जा सकेगा।
संक्षेप में, SIR और उसके बाद की पूरी कहानी इस प्रकार है: बिहार और कुछ अन्य राज्यों (2024–25) में SIR अभ्यास के दौरान मतदाता सूची से 65 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए। इस सूची में मृतक मतदाता, पलायन कर चुकी जनसंख्या और डुप्लीकेट पहचानें शामिल थीं। विपक्षी दलों (कांग्रेस, राजद, माकपा (माले) आदि) ने आरोप लगाया कि SIR हाशिये पर खड़ी समुदायों को निशाना बना रहा है और सत्तारूढ़ एनडीए के पक्ष में काम कर रहा है। उन्होंने इसे एनआरसी प्रक्रिया जैसा बताया, जिसके चलते बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन, रैलियाँ और SIR को रद्द करने की माँग उठी।
इस मनमाने तरीके से किए गए नामों के निष्कासन के खिलाफ कई याचिकाएँ दायर की गईं। याचिकाकर्ताओं की दलीलों को सुनने के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ आदेश पारित किए, जिनमें अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग की चुनाव और चुनाव संबंधी नियमों को संचालित करने की संवैधानिक शक्ति को स्वीकार किया। इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि निर्वाचन आयोग को हटाए गए मतदाताओं की सूची ऑनलाइन, खोज योग्य रूप में प्रकाशित करनी होगी और यह सूची बीएलओ (BLOs) की प्रदर्शन सूची पर भी उपलब्ध करानी होगी। साथ ही बीएलओ को निर्देश दिया गया कि वे आवेदक के वैध दस्तावेजी प्रमाणों को स्वीकार करते हुए मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया करें।
17 अगस्त 2025 को: निर्वाचन आयोग ने हटाए गए नामों की सूची प्रकाशित की। इसके बाद विपक्ष फिर सड़कों पर उतर आया और इन सब चीजों को न्यायसंगत आधार पर रखने की माँग की, क्योंकि बड़ी संख्या में मतदाता अपने गृह राज्य से पलायन कर चुके हैं। इसके जवाब में, सर्वोच्च न्यायालय ने भारत निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वे ऑनलाइन आवेदन स्वीकार करें और सभी 11 वैध दस्तावेजी प्रमाणों (जिसमें आधार कार्ड भी शामिल है) के साथ मतदाता सूची में नाम दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी करें।
“एन मास एक्सक्लूज़न” (en masse exclusion) के स्थान पर “एन मास इंक्लूज़न” (en masse inclusion) होना चाहिए
इसका क्या अर्थ है? न्यायमूर्ति कांत ने निर्वाचन आयोग के कदम पर अपनी राय साझा करते हुए कहा कि “एन मास एक्सक्लूज़न” के बजाय “एन मास इंक्लूज़न” होना चाहिए। ये पंक्तियाँ संविधानिक मूल्यों की आत्मा को प्रकट करती हैं, जो संविधान निर्माताओं की आकांक्षाओं को रेखांकित करती हैं।
यह मुद्दा पूरे प्रक्रिया की संवैधानिक व्याख्या पर एक नई बहस खोलता है। विपक्षी नेताओं ने SIR का विरोध इस आधार पर किया कि भारत निर्वाचन आयोग ने अपने अतिरिक्त संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किया है। वहीं दूसरी ओर उन्होंने यह भी दावा किया कि इस निष्कासन प्रक्रिया में भारत निर्वाचन आयोग ने विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया (due process of law) को तेज़ी से नज़रअंदाज़ कर दिया है।
एक अन्य संवैधानिक प्रश्न यह भी है कि इस प्रक्रिया में प्रमाण का दायित्व (onus of proof) भारत निर्वाचन आयोग से हटाकर भारत के नागरिकों पर डाल दिया गया है। इसका अर्थ है कि परंपरागत रूप से, जब किसी का नाम मतदाता सूची में शामिल होता है तो उसे हटाने का औचित्य सिद्ध करना निर्वाचन आयोग का कर्तव्य होता है। लेकिन SIR ने यह दायित्व मतदाताओं पर—विशेषकर नवनिर्वाचित मतदाताओं पर—थोप दिया कि उन्हें अपनी नागरिकता सिद्ध करनी होगी।
जिन नागरिकों को निर्वाचन आयोग द्वारा हटाया गया है, वे लंबे समय से मतदाता सूची में शामिल थे और अब उन्हें अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करने से वंचित कर दिया गया है। नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की प्रधानता को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा—“यह मतदाताओं के मौलिक अधिकार का हिस्सा है कि उन्हें यह जानने का अधिकार है कि किस आधार पर उनके नाम सूची से हटाए गए, और यह उनके सूचना के अधिकार से सीधे-सीधे जुड़ा हुआ है।”
संवैधानिक सूचना का अधिकार सीधे तौर पर उस व्यवस्था की पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है, जिसके अंतर्गत जनता एक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा शासित होती है। यदि नागरिकों को यह उचित जानकारी और कारण न मिले कि किस आधार पर उनके मतदान के अधिकार का उल्लंघन किया जा रहा है, तो इस बहिष्करण सूची को एक फ़रमान माना जा सकता है, जिसके खिलाफ़ नागरिकों को विरोध करने का पूरा अधिकार है। संसाधनों तक पहुँच का अधिकार, सूचना के अधिकार का मौलिक पहलू है, क्योंकि केवल जानकारी, बिना कारण और परिणामों की व्याख्या के, कुछ नहीं बल्कि एक खोखला कागज़ बनकर रह जाती है, जिसे किसी भी तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है और जिसकी व्याख्या धुंधली ही रहेगी।
मताधिकार से वंचित होने (Disenfranchisement) के जोखिम पर नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने विपक्षी दलों और नागरिक समाज के साथ मिलकर चेतावनी दी कि SIR गरीब, प्रवासी और हाशिये पर खड़े मतदाताओं को असमान रूप से बाहर कर सकता है, क्योंकि उनके पास आवश्यक दस्तावेज़ों तक पहुँच नहीं है। जब नागरिकता जैसी अवधारणा एक लोकतांत्रिक देश भारत में सभी के लिए समान धरातल पर होनी चाहिए, तो यह डर इतना गहरा क्यों है? उन्होंने समाज के हाशिये से कुछ गंभीर प्रश्न उठाए- कौन इन दस्तावेज़ों तक पहुँच नहीं पाएगा? कौन इस प्रक्रिया में खुद को इस देश का नागरिक सिद्ध करने का खर्च नहीं उठा पाएगा? गरीब लोग। यह डर सीएए–एनआरसी की बहस से पहले भी स्पष्ट हो चुका है, जहाँ हाशिये पर खड़ी मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा गहरे संकट में आ गया था।
निर्वाचन आयोग और विपक्षी दलों के बीच यह खींचतान लगातार जारी है और विपक्षी दल इस मुद्दे पर भाजपा के खिलाफ़ एक व्यापक जन-जागरण अभियान चलाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में जनता की चेतना का प्रतिबिंब इंस्टाग्राम रीलों या सोशल मीडिया पोस्टों से नहीं पढ़ा जा सकता। लेकिन यहाँ सबसे अहम बात यह है कि भारत निर्वाचन आयोग के पद की संवैधानिक गरिमा फिर से बहस के केंद्र में आ गई है और संविधान के बुनियादी मूल्यों की रक्षा के लिए एक बड़ा अभियान शुरू हो गया है। हालांकि, यह बहस केवल विरोध तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे निर्वाचन आयोग की नौकरशाही चयन प्रक्रिया तक ले जाना चाहिए और इस संस्था को लोकतांत्रिक तरीके से सुधारने के सही मार्ग पर चर्चा होनी चाहिए।
(निशांत आनंद पेशे से वकील हैं और लेखन का भी काम करते हैं।)