मुंबई हादसा : “हम मर नहीं सकते क्योंकि हम ज़िंदा भी नहीं हैं”

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गौरव सोलंकी

मेरे शहर की स्पिरिट कमाल है। हम मर नहीं सकते क्योंकि हम ज़िंदा भी नहीं हैं।

22 लोग आज काम पर गए थे पर वे लौटेंगे नहीं। उनके साथ जो बाकी लोग उस भगदड़ का हिस्सा थे, लेकिन बच गए – वे फिर जाएँगे दो दिन बाद उसी भीड़ के बीच – जान हथेली पर रखकर। उदास आँखों से एक-दूसरे को या अपने-अपने फ़ोन को देखते हुए।

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वे सर झुकाकर काम पर जाएँगे और काम से लौटेंगे। उनमें से 9 हर दिन औसतन लोकल ट्रेन से गिरकर मरते रहेंगे – साल के 3000। लेकिन उनमें से कोई कभी प्रोटेस्ट नहीं करेगा, क्योंकि उसके लिए वक़्त ही नहीं है।

जितने लोग गणपति विसर्जन के लिए निकलते हैं, उसका हज़ारवां हिस्सा भी अगर सड़क पर आकर सवाल पूछने लगे तो सरकारें हिल जाएँ। लेकिन सवाल पूछना हमें अच्छा नहीं लगता। हम सफ़र और शोर से इस कदर थके हुए लोग हैं कि सवाल पूछेंगे तो उसके बीच में ही मर जाएँगे।

नए लोग आते रहते हैं। नया पुल नहीं बनता। और जैसे चरस पर ज़िंदा हैं हम, कि सरकार हमारे लिए एल्फ़िंस्टन रोड स्टेशन का नाम बदलकर प्रभादेवी कर देती है। हादसे, जाने क्यूं, इसके बाद भी नहीं रुकते।

शिवाजी की 3600 करोड़ की मूर्ति बन ही रही है। उन्हें अगर इस शहर से ज़रा भी मोहब्बत होगी तो मुझे लगता है कि उद्घाटन के दिन वो मूर्ति एक पाँव उठाएगी और उन सबके ऊपर रख देगी, जिन्होंने उसे बनाया है। और शायद हमारे ऊपर भी – कि या तो जीना सीख लो, या मर ही जाओ।

(गौरव सोलंकी एक लेखक और पत्रकार हैं। आप मुंबई में रहते हैं।)

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