Tue. Oct 15th, 2019

बलात्कार के आरोपी बाबा के आगे निर्वाचित सरकार नतमस्तक!

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कैसा भयानक दृश्य है कि लोकतंत्र में एक निर्वाचित सरकार ने संविधान को दुष्कर्म के आरोपी विवादास्पद-शक्तिशाली `बाबा` के पैरों में पटक दिया है! `डेरा सच्चा सौदा` के प्रमुख बाबा गुरमीत सिंह `राम-रहीम` के खिलाफ चल रहे दुष्कर्म के केस में शुक्रवार, 25 अगस्त को सीबाआई की पंचकूला स्थित कोर्ट फैसला सुनाएगी। पंचकूला में बाबा के `भक्तों` की भारी भीड़ ने दबाव की रणनीति के तहत डेरा डाल रखा है। भारत को नक्शे से मिटा देने जैसे बयान वायरल हो रहे हैं और पूरा प्रदेश आशंकाओं के स्याह बादलों से घिरा लग रहा है।

“डेरा प्रेमियों पर धारा-144 नहीं”

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कहने को धारा-144 लगाई गई है पर हरियाणा की भारतीय जनता पार्टी की सरकार के वरिष्ठ मंत्री रामबिलास शर्मा कह रहे हैं कि हम खाना भी सप्लाई कर रहे हैं और पानी भी। मंत्री कह रहे हैं कि डेरा प्रेमियों पर धारा-144 नहीं लगी है। चंडीगढ़ में रहने वाले साहित्यकार देश निर्मोही पूछते हैं कि तो क्या धारा-144 पंचकूला के निवासियों पर लागू है। यह सवाल बेवजह नहीं है और इसके पीछे की चिंताओं का दायरा बहुत बड़ा है। कि क्या न्यायतंत्र को इस खुली चुनौती के पीछे भारतीय जनता पार्टी की सरकार और उसके थिक टैंक आरएसएस की खुली शह है?  

आपराधिक विवादों से पुराना नाता

सिरसा स्थित इस डेरे और उसके बाबा के साथ भयानक आपराधिक विवादों का सिलसिला पुराना है और समय-समय पर उन्हें सरकारों के संरक्षण का भी। डेरे के अनुयायी पूरे उत्तर भारत में हैं और वे किसी तार्किकता, तथ्यों और कानून से ऊपर उठकर आंखें मूंदे हुए आक्रामक अंदाज में बाबा के साथ हैं। बाबा उनके लिए `पूज्य पिताजी` हैं।

जाट आंदोलन से कोई सबक नहीं लिया

प्रश्न यह है कि हरियाणा की भारतीय जनता पार्टी की सरकार और चंडीगढ़ को संभालने वाली केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने इस संकट से निपटने के क्या इंतजाम किए? पिछले साल हरियाणा के जाट आरक्षण की आड़ में हुई हिंसा के लिए भाजपा सरकार सवालों के घेरे में रही है। आरोप लगते रहे हैं कि दिल्ली-रोहतक हाइवे पर सांपला में जाम को खुलवाने के लिए मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने मौके पर जाने से इंकार कर दिया था। फिर सरकार चुपचाप सड़कों को जाम होते देखती रही थी। यहां तक कि रोहतक जैसे महत्वपूर्ण शहर में भी यह सब तब तक होते रहने दिया गया था, जब तक कि हिंसा भड़क कर कई दिन बेकाबू नहीं बनी रही। कहते हैं कि जाट-गैर जाट की पुरानी बीमारी का शिकार इस राज्य में इस भयानक हिंसा में सरकार को विफलता के लिए जवाबदेही की कीमत के खतरे से ज्यादा लाभ गैर जाटों के अपने प्रति ध्रुवीकरण का मिला। सवाल यह है कि तब सरकार की नीयत ग़लत भी नहीं थी तो अब उस भयावह विफलता से सबक क्यों नहीं लिया गया।

सरकार ने हाथ खड़े किए!

यह कोई अप्रत्याशित फौरी संकट नहीं है। सरकार ने बहुत पहले से क्या प्रबंध किए? `भक्तों` की भीड़ को क्यों पंचकुला में जमा होने दिया जाता रहा? बीजेपी समर्थकों के इस भोले तर्क को क्या धूर्तता नहीं माना जाना चाहिए कि आखिर किसी को किस कानून से रोका जा सकता है? अगर ऐसा है तो फिर सरकार को घोषित कर देना चाहिए कि चीजें उसके बस में नहीं हैं और जो होगा, उसे भुगतने के लिए तैयार रहा जाए। बसों और शिक्षण संस्थाओं को बंद रखने के ऐलान इस आशंका की वजह से ही किए गए हैं। न्याय तंत्र को चुनौती देती भीड़ के लिए धारा-144 नहीं होने और इस भीड़ की सेवा में तत्पर होने के मंत्री के बयान से जा रहा मैसेज साफ है। सरकार के हाथ खड़े कर देने या अभियुक्त और उसकी अनुयायी भीड़ को सरकार के संरक्षण से न्यायिक अधिकारी कोई दबाव महसूस नहीं कर रहे होंगे?

चुनाव में लिया गया था साथ

भयानक आरोपों से घिरे होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा के विधानसभा चुनाव में `डेरा सच्चा सौदा` का समर्थन हासिल करने के लिए कोई कसर नहीं उठा रखी थी। पूरी सौदेबाजी के अंदाज में डेरे ने भाजपा को समर्थन दिया था। दावा किया गया था कि भाजपा की भारी जीत में डेरे के समर्थन ने बड़ी भूमिका निभाई है। यूं भी डेरे का सिरसा में होने का भी गहरा राजनीतिक महत्व है। सिरसा जिला पूर्व उप प्रधानमंत्री चौ. देवीलाल का गृह जिला है। चौटाला गांव इसी जिले में है। सिरसा में पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनकी पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल की दिलचस्पी और असर स्वाभाविक हैं। विधानसभा चुनाव में तमाम अटकलों और इनेलो की `कोशिशों` के बावजूद बीजेपी का इनेलो से गठबंधन नहीं हुआ तो खास सिरसा इलाके के लिए भी भाजपा को डेरे के समर्थन की भारी दरकार थी। जाहिर है कि डेरे और उसके प्रमुख को सीबीआई की तलवार से सुरक्षित रहने के लिए ऐसी ताकत की जरूरत कम नहीं थी जो केंद्र में भी प्रभावी हो और प्रदेश में भी। हरियाणा में सरकार बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी लगातार बाबा के अहसान उतारने की मुद्रा में रही। सरकार के मुखिया व आरएसएस के स्वयंसेवक मनोहर लाल खट्टर व उनके मंत्रियों ने डेरा प्रमुख पर चल रहे गंभीर मुकदमों के बावजूद कभी कोई नैतिक संकोच नहीं दिखाया। संगठन और सरकार के पुरोधा डेरे में नतमस्तक होते रहे, खजाना लुटाते रहे और अभियुक्त बाबा को सरकारी मुहिम का ब्रांड अंबेसडर तक घोषित करते रहे।

संकट का माहौल

इन स्थितियों में यह आशंका निर्मूल नहीं है कि उपकृत सरकार ने संकट से निपटने की किसी रणनीति को अपनाने के बजाय आँखें मूंद ली हैं। भीड़ को इकट्ठा होने दिया गया है और एक बड़े खतरे का माहौल बनने दिया गया है। सवाल है कि अगर फैसला डेरा प्रमुख के खिलाफ आता है तो क्या प्रतिक्रिया होगी। क्या उत्तेजित `भक्तों` के तीखे बोल सही साबित होंगे? क्या तब अंधापन या फोर्स का इस्तेमाल दोनों ही स्थिति को और भयावह नहीं बना देंगे? इस आशंका में भी क्या भाजपा कोई बड़ा फायदा देख रही है? बीजेपी सरकार के पुराने तौर-तरीकों को ध्यान में रखकर इसे प्रायोजित खेल करार देने वाले भी कम नहीं हैं। यह भी कहा जा रहा है कि मिल-जुल कर बनाए गए भयावह माहौल की आड़ में ही कोई बीच का रास्ता निकाल लिया जाएगा।

गांधीवादी समाजसेवी और अधिवक्ता राममोहन राय का मानना है कि पटकथा इस तरह तैयार की गई होगी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। सीबीआई को सरकार की कठपुतली करार देने वाले लोग आशंका जता रहे हैं कि सीबीआई पहले ही डेरा प्रमुख के बचाव की तकनीकी जगहें बना चुकी होगी।

पूर्व सरकारों ने भी की मदद               

यह भी दिलचस्प है कि पूर्व की सरकारें भी डेरा प्रमुख की मदद करती रही थीं। साध्वी के यौन शोषण, उस निर्भीक-मूल्यवान पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या और दूसरे गंभीर मामले सतह पर थे तो हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व में इनेलो-भाजपा गठबंधन की ही सरकार थी। प्रदेश सरकार ने मांग के बावजूद सीबीआई जांच की संस्तुति तक नहीं की थी और शहीद पत्रकार छत्रपति के पुत्र अंशुल को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा था। बाद में हरियाणा में करीब 10 सालों तक भूपेंद्र सिंह हुड्डा की अगुआई में कांग्रेस की सरकार रही तो उसने भी डेरा प्रमुख की जमकर मदद की। अभियुक्त बाबा को जेड प्लस सिक्युरिटी मुहैया कराई गई और उसके अनुयायियों की भयंकर कारगुजारियों को अनदेखा किया जाता रहा। पूर्व की सरकारों और इस सरकार में फर्क यह है कि यह कहना मुश्किल है, फायदा डेरा प्रमुख की शर्तों पर है या भाजपा की। दरअसल, भाजपा का मातृ-संगठन आरएसएस किसी भी सौदे में कुछ खोने के बजाय हासिल करने की नीति पर ही चलता रहा है। फैसला जो भी हो, लेकिन यह तय है कि लोकतंत्र और उसका संविधान फिलहाल बेबस खड़ा दिखाई दे रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय हरियाणा में रिपोर्टिंग की है।)


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