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बस्तर के आदिवासियों ने छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक अमले को पढ़ाया संविधान

बस्तर। अनुसूचित क्षेत्र बस्तर के आदिवासियों ने पढ़ाया पूरे प्रशासनिक अमले को भारत का संविधान। जी हां! समाज के युवाओं और बुजुर्गों के हाथ में संविधान की किताब और एक ओर बस्तर के 7 जिलों के कलेक्टर, एसपी और बस्तर कमिश्नर।

समाज प्रमुखों ने आला अफसरों को बस्तर में जारी खूनी हिंसा, आदिवासियों पर अत्याचार और संवैधानिक प्रावधानों का प्रशासनिक अमले द्वारा ही उल्लंघन, इन विभिन्न मुद्दों पर संविधान का पाठ पढ़ाया।

6 घंटे की मैराथन बैठक

सर्व आदिवासी समाज के नेताओं और प्रशासनिक अमले के बीच मंगलवार की दोपहर मैराथन बैठक हुई। बैठक का दौर 6 घंटे तक चला। बैठक में पूर्णत संविधान के हनन को लेकर चर्चा की गई।

बस्तर संविधान में निहित पांचवी अनुसूची क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जहां प्रशासनिक अमले के संविधान के विपरीत कार्य करने को लेकर आदिवासी समुदाय नाराज व आक्रोशित है। बस्तर के इतिहास में इस तरह पहली दफा प्रशासनिक अमले और समाज के बीच संवाद स्थापित हुआ

“शासन-प्रशासन ही करता है संविधान का उल्लंघन”

आदिवासी समाज का कहना है  कि संविधान के प्रावधानों की उल्लंघन के कारण ही आदिवासी समाज पर अत्याचार, शोषण व जल जंगल जमीन की लूट हो रही है यदि शासन-प्रशासन इन प्रावधानों की पालन करता तो यह हालत नहीं होती।

गोंडवाना समाज कांकेर के जिला अध्यक्ष सुनहेर नाग ने कहा कि आजादी के 70 साल होने के बाद भी सरकार और प्रशासन पांचवी अनुसूची के प्रावधान का क्यों नहीं पालन कर रहा है? अनुसूचित क्षेत्र में भूमि का हस्तांतरण असंवैधानिक है फिर भी आदिवासियों की जमीन किस अनुच्छेद अधिनियम के तहत गैर आदिवासी कब्जा कर रहे हैं? इस पर भी प्रशासन मूक दर्शक बना हुआ है और राज्य सरकार निरकुंश होकर आदिवासियों की विकास की ढिंढोरा पीट रही है।

भूम मुदिया लिंगो गोटूल ओड़मा माड़ के गोटूल लयोर जगत मरकाम ने प्रशासनिक अधिकारियों से जानना चाहा कि अनुसूचित क्षेत्र में कोई भी सामान्य कानून पांचवी अनुसूची के पैरा 5 के अनुसार राज्यपाल के द्वारा बिना लोक अधिसूचना के सीधे कैसे लागू किया जा रहा है? इन क्षेत्रों में पारम्परिक ग्रामसभा के निर्णय के बिना कोई भी कानून जो लोकसभा व विधानसभा में बनते हैं सीधे लागू नहीं होते।

“सरकार एक गैर आदिवासी व्यक्ति”

मरकाम ने सवाल किया कि माननीय उच्चतम न्यायालय के पी रामी रेड्डी वर्सेज आन्ध्र प्रदेश फैसला 1988 के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र में सरकार एक गैर आदिवासी व्यक्ति है। जब सरकार एक गैर आदिवासी है तो वह अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की निर्णय का पालन क्यों नहीं करती है? जमीन अधिग्रहण कानून अनुसूचित क्षेत्रों में असंवैधानिक है फिर भी प्रशासन फ़र्जी या बन्दूक की नोक पर दबाव पूर्वक प्रस्ताव पास करके जमीन हड़प रही है जिसके कारण आदिवासियों में प्रशासन के कार्यों से विश्वास उठता है।

पसीना पोंछते नज़र आए अधिकारी

संविधान में निहित पांचवी अनुसूची की चर्चा के दौरान प्रशासनिक अमला पसीना पोंछते नजर आया तो वहीं दूसरी ओर समाज ने भी साफ कर दिया की अगर बस्तर में आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का हनन होगा तो आदिवासी संवैधानिक लड़ाई का बिगुल फूकेंगे। संविधान के रक्षक राष्ट्रपति व व्याख्याकार न्यायालय में याचिका लगाई जाएगी।

परलकोट क्षेत्र के गोटूल सिलेदार सुखरंजन उसेंडी ने कहा कि भारत मे संविधान ही सर्वोपरि है। न्यायपालिका, कार्यपालिका व विधायिका भी संविधान से बड़े नहीं हैं। उन्होंने जयललिता प्रकरण में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला भी अधिकारियों को दिया और कहा कि संविधान व उच्चतम न्यायायल के फैसलों को नहीं मानने वाले अधिकारी कर्मचारी व्यक्ति संस्था राजद्रोह की श्रेणी में आते हैं और इनके खिलाफ आईपीसी के धारा 124 क के तहत मामला दर्ज करवाया जायेगा।

अवैध घुसपैठ भी मुद्दा

गोटूल लयोर उसेंडी ने प्रशासन से पूछा कि अनुसूचित क्षेत्र में पूर्वी पाकिस्तान के अवैध घुसपैठियों को किस अनुच्छेद अधिनियम के तहत शरण दी गई है? प्रशासन के पास इनकी जानकारी नहीं है जो बेहद संवेदनशील समस्या है। यह बस्तर के साथ ही साथ पूरे देश की आंतरिक सुरक्षा पर भी सवालिया निशान है? इतने संवेदनशील मामले पर जिला प्रशासन की चुप्पी भी संविधान के अनुपालन व निष्ठा पर सवाल खड़ा करती है।

अफसरों को संविधान की प्रति भी दी

बस्तर में आदिवासी संविधान और संविधान में दिए आधिकार को लेकर गंभीर है। खबर है कि बस्तर कमिश्नर ने यह स्वीकार किया कि पहली दफे किसी समाज ने संविधान को लेकर गहन चर्चा की। एक जानकरी के अनुसार चर्चा के दौरान आदिवासी समाज ने प्रशासनिक अमले को संविधान की किताब भी वितरित की ताकि जो अफसर इससे अनभिज्ञ हैं वो पढ़ें और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार का हनन न करें।

सीएम कैसे आदिवासी सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बने?

आदिवासी सलाहकार परिषद के अध्यक्ष मुख्यमंत्री  रमन सिंह को बनाये जाने पर भी सवाल खड़ा किया गया। आखिर एक गैर आदिवासी को आदिवासी सलाहकार परिषद का अध्यक्ष कैसे बनाया गया। इस सवाल को उत्तर बस्तर कांकेर जिले के चाराम ब्लाक के एक मांझी ने उठाया, तो वहीं नारायणपुर से सुमरे नाग ने आबुझमाड विकास परिषद को बंद करने अथवा माड में गैर आदिवासियों पर प्रतिबन्ध लगाने को कहा। उन्होंने कहा की माड में पांचवी अनुसूची के तहत गैर आदिवासी के रहने बसने पर प्रतिबन्ध लगाया जाए।

“नगरनार स्टील प्लांट का निजीकरण असंवैधानिक”

बस्तर जिले के सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने नगरनार स्टील प्लांट की निजीकरण को पूर्णतः असंवैधानिक बताया क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के समता का फैसला, पी रामी रेड्डी का फैसला, वेदांता का फैसला के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र में जब कोई भी जमीन हस्तांतरण व लीज असंवैधानिक है। जब जमीन ही नहीं है तब स्टील प्लांट कैसे निजीकरण या निजी स्वामित्व का होगा? नगरनार स्टील प्लांट का यदि सरकार निजीकरण करती है तो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाया जाएगा। समाज की तरफ से यह दावा भी पेश किया गया कि यदि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के प्लांट को संभाल नहीं सकती तो सहकारी समिति के द्वारा संचालित करेगी। इसके अलावा पालनार घटना जिसमें 31 जुलाई को दंतेवाड़ा के पालनार कन्या आश्रम में रक्षाबंधन पर कार्यक्रम में आदिवासी छात्राओं से सुरक्षा बल के जवानों द्वारा छेड़छाड़ का आरोप है। इस मामले में 2 आरोपी जेल में भी हैं। परलकोट घटना जिसमें 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी समाज की रैली व सभा में पखांजूर में समुदाय विशेष के लोगों ने खलल डाला था आदि पर भी रोष जताया गया।

अनेको सवाल समाज ने प्रशासनिक अमले के सामने खड़े किए जिसका जवाब में प्रशासनिक अमला सिर्फ मुंह देखता नज़र आया।

आपको बता दें कि पिछले दिनों सर्व आदिवासी समाज ने अपनी विभिन्न मांगों और पांचवी अनुसूची क्षेत्र में संविधान के विपरीत हो रहे कार्यो को लेकर बस्तर बंद और आर्थिक नाकेबंदी की थी जिस पर प्रशानिक अमले ने बैठक के लिए हाथ बढ़ाया था। बैठक में बस्तर संभाग के 7 जिलों के कलेक्टर, एसपी, बस्तर कमिश्नर शामिल हुए । बैठक के दौरान आदिवासी नेताओं ने साफ कर दिया कि यदि उनकी मांगें नहीं मांगी गईं तो आर्थिक नाकेबंदी और फिर अलग बस्तर राज्य की मांग ही एकमात्र विकल्प बचेगा। हालांकि प्रशासन के रुख के प्रति वे सशंकित दिखे। हालांकि यह सच है कि इससे पहले प्रशासनिक अमला हमेशा चर्चा को लेकर भागता रहा है। अरविन्द नेताम ने कहा कि पहली दफा प्रशासनिक अमले ने समाज के साथ संवाद स्थापित किया है जो स्वागतयोग्य है।

“मांगों को लेकर संवेदनशील है प्रशासन”

संभागायुक्त दिलीप वासनीकर एवं आईजी विवेकानंद ने कहा कि प्रशासन समाज की मांगों को लेकर बेहद संवेदनशील है। संबंधित जिले के कलेक्टर और एसपी की मौजूदगी में आदिवासी समाज का पक्ष सुना गया। संभागायुक्त ने बताया कि विदेशी घुसपैठियों के संदर्भ में समाज प्रमुखों से तथ्यात्मक जानकारी मांगी गई है। इनके खिलाफ एक्ट के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।

(लेखक युवा पत्रकार हैं और बस्तर में रहते हैं। आप पत्रकारिता के माध्यम से समाजसेवा का उद्देश्य लेकर चल रहे हैं।)

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This post was last modified on May 12, 2019 10:30 pm

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