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राज्यपाल आनंदीबेन राजभवन में पका रही हैं कैसी खिचड़ी?

उत्त्तर प्रदेश में वैसे तो प्रचंड बहुमत से चुनी गई भाजपा की सरकार काम कर रही है लेकिन मुख्यमंत्री से इतर यहां की राज्यपाल आनंदीबेन की सक्रियता ने राजनीतिक हलकों में नए विमर्श को जन्म दे दिया है। वैसे भी पूर्व राज्यपाल रामनाईक की विदाई के बाद यहां आनंदीबेन की तैनाती से ही यह आभास हो गया था कि शायद उत्तर प्रदेश में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। आनंदीबेन की यहां की गई तैनाती से यह संदेश साफ हो गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपेक्षाओं की पूर्ति योगी आदित्यनाथ की सरकार शायद नहीं कर पा रही है। या प्रधानमंत्री विकास योजनाओं में जिस प्रकार की उम्मीद कर रहे हैं वैसा यहां होता हुआ कुछ नहीं दिख रहा है।

उत्त्तर प्रदेश की राज्यपाल बन कर कार्य ग्रहण करने से लेकर अब तक आनंदीबेन की सक्रियता ने इस आशंका को और भी बल प्रदान कर दिया है। पिछले दो सप्ताह में ही उनके उन निर्णयों ने राजनीतिक गलियारों में गंभीर चर्चा शुरू करा दी है जैसा किसी चुनी हुई सरकार के रहते कोई राज्यपाल कभी नहीं करता है। मसलन, आनंदीबेन ने एक दिन अचानक लखनऊ के मेडिकल विश्वविद्यालय का दौरा कर कई गड़बड़ियां खोज निकालीं और अपने स्तर से कड़ी कार्रवाई की अनुशंसा भी कर दी।

शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित एक समारोह में तो उन्होंने सरकार की कार्यशैली पर ही प्रश्न खड़े कर दिए। कल ही शाम को उन्होंने प्रदेश के सभी मंत्रियों से उनके विभागों के कार्यो का प्रेजेंटेशन कराया। इसमें मुख्यमंत्री को भी उन्होंने शामिल किया। आज आनंदीबेन ने प्रदेश के सभी कुलपतियों को बुलाकर उच्च शिक्षा में व्याप्त अनियमितताओं पर बात की और विभाग के अधिकारियों के खूब पेंच कसे।

हर 15 दिन पर या महीने में एक बार सभी कुलपतियों से वार्ता के लिए उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित भी किया। यहां यह ध्यान दिलाना जरूरी है कि प्रदेश में उच्च शिक्षा का विभाग उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा के पास है। इस विभाग को लेकर लगातार यह कहा जा रहा है कि इस विभाग में कामकाज बहुत ढीला है। गोरखपुर विश्वविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्तियों में व्यापक धांधली की शिकायतों की खबरें काफी चर्चा में हैं। इस विश्वविद्यालय में ऐसे शिक्षकों को प्रोफेसर बना दिया गया है जो निर्धारित योग्यता भी पूरी नहीं करते। जातिवाद की शिकायतें अलग हैं। वहां के एक विभाग में तो केवल एक ही विशेष जाति की नियुक्तियां की गई हैं। वहां के एक वरिष्ठ प्रोफेसर रामअचल सिंह का एक शिकायती पत्र अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित भी हुआ है। राज्यपाल ने ऐसी सभी गड़बड़ियों का संज्ञान लेकर खूब पेंच कसा है।

वैसे भी उत्तर प्रदेश में जातिवाद की खबरें काफी चर्चा में हैं। राज्यपाल को यह भी बताया गया है कि सरकारी पदों पर या तो एक जाति को तरजीह दी जा रही है या फिर उस संगठन के लोगों को जिसके केंद्रीय व्यक्तित्व स्वयं मुख्यमंत्री को ही बताया जा रहा है। खबर है कि राज्यपाल की इस सक्रियता से योगी के माथे पर बल तो हैं लेकिन अभी वह इस पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया प्रदर्शित नहीं करना चाह रहे। राज्यपाल की इस सक्रियता को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तो है लेकिन अभी सभी वेट एंड वाच की मुद्रा में हैं।

खबर यह है कि प्रदेश में योगी सरकार की ढाई साल की उपलब्धियों को लेकर अब समीक्षा का दौर शुरू हो चुका है। यह हकीकत है कि प्रदेश में राज्य सरकार ने ऐसा कोई प्रदर्शन नहीं किया है जिसका उपलब्धि के रूप में उपयोग किया जा सके। उद्घाटन के नाम पर सभी योजनाएं अखिलेश सरकार वाली ही रही हैं। दो-दो ग्राउंड ब्रेकिंग कराने के बाद एक रोड़ा भी इस सरकार में नया नहीं रखा जा सका है। कानून व्यवस्था की स्थिति बुरी है। बिजली के दाम बढ़ाने से जनता नाराज है। खुद भाजपा के कार्यकर्ता दुखी हैं क्योंकि सरकार में उन्हें बिल्कुल उपेक्षित कर दिया गया है। प्रदेश की नौकरशाही व्यवस्था को लगातार गुमराह कर रही है।

ऐसे में राज्यपाल की यह सक्रियता बता रही है कि प्रदेश के हालात को लेकर पार्टी और प्रधानमंत्री चिंता में हैं । सरकार का आधा कार्यकाल यदि ऐसा है तो शेष ढाई साल कैसे ठीक रहेंगे जिससे भाजपा सत्ता में बनी रहे, इसके लिए प्रयास तो करने ही पड़ेंगे। ऐसा माना जा रहा है कि राज्यपाल की इस सक्रियता के पीछे आलाकमान का निर्देश भी हो सकता है। क्योंकि योगी जब से मुख्यमंत्री बने हैं उसी समय से उनकी अनुभवहीनता को लेकर चर्चा होती रही है। ऐसे में यदि आनंदीबेन जैसी अति अनुभवी को स्थिति संभालने के लिए लगाया गया है तो यह स्वाभाविक लगता है। लेकिन सरकार के दो ध्रुव का संदेश कुछ तो कहता है।

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