Saturday, January 22, 2022

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काशी विश्वनाथ कोरिडोर पर भारी पड़ रहा है लोगों की जिंदगी का सवाल

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यूपी विधानसभा चुनाव-2022 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है, ऐसे में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्वनाथ मंदिर का ख़्याल आना स्वाभाविक है। 

वायदों के दौर को पहले ही शासनकाल के दौरान देख चुके हैं। आर्थिक मोर्चे पर त्राहिमाम कर रही अर्थव्यवस्था को कोविड-19 के बाद महंगाई, बेरोजगारी, निजीकरण  के गहरे घाव धोने के लिए जनता को अब 900 करोड़ लागत से 5 लाख स्क्वायर फीट में निर्माण वाली काशी विश्वनाथ गलियारे की सौगात दी जा रही है। लेकिन भाजपा की यह तरकीब काम करती नहीं दिख रही है। लोगों की जिंदगी के सवाल बीजेपी के मंसूबों पर भारी पड़ रहे हैं।

किसान आन्दोलन से जागा, सिरमौर

भाजपा सरकार की सबसे बड़ी नाकामियों में ​किसान आंदोलन प्रमुख है। सरकार को दूर-दूर तक  अंदाज़ा नहीं था कि तीन विधेयक, जो संसद में बिना किसी बहस, विचार के पारित कर दिए गए हैं उनसे एक दिन ऐसा भी आन्दोलन खड़ा हो सकता है जिसके कारण सरकार की कुर्सी पर आन गुजरेगी।

पश्चिमी यूपी, किसानों की मां है। पूर्वोत्तर को देखते हुए, पश्चिम यूपी में भाजपा के वर्चस्व में भारी गिरावट आई है। किसान आन्दोलन की भूमिका इसमें, अहम रही है। भाजपा भी पश्चिमोत्तर में अपने वोट बैंक को भली-भांति समझ रही है, 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की स्थिति खस्ताहाल ही रही थी। कुछ मंडल ऐसे थे जहां, भाजपा का केवल खाता ही खुल पाया था। वहीं किसान आन्दोलन में क़रीब 735 किसानों की मौत हुई थी, अब देखना होगा कि पश्चिमोत्तर, किसान आन्दोलन की बुनियाद पर खड़े सिरमौर को किस तरफ लेकर जाता है।  

निजीकरण के तीखे स्वर

पिछले कुछ वर्षों में निजीकरण के प्रति केन्द्र सरकार का दृष्टिकोण एक प्रकार का रहस्योद्घाटन ही रहा है। तमाम एयरलाइंस बेचने के बाद, मोदी सरकार की निगाहें सरकारी बैंकों पर आ टिकी हैं। सरकार अब बैंकों पर दांव खेलने की तैयारी में है।

बैंकों के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में बैंककर्मियों की हड़ताल जारी है। बैंक कर्मचारियों के 9 यूनियनों ने मिलकर इस हड़ताल का आह्वान किया है। देश भर के सभी सरकारी बैंकों के 9 लाख से अधिक कर्मचारी इस हड़ताल में शामिल हैं। पहले दिन के हड़ताल से करीब 19 हजार करोड़ के बैंकिंग कामकाज के प्रभावित होने का अनुमान है।यदि बैंकों को भी निजीकरण के दंभ में धकेल दिया गया तो भारी बेरोजगारी के बीच 9 लाख कर्मचारियों को ऐतिहासिक धक्का लगेगा।

महा बेरोजगारी की इंतहा

अगर बात देश की राजधानी दिल्ली की करें तो सितंबर में दिल्ली में बेरोजगारी की दर 4 महीने के उच्च स्तर पर पहुंचकर करीब 17 फ़ीसदी हो गई थी। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी या सीएमआईई के आंकड़ों से यह जानकारी मिली है। देश के उत्तरी राज्यों में बढ़ती बेरोजगारी की बात करें तो राजस्थान में बेरोजगारी की दर 18 फ़ीसदी के करीब पहुंच गई है, जबकि हरियाणा में यह 20.3 फ़ीसदी, जम्मू कश्मीर में 21.6 फ़ीसदी पर पहुंच गयी है। बिहार, त्रिपुरा, झारखंड और पुडुचेरी में बेरोजगारी की दर 10 से 15 फ़ीसदी के बीच है। देश के उत्तरी राज्य में बेरोजगारी की दर का यह ट्रेंड मिलाजुला है। 

यूपी में टीईटी का सवाल हो या फिर दरोगा भर्ती का, कोई ऐसा पेपर नहीं होता जिसमें धांधली न हुई हो। बिना कोर्ट का मुंह देखे, कोई भर्ती नहीं होती।
वहीं निजीकरण की बाट जोह रहे रेल मंत्रालय ने तो हद ही कर दी। ग्रुप-डी, एनटीपीसी के भर्ती विज्ञापन को करीब 3 साल होने जा रहे हैं, रेल मंत्रालय को छात्रों और शिक्षकों ने सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर-करके जगाया तो पता चला कि हां हमने कभी वैकेंसियों का नोटिफिकेशन भी निकाला था। खैर अब मंत्रालय ने आंख मूंदते हुए परीक्षा तारीख़ तो घोषित कर दी है।

कमर तोड़ती महंगाई 

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति नवंबर में बढ़कर तीन महीने के उच्च स्तर 4.91 प्रतिशत हो गई, जिसमें खाद्य कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई, केंद्र द्वारा उत्पाद शुल्क में कटौती के बाद भी बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि नवंबर में खाद्य मुद्रास्फीति बढ़कर 1.87 प्रतिशत हो गई, जो अक्टूबर महीने में 0.85 प्रतिशत थी।

नवंबर में ईंधन और हल्की मुद्रास्फीति एक महीने पहले 14.4 प्रतिशत के मुकाबले 13.4 प्रतिशत रही, जबकि सब्जियों की मुद्रास्फीति एक महीने पहले -19.4 प्रतिशत के मुकाबले -13.6 प्रतिशत दर्ज की गई। नवंबर में कपड़ा और फुटवियर मुद्रास्फीति एक महीने पहले 7.5 प्रतिशत की तुलना में 7.9 प्रतिशत थी, जबकि परिवहन और संचार मुद्रास्फीति अक्टूबर में 10.9 प्रतिशत के मुकाबले 10.02 प्रतिशत थी।

​वायदों का दौर खत्म हो चुका है। अब सवालों का दौर है, सवाल है कि क्या ऑक्सीजन के अभाव में मौत की शैय्या पर लौटने वाले नागरिकों के परिजन, भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बनने से अपने स्वजनों के इस दंभ को भुला पाएंगे?

अब देखना होगा कि यूपी की जनता ऐतिहासिक किसान आन्दोलन के बाद महाबेरोजगारी से जूझ रहे उत्तम प्रदेश की राह पर उतर प्रदेश की कमान किसे सौंपती है?

(प्रत्यक्ष मिश्रा लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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