Tuesday, November 29, 2022

आदिवासी भाषाओं को बचाने के लिए एक तदर्थ अध्यापिका का राष्ट्रपति के नाम खुला पत्र

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(आदिवासियों के नाम से बने सूबे झारखंड में आदिवासी भाषा बेहद उपेक्षा की शिकार है। आलम यह है कि एक उच्च शैक्षिक संस्था में पिछले 40 सालों में पहली बार आदिवासी भाषा से जुड़े पदों पर नियुक्ति हो रही है लेकिन उसमें भी अनियमितता और कदाचार का बोलबाला है। इस बात को लेकर आदिवासी समुदाय से जुड़े पढ़े-लिखे लोग बेहद आहत हैं और उनमें इसको लेकर एक किस्म का विक्षोभ है। इसी विक्षोभ को जाहिर करने और आवश्यक सुधार की आशा के साथ आदिवासी भाषा पढ़ाने वाली शांति खलखो ने महामहिम राष्ट्रपति को एक खुला पत्र लिखा है। पेश है उनका पूरा पत्र-संपादक)

महाशया,

सादर जोहार, नमस्कार।

विषय: आदिवासी भाषाओँ की नियुक्ति में जो कोताही बरती गयी है, या जो बरती जा रही है उस ओर ध्यान आकृष्ट करने हेतु।

मेरा नाम डॉ. शान्ति खलखो है। मैं कुरुख (आदिवासी) भाषा में असिस्टेंट प्रोफेसर की दावेदार हूँ। JPSC, राँची झारखण्ड के adv. no 04/2018 के रेगुलर पोस्ट में जो कमियाँ दिखाई पड़ रहीं उस ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहती हूँ।

सब्जेक्ट कोड 17 कुरुख के अनतर्गत कुल 16 पोस्ट दिखाएँ गए हैं।

10-unreserved,

03-SC,

02-BC-I,

01-BC-II के पोस्ट हैं।

ST के लिए 00 (शून्य)।

दिनांक 11 नवम्बर शाम को JPSC के वेबसाइट में फॉर्म भरने वाले 123 लोगों की सूची निकाली गई। सभी आदिवासी, एक भी दलित, OBC का कोई कैंडिडेट नहीं। जेपीएससी प्राशासन ने उनके लिए (SC, BC-I, BC-II के लिए) कोई कट ऑफ भी जारी नहीं किये क्योंकि कैंडिडेट उस केटेगरी में हैं ही नहीं। तो कुल 16 में से मात्र 10 पोस्ट पर बहालियाँ की जा सकेंगी और बाकी के 06 पोस्ट फिर से बिना नियुक्ति के खाली रह जायेंगी।

प्रशासन ने unreserved केटेगरी का कट ऑफ 45.65 तय किया है। इस कट ऑफ को ST कैंडिडेट के लिए अगर तय किया गया होता तो वह बिल्कुल और नीचे तय किया जाता। वहीं दूसरी बात यह भी तय किये जाने की है कि आदिवासी भाषाओँ के अपॉइंटमेंट पहली बार रिजल्ट सहित आ पा रहे हैं। अन्यथा 1996 में बिहार सरकार ने नियुक्ति के लिए इंटरव्यूज लिए उसका रिजल्ट आज तक नहीं आया। 2008 में झारखण्ड सरकार ने फिर इंटरव्यूज लिए और आज तक वह रिजल्ट दबा पड़ा हुआ है। कुल मिलकार नीयत यह निकल कर आ रही है कि आदिवासी भाषाओं को रोटी न बनने दिया जाए। यहाँ झारखण्ड में ओड़िया, बांग्ला आदि अन्य राज्यों की भाषाओं की रोटी झारखण्ड के विश्वविद्यालय में अपना पेट पाल रही। परन्तु, आदिवासियों की भाषाएँ यहाँ बार-बार रोक दी जा रही।

एक अन्य मुद्दा यह भी रेखांकित करने की है कि जिस विद्यार्थी ने 70 के दशक में 10 वीं, 12 वीं पास की, या जिन्होंने ग्रेजुएशन 80 के दशक में किया, वो विद्यार्थी आज 2000 के बाद पास किये गए विद्यार्थियों के समकक्ष कर दिए गए हैं। क्या उस समय की मार्किंग और वर्तमान समय की मार्किंग में कोई अंतर नहीं ? क्या यह सच नहीं है कि पहले के मूल्यांकन पद्धति में फर्स्ट डिवीज़न लाना कितना दुष्कर कार्य होता था, और आज जैसे 100% तक विद्यार्थी ला पाते हैं। ऐसा नहीं है कि यह समय ऐसा है जंहा तेज़ बच्चे हैं, बल्कि दशकों पीछे मार्क्स कम देकर विद्यार्थियों को और अधिक मेहनत के लिए प्रेरणा स्वरुप कम अंक दिए जाते थे। आज उन्हें एक तराजू में तौलकर क्या आप सही उम्मीदवारों को चिन्हित कर पा रहे हैं? इन अकादमिक परफॉरमेंस में क्या न्याय का पाना संभव है ?

हम सभी ने अब तक आदिवासी भाषाओँ में कई किताब लिखे, वो सिलेबस में पढ़ाई जाती हैं, पर हम पढ़ाने के लिए अयोग्य करार कर दिए जाते हैं। जैसा कि आज मैं भी भुक्त भोगी बन रही हूँ। हमारे द्वारा पढ़ाये गए विद्यार्थी जिनके उज्जवल भविष्य के लिए हमने उन्हें अच्छे मार्क्स दिए आज वो अकादमिक रिकॉर्ड में हम सबसे आगे हैं। आप नीति निर्धारकों के हाथों हमारी अकादमिक हत्याएं की जा रही हैं।

कृपया विचारें, यह खेल आदिवासी समाज के साथ निरंतरता से घटित हो रहा है। आदिवासी मात्र जंगलों में नहीं अपितु इन सरकारी संस्थाओं में भी हत्या के शिकार हो रहे। आदिवासी भाषाओँ को बचाने में जीवन खपा देने वाले हम सभी एक पीढ़ी आज आपकी तरफ देख रहे कि न्याय की कुर्सी में आप न्याय कर पाएंगी।

shanti2

‘संथाली’, ‘मुंडारी’, ‘हो’ भाषा के साथ इसी साल हुए इंटरव्यूज बहुत निराशाजनक रहीं। कई सीट्स नहीं भरी जा सकीं। क्योंकि वहाँ भी पोस्ट आदिवासियों के लिए आरक्षित न करके SC, और BC के लिए रिजर्व्ड करके बर्बाद किये गए। अच्छे कैंडिडेट्स जिनकी योग्यता प्रोफेसर बनने की है वह इंटरव्यू तक नहीं पहुँच पाए हैं, कारण मात्र अकादमिक मार्क्स के आधार पर उनको खारिज कर दिया जाना रहा। सालों से यह नियुक्तियां रोककर रखी गईं और आज जब बारी आई भी तो बेहतरीन कैंडिडेट्स बाहर कर दिए जा रहे। 1980 के दशक में आदिवासी भाषाओँ कि पढ़ाई के लिए यह आदिवासी भाषा का विभाग राँची विश्वविद्यालय में खोला गया। और यह पहली बार है जब उसमें नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की गई। 1990 का दशक बीता, 2000 बीता, 2010 बीता, 2020 बीता, और तब जाकर 2022 में यह नियुक्तियां आरंभ की गईं। कुल 40 साल में पहली बार यह नियुक्ति कि प्रक्रिया शुरू की गई, तो आदिवासी भाषाओँ में आदिवासियों के लिए कोई रिजर्व्ड पोस्ट नहीं। आखिर यह कितनी बड़ी धांधली है इस पर आप ध्यान दें।

याद रखें, आज महात्मा गाँधी का भी मूल्यांकन थर्ड डिवीज़न पाने के आधार पर हो रहा होता तो वह भी दरकिनार कर दिए जा रहे होते। जैसा कि झारखण्ड सरकार द्वारा 80 के दशक में हम सभी पढ़ने वालों और थर्ड डिवीज़न पाने वालों के साथ किया जा रहा। 2000 के बाद शिक्षा जगत में जैसे हर किसी को फर्स्ट डिवीज़न में पास करने कराने की रिवायत शुरू हो गई ऐसे में अभी के छात्र, छात्रों के साथ हमारा मूल्यांकन किया जाना सरासर गलत है।

 अतः आपसे अनुरोध करते हैं कि हस्तक्षेप करें। और न्याय दें। 1994 से कुरुख भाषा में NET JRF करके बैठे हुए हमलोगों का गुनाह क्या है ? क्यों ये नौकरियां तब से लेकर अब तक नहीं निकाली गई। हमने अपनी आयु क्यों आदिवासी भाषा के लिए दिया ? एडवर्ड कुजूर; जो रिक्शा खींचकर अपना परिवार चलाते हैं वह भी कुरुख पढ़ाने वाले लोगों में से हैं। क्या आदिवासी होना, आदिवासी भाषा की पढ़ाई करना, यह हमारे लिए सजा बना दी गई ? हमारे इतने सालों का श्रम जिसकी भरपाई क्या राज्य सरकार कर पाएगी ? यहाँ मैंने मात्र अपना सवाल नहीं उठाया है बल्कि हमारे जैसे हजारों लोगों का सवाल है जो इन आदिवासी भाषाओँ को बोलते आ रहे हैं। आने वाली पीढ़ियां फिर से हमारे जैसी गलतियां न करें कि वो कुरुख, मुंडारी, संथाली, हो, खड़िया आदि पढ़ें और राज्य सरकार उनको जीने तक न दें। हम सब आदिवासी भाषाओँ की पढ़ाई के पिलर स्वरुप गाड़कर अस्तित्वविहीन कर दिए जा रहे हैं।

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आपने (JPSC ने) भी जब असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति में बनने वाले इंटरव्यू बोर्ड को तैयार किया होगा तो आपने देखा होगा कि आपको एसोसिएट प्रोफेसर कतई नहीं मिल रहे होंगे। कुछ असिस्टेंट प्रोफेसर के बतौर कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हुए मिल भी गए होंगे तो वह बिना किसी advertisement के, बिना full fledged सैलरी के साथ नहीं मिलेंगे, क्योंकि उनका अपॉइंटमेंट किसी कमीशन और किसी यूनिवर्सिटी सर्विस के द्वारा नहीं किया गया। उनके पोस्ट का नेचर भी full fledged असिस्टेंट प्रोफेसर का नहीं है। जिसके वो हक़दार थे। ऐसे में आप आदिवासी समाज और उनके समाज के साथ घटित हो रहे अन्याय को कैसे जज्ब कर पा रहे होंगे आज आदिवासी राष्ट्रपति के पद में सुशोभित हो रहे हैं, लेकिन महामहिम को हमारी समस्याओं की तरफ भी देखना जरूर चाहिए। जिस समाज का वह प्रतिनिधित्व करती हैं, उनकी समस्याएँ कितनी विकराल बनी हुई हैं।

मैं 600 रुपये प्रति क्लास लेने के लिए रांची से हजारीबाग की दूरी जो 104 किलोमीटर है उसे तय करते हुए रोज अपने पढ़ाने की इच्छा को आकार दे रही। कृपया उसे सम्मान पूर्वक रोटी में तब्दील होने का हक दें। मेरे ही तरह अन्य कई हैं। आदिवासी भाषाओँ को यूँ मृत्यु की ओर न धकेलने दिया जाए।

नई शिक्षा नीति 2020, में आदिवासी भाषाओँ, मातृभाषाओं को बचाने सम्बन्धी कई बातें की गई थीं, क्या सत्ताएं वाकई उसको लेकर संजीदा हैं? संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू आदि अन्य बड़ी भाषाओँ की तरह क्या आदिवासी भाषाएँ भी सम्मान की रोटी दे पाने में समर्थवान बन पाएंगी। सम्पूर्ण आदिवासी समाज आप सभी की ओर उन्मुख होकर कहना चाहती है कि हमारी संस्कृति को बचाए रखने के लिए इन आदिवासी भाषाओँ को रोजगार से जोड़ना ही होगा। न्याय करें। हस्तक्षेप करें। जो आपके मन में आदिवासियों के प्रति प्रेम है उसे ‘करनी’ में बदल कर दिखाएँ भी। मात्र ‘कथनी’ से काम नहीं चलने वाला है।

सादर।

आभार

डॉ शांति खलखो

गेस्ट फैकल्टी (कुरुख)

ट्राइबल एंड रि जनल लैंग्वेज डिपार्टमेंट

विनोबा भावे यूनिवर्सिटी, हज़ारीबाग़, झारखण्ड।

मोब- 9905328984

ईमेल- [email protected]com   

दिनांक – 12 NOVEMBER 2022

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