सतुलज के क्लाइमैक्स में एक लंबा संवाद है जिसका लब्बोलुआब यह है कि सूरज के पहली बार अस्त होने पर लोगों को कैसा लगा होगा और किसी झोपड़ी में जलाये गए दिये ने अंधेरे को कैसे चुनौती दी होगी।
फिल्म भी एक दिये की तरह है जो ज़ुल्म, धक्केशाही के अंधेरे को चुनौती देती है।
दिलजीत दोसांझ फिल्म में उस मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की भूमिका कर रहे हैं, जिन्होंने पंजाब में आतंकवाद के बाद वाले दौर में सैकड़ों लोगों को “गायब करने”, उन्हें उग्रवादी बताकर मार देने और लावारिस लाशों के रूप में जला दिए जाने की पड़ताल की थी। उन्होंने परिजनों की तरफ से सवाल उठाया था कि कम से कम उन्हें यह बताया जाए कि उनके अपने ज़िन्दा हैं भी या नहीं ताकि एक क्लोज़र मिले।
खालरा ने यह श्मशान के रिकार्डों से खुलासा किया था और अनुमान है कि पंजाब भर में ऐसे गायब होने वाले लोगों की संख्या 25000 थी।
खालरा के मानवाधिकार हनन के इस मुद्दे को उठाने, अदालत में जाने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा करने से निजाम को परेशानी होनी ही थी। उसे धमकाया जाता है लेकिन वह नहीं डिगता और फिर उसका भी अपहरण कर लिया जाता है और हमेशा के लिए गायब कर दिया जाता है।
निर्माता रॉनी स्क्रूवाला और निर्देशक हनी त्रेहान की फिल्म पौने तीन घंटे की है लेकिन कसी हुई स्क्रिप्ट, सभी कलाकारों का सधा हुआ अभिनय कहीं भी तनाव कम नहीं होने देता और आप साँस थामे फिल्म देखते रहते हैं। फिल्म समाप्त होने के बाद भी आपके साथ रहती है और खालरा के सवाल आपको परेशान करते हैं, सवाल उठाने से जो उसे भुगतना पड़ता है, ‘पुलिस स्टेट’ से टकराने की कीमत अपनी जान से चुकानी पड़ती है, आपको व्यथित करता है।
विडंबना ही है कि फिल्म के मुख्य किरदार की तरह फिल्म को भी दमन (सेंसरशिप) का सामना करना पड़ रहा है। तीन साल फिल्म सेंसर बोर्ड में अटकी रही। फिल्मकारों ने समझौते से इंकार किया। (120 से ज्यादा कट्स के बाद फिल्म में बचता भी क्या?)। आखिर थिएट्रिकल रिलीज़ को त्यागकर ओटीटी पर रिलीज़ की लेकिन वहां से भी दो दिन में हटा ली गई।
ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी5 ने हालांकि कहा तो है कि वह कोशिश करेंगे कि फिल्म जल्द दर्शकों तक लौटे। उम्मीद ही की जा सकती है कि किसी भी अप्रिय सच से डरने वाली सरकार को सद्बुद्धि आएगी और फिल्म ओटीटी पर लौटेगी तथा लोग फिल्म देख पाएंगे।
(लेखक जनचौक से मुंबई से जुड़े हुए हैं।)