कछुए और खरगोश की पुरानी कहानी में कछुआ हमें सिखाता है कि धीमी लेकिन निरंतर गति अंततः जीत सुनिश्चित करती है। यह बचपन में हमारे द्वारा आत्मसात की गई सबसे पहली नैतिक शिक्षाओं में से एक है। लेकिन फिर भी जीवन कभी कभार हमें यह सिखा जाता है कि संयम की कीमत चुकानी पड़ सकती है।
यह सीख मुझे कुछ दिनों पहले मिली जब “सतलुज” फिल्म बिना किसी शोर के एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई। मैने खुद से कहा कि अभी कोई जल्दी नहीं है, मैं वीकेंड पर आराम से इसे देख लूंगा। लेकिन जब तक मैं तैयार हुआ, तब तक फिल्म गायब हो चुकी थी।
ज़ी नेटवर्क ने फिल्म रिलीज़ होने के दो दिन बाद ही इसे हटा दिया था। भारतीय दर्शकों के लिए अब यह फिल्म उपलब्ध नहीं है। अगर अभी मुझे यह फिल्म देखनी है तो मुझे किसी और देश में जाना पड़ेगा। इससे एक परेशान करने वाला सवाल उठता है: किसी भारतीय को एक भारतीय नागरिक पर बनी फिल्म देखने के लिए भारत क्यों छोड़ना पड़े?
इसका जवाब असुविधाजनक है। सच का सामना करने से राज्यसत्ता अभी भी डरती है। पंजाब के संदर्भ में इस सच्चाई का एक नाम है: जसवंत सिंह खालड़ा।
गौरतलब है कि अपहरण और हत्या किए जाने के दशकों बाद भी खालड़ा शक्तिशाली संस्थाओं को विचलित कर रहे हैं। यह डर खुद खालड़ा से नहीं बल्कि उन्होंने जो उजागर किया और उनकी कहानी आजाद भारत के इतिहास के जिस काले अध्याय को अनावृत करती है, उससे है।
खालड़ा का नाम एक बार फिर उभर आया था जब उनकी जिंदगी पर बनी फिल्म, पंजाब 95, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को सौंपी गई थी। एक चौंकाने तथा कई चीजें स्पष्ट करने वाले फैसले में बोर्ड ने फिल्म में 127 कट्स सुझाए थे।
यह एक तरह से सेंसर सर्टिफिकेट देने से मना करना था। जनता को उस आदमी की पूरी कहानी देखने से रोका गया जिसने सैकड़ों लोगों के अपहरण और गुप्त रूप से किए दाह संस्कार का भंडाफोड़ करते हुए अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी थी।
आखिरकार, अधिकारी ओटीटी पर रिलीज़ की इजाज़त देने के लिए मान गए, लेकिन ऐसा तभी हुआ जब प्रोड्यूसर फ़िल्म का असल शीर्षक छोड़ने को तैयार हुए। पंजाब 95 सतलुज बन गई, वही नदी जो पंजाब के बेहद त्रासद सालों की गवाह रही है।
खालड़ा से मेरा संबंध परोक्ष लेकिन काफी निजी है।
1994 में पटियाला ज़िले में एक कैथोलिक चर्च में लूट और तोड़ फोड़ की गई थी। शुरू में सिख चरमपंथियों को इस हमले का जिम्मेदार बताया गया। इसके नतीजों को लेकर चिंतित हो दिल्ली के आर्चबिशप ऐलन द लास्टिक ने एक तथ्यान्वेषी टीम का गठन किया, जिसका सदस्य मैं भी था।
पंजाब का वह मेरा पहला दौरा था, हालाँकि हिंदुस्तान टाइम्स का संपादकीय लेखक रहते हुए मैंने पंजाब में आतंकवाद पर विस्तार से लिखा था। वहाँ जो मैंने पाया उसने मेरी कई धारणाओं को चुनौती दी। हमारी जाँच से यह निष्कर्ष निकला कि चर्च में हुआ हमला चरमपंथियों ने नहीं बल्कि स्थानीय असामाजिक तत्वों ने किया था।
यह एक महत्वपूर्ण सीख थी। राष्ट्रीय आख्यान अक्सर जटिल वास्तविकताओं को सरलीकृत कर पेश करते हैं। सच शायद ही कभी सुविधाजनक धारणाओं के अनुरूप होता है।
द ट्रिब्यून से जुड़ने के कुछ वर्षों बाद मैने खालड़ा की कहानी को गंभीरता से समझा। 2003 की 18 मई को दिवंगत राम नारायण कुमार, जिनका मै प्रशंसक रहा हूं, ताज़ा छपी किताब “रेड्यूस्ड टू एशेज़: द इनसरजेंसी एंड ह्यूमन राइट्स इन पंजाब” के साथ मुझसे मिले। राम नारायण कुमार, अमरीक सिंह, अशोक अग्रवाल और जसकरण कौर द्वारा लिखी यह किताब अभी तक मेरे द्वारा पढ़ी गई किताबों में सबसे ज्यादा परेशान करने वाली है। बाद में द ट्रिब्यून के लिए मैंने इसकी समीक्षा लिखी थी।
इसका पहला अध्याय जसवंत सिंह खालड़ा को समर्पित है।
जो कहानी इसमें बयां की गयी है वह असामान्य है बिल्कुल इसलिए क्योंकि इसका नायक एक सामान्य आदमी है। खालड़ा कोई हथियारबंद क्रांतिकारी नहीं थे। न ही वे राजनीतिक बाहुबली थे। अकाली दल के मानवाधिकार सचिव होने के नाते उन्होंने सिर्फ पुलिस द्वारा अज्ञात शवों का दाह संस्कार करने वाली अफ़वाहों की पुष्टि करनी चाही थी।
उनकी पड़ताल अमृतसर के शवदाहगृह से शुरू हुई थी। वहाँ रखे रिकॉर्ड्स की उन्होंने बहुत सावधानीपूर्वक जाँच की। आधिकारिक रूप से दाह के लिए हर शव को करीब 300 किलोग्राम लकड़ी की ज़रूरत थी। लेकिन खालड़ा ने पाया कि पैसा बचाने के लिए अक्सर कई शवों का एक साथ ही जला दिया जाता था और उनकी अस्थियों को लेने कोई नहीं आता था।
इन आंकड़ों के पीछे एक डरा देने वाली सच्चाई थी। नौजवानों को गांवों से बिना वॉरेंट के उठा, आंखों में पट्टी बांधकर कर अवैध डिटेंशन केंद्रों में प्रताड़ित किया जाता था और फिर फेक एनकाउंटर में मारकर उन्हें अज्ञात आतंकी बता उनका दाह संस्कार कर दिया जाता था। आधिकारिक रिकॉर्ड्स से उनके नाम गायब हो जाते थे और उनके परिवारों से उनका अंतिम संस्कार करने का हक भी छीन लिया जाता था।
अकेले अमृतसर में खालड़ा ने ऐसे हज़ार दाह संस्कार के मामले दर्ज किए थे।
उन्होंने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में हैबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की। उनकी याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उनके पास मुकदमा करने का अधिकार नहीं है। इसने उनके दृढ़ निश्चय को और मजबूत बना दिया। उन्हें एहसास हो गया कि उन्होंने कुछ व्यवस्थित और भयावह चीज़ के सबूत खोज निकाले हैं।
जैसा अपेक्षित था, इसके बाद उन्हें धमकियाँ मिलने लगीं।
तरन तारण जिले के सीनियर सुपरिटेंडेंट अजित सिंह संधू उन लोगों में से एक थे जिन्होंने उन्हें खुले आम धमकाया था।
यह धमकी जल्द ही हकीकत में तब्दील हो गई।
एक सुबह जब खालड़ा अमृतसर के अपने घर के बाहर अपनी गाड़ी धो रहे थे तब एक पुलिस की गाड़ी वहाँ आयी। उन्हें दिन के उजाले में जबरन उठा लिया गया। संयोगवश, एक पत्रकार ने उनके अपहरण को देख लिया और तुरंत उनकी पत्नी परमजीत कौर को, जो गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरियन थी, इसकी सूचना दे दी थी।
व्याकुल होकर वे पुलिस थानों में उन्हें ढूंढने लगी, लेकिन उन्हें केवल यही सुनने को मिला कि शायद आतंकियों ने उनका अपहरण किया हो। जब अपनी आपबीती उन्होंने एसजीपीसी के अध्यक्ष जी एस टोहरा को सुनाई तब उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के जज कुलदीप सिंह को एक टेलीग्राम भेजा, जिसके बाद ही न्यायिक प्रक्रिया शुरू हो पाई।
टेलीग्राम को एक याचिका मानते हुए जस्टिस कुलदीप सिंह ने सुनवाई का आदेश दिया। सीबीआई को खालड़ा की गुमशुदगी के साथ-साथ अवैध दाह संस्कारो और न्यायेतर हत्याओं की जाँच करने का काम सौंपा गया।
इस जाँच के बाद वही हुआ जिसका सबसे अधिक डर था।
खालड़ा की अवैध गिरफ्तारी, टॉर्चर और हत्या की गई थी। पहचान होने से बचने के लिए कथित तौर पर उनके शरीर के टुकड़े कर दिए गए थे और फिर उसे चुपके से ठिकाने लगा दिया था। अजित सिंह संधू और उनके अधीनस्थ कई लोग गिरफ्तार किए गए थे। बताया जाता है कि बाद में संधू एक चलती ट्रेन के आगे कूद गए और ख़ुदकुशी कर ली।
सीबीआई की जाँच पूर्ण रूप से न्याय नहीं कर पाई थी। लेकिन बेशक इससे यह साबित हो गया था कि खालड़ा ने जिन आरोपों को बहुत मेहनत से दर्ज किया था, वे मनगढ़ंत नहीं थे। वे उस संगठित तंत्र की ओर इशारा करते थे जहाँ संवैधानिक सुरक्षा उग्रवाद विरोधी अभियानों के बोझ तले दब चुकी थे।
रिड्यूस्ड टू एशेज़ पढ़कर मुझपर गहरा असर हुआ था। यह यकीन करना मुश्किल था कि यह क्रूरता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में हो रही थी और सबूत भारी मात्रा में तथा ठोस थे।
इस किताब ने मुझे यकीन दिला दिया था कि खालड़ा की याद को संजोकर रखना केवल एक व्यक्ति को सम्मान देना नहीं था। यह उस उसूल की हिफ़ाज़त करना था जो मानता है कि सच के असह्य बन जाने पर लोकतांत्रिक समाज जीवित नहीं रह सकते हैं।
पिछले साल, खालड़ा का नाम एक और बार मेरे समक्ष आया, इस बार एक अनपेक्षित जगह पर — अमेरिका के एक प्राथमिक स्कूल का नाम उनके नाम पर रखा गया था।
उनके इस कदम ने मेरे दिल को छू लिया था। पंजाब से हज़ारों मील दूर एक समुदाय ने ये सुनिश्चित किया था कि बच्चे जब बड़े होंगे तो वे पूछें कि जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे। इससे भी ज्यादा संतोषजनक यह था कि उद्घाटन के वक्त उनकी पत्नी और बेटी वहाँ मौजूद थे। उन्हें पूरी जिंदगी जिस गौरव, मान्यता और सच से महरूम रखा गया वह धीरे धीरे स्मृति के माध्यम से वापस लिया जा रहा था।
वहीं भारत में, उनकी जिंदगी से प्रेरित फिल्म अभी भी मझधार में है। शायद यह अंतर अपनी खुद की कहानी कह रहा है।
सरकारें असहज करने वाली फिल्मों को दबा सकती हैं। संस्थानों को सवालों से बचाने के लिए सर्टिफिकेशन बोर्ड दसियों कट्स सुझा सकता है। रिलीज़ होने के बाद प्लेटफॉर्म्स चुपके से फिल्म हटा सकते हैं। लेकिन सच किताबों, अदालती दस्तावेजों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों, कक्षाओं, चर्चाओं और यहाँ तक कि किसी दूर दराज के एक स्कूल की इमारत के नाम में जिंदा रहता है।
जसवंत सिंह खालड़ा ने कभी बंदूक नहीं उठाई। उनके दस्तावेज़, उनकी दृढ़ता और उनका नैतिक साहस उनके हथियार थे। उन्होंने एक सीधा सा सवाल पूछा था: पंजाब के सारे बेटे कहाँ चले गए हैं?
इसे पूछने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
लेकिन क्योंकि उन्होंने यह सवाल किया था तो आने वाली पीढ़ियाँ इस सवाल का जवाब ढूंढती रहेगी—और किसी भी स्तर की सेंसरशिप न तो इस सवाल को मिटा सकती है और न ही उस व्यक्ति को जिसने यह सवाल पूछने का साहस किया था।
सच को दबाया जा सकता है लेकिन उसे मिटाया नहीं जा सकता। जसवंत सिंह खालड़ा का साहस सेंसरशिप से लड़कर आज भी जिंदा है जो हर लोकतंत्र को याद दिला रहा है कि स्मृति, न्याय और ज़मीर अंततः भय पर विजय प्राप्त कर लेते हैं।
(एजे फिलिप का लेख उनकी फेसबुक वॉल से साभार। अंग्रेज़ी से अनुवाद : शुभम रौतेला।)