क्यूबा की घेराबंदी : आर्थिक प्रतिबंध या साम्राज्यवादी युद्ध का नया चेहरा?

दुनिया के इतिहास में साम्राज्यवाद ने अपने रूप कई बार बदले हैं। कभी वह उपनिवेशवाद के रूप में आया, कभी सैन्य आक्रमण के रूप में और कभी कठपुतली सरकारों के सहारे। इक्कीसवीं सदी में उसने एक नया और अधिक परिष्कृत चेहरा धारण किया है—आर्थिक प्रतिबंधों का।

अब किसी देश को झुकाने के लिए उसकी सीमाओं पर सैनिक भेजना आवश्यक नहीं रह गया है। उसके बैंक बंद कर दीजिए, व्यापार रोक दीजिए, विदेशी निवेश अवरुद्ध कर दीजिए, जहाजों और बीमा कंपनियों को डरा दीजिए, डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था से उसे बाहर कर दीजिए—धीरे-धीरे उसकी अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा, उद्योग और अंततः उसका सामाजिक जीवन दम तोड़ने लगता है। यही आधुनिक आर्थिक युद्ध है।

क्यूबा इस आर्थिक युद्ध का सबसे पुराना शिकार है। छह दशक से अधिक समय से वह ऐसी नाकेबंदी झेल रहा है, जिसका विरोध विश्व समुदाय लगातार करता आया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बार फिर क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज ने आरोप लगाया कि अमेरिका केवल आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगा रहा, बल्कि क्यूबा के विरुद्ध “बहुआयामी और गैर-पारंपरिक युद्ध” चला रहा है। उनके शब्दों में यह नीति पूरे समाज को अस्थिर करने और मानवीय संकट पैदा करने का प्रयास है।

यह आरोप भावनात्मक अवश्य लग सकता है, लेकिन इसके पीछे का इतिहास बहुत लंबा है। 1959 की क्यूबा क्रांति के बाद जब फिदेल कास्त्रो ने अमेरिकी पूंजी के वर्चस्व को चुनौती दी, उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया और समाजवादी मार्ग अपनाया, तभी से अमेरिका ने क्यूबा को दंडित करने की नीति अपनाई। शीत युद्ध समाप्त हो गया, सोवियत संघ इतिहास बन गया, लेकिन क्यूबा पर लगी नाकेबंदी बनी रही।

इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि प्रतिबंधों का उद्देश्य केवल शीत युद्ध था, तो उसके समाप्त होने के बाद भी यह नीति क्यों जारी रही?

दरअसल यह केवल क्यूबा का प्रश्न नहीं था। यह पूरी दुनिया को दिया गया एक राजनीतिक संदेश था—जो देश अमेरिकी आर्थिक और सामरिक वर्चस्व को चुनौती देगा, उसे इसकी कीमत चुकानी होगी। इस दृष्टि से क्यूबा एक “उदाहरण” बना दिया गया।

अमेरिका का तर्क है कि प्रतिबंध लोकतंत्र और मानवाधिकारों के समर्थन में लगाए गए हैं। किंतु यदि किसी नीति के परिणामस्वरूप दवाइयों की कमी हो, अस्पतालों में उपकरण न पहुँच सकें, कृषि उत्पादन प्रभावित हो, ऊर्जा संकट गहरा जाए और आम नागरिकों का जीवन लगातार कठिन होता जाए, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उसकी वास्तविक कीमत कौन चुका रहा है—सरकार या जनता?

संयुक्त राष्ट्र महासभा में लगभग हर वर्ष भारी बहुमत से पारित प्रस्ताव इस बात का संकेत हैं कि अधिकांश देश इस नाकेबंदी को अनुचित मानते हैं। 2025 में भी भारी बहुमत ने अमेरिका से प्रतिबंध समाप्त करने की अपील की। यद्यपि महासभा के प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं होते, लेकिन वे वैश्विक नैतिक और राजनीतिक सहमति का दर्पण अवश्य होते हैं। इसके बावजूद यदि कोई महाशक्ति अपने निर्णय पर अडिग रहती है, तो यह प्रश्न केवल क्यूबा का नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रभावशीलता का भी बन जाता है।

यहाँ एक और तथ्य ध्यान देने योग्य है। आधुनिक विश्व व्यवस्था मुक्त व्यापार, वैश्वीकरण और खुले बाजार की बात करती है। किंतु वही व्यवस्था तब बदल जाती है, जब कोई देश महाशक्तियों की राजनीतिक प्राथमिकताओं से असहमत होता है। तब “मुक्त व्यापार” की जगह प्रतिबंध ले लेते हैं और “अंतरराष्ट्रीय नियम” शक्ति-संतुलन के अनुसार व्याख्यायित होने लगते हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह तटस्थ नहीं है, बल्कि उसमें शक्ति का असमान वितरण निर्णायक भूमिका निभाता है।

यह भी सच है कि क्यूबा की वर्तमान आर्थिक कठिनाइयों के लिए केवल अमेरिकी नाकेबंदी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उसकी अपनी आर्थिक नीतियाँ, उत्पादन क्षमता की सीमाएँ और संरचनात्मक समस्याएँ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। किसी भी गंभीर विश्लेषण को इस तथ्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। लेकिन यह स्वीकार करने के बाद भी यह नकारा नहीं जा सकता कि छह दशक से अधिक समय तक चले आर्थिक प्रतिबंधों ने इन चुनौतियों को कई गुना बढ़ा दिया है।

क्यूबा के विदेश मंत्री का यह कथन विशेष रूप से विचारणीय है कि “आज जो क्यूबा के साथ हो रहा है, वह कल किसी और देश के साथ भी हो सकता है।” वास्तव में यह केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि समकालीन विश्व राजनीति का यथार्थ है। आर्थिक प्रतिबंध अब विदेश नीति का सामान्य उपकरण बन चुके हैं। ईरान, वेनेज़ुएला, रूस, सीरिया और अनेक अन्य देशों के अनुभव बताते हैं कि आर्थिक दबाव आज सैन्य हस्तक्षेप का विकल्प बनता जा रहा है।

दुनिया के सामने मूल प्रश्न यह नहीं है कि क्यूबा की सरकार सही है या अमेरिका की नीति। मूल प्रश्न यह है कि क्या किसी भी राजनीतिक मतभेद का समाधान पूरे समाज को आर्थिक रूप से दंडित करके खोजा जा सकता है? क्या लाखों बच्चों, रोगियों, विद्यार्थियों और श्रमिकों को ऐसी नीतियों का बोझ उठाना चाहिए, जिनके निर्माण में उनकी कोई भूमिका नहीं है? यदि मानवाधिकार सार्वभौमिक हैं, तो आर्थिक प्रतिबंधों से उत्पन्न मानवीय पीड़ा भी मानवाधिकारों का प्रश्न है।

आज आवश्यकता ऐसी विश्व व्यवस्था की है जहाँ संवाद, कूटनीति और बहुपक्षीय संस्थाएँ वास्तविक अर्थों में प्रभावी हों। यदि अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कमजोर देशों के लिए लागू हो और शक्तिशाली राष्ट्र अपनी सुविधा के अनुसार उसका पालन करें, तो नियम-आधारित व्यवस्था का नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है।

क्यूबा की कहानी इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह हमें याद दिलाती है—युद्ध केवल गोलियों और बमों से नहीं लड़े जाते। आर्थिक नाकेबंदी, वित्तीय अलगाव और व्यापारिक प्रतिबंध भी समाजों को भीतर से तोड़ सकते हैं। आधुनिक साम्राज्यवाद की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह अपने हिंसक प्रभाव को अक्सर “प्रतिबंध”, “दबाव” और “नीति” जैसे प्रशासनिक शब्दों के पीछे छिपा देता है।

क्यूबा पर लगी नाकेबंदी केवल एक देश की त्रासदी नहीं है; वह इस प्रश्न की कसौटी है कि क्या इक्कीसवीं सदी की विश्व व्यवस्था वास्तव में न्याय, समानता और संप्रभुता के सिद्धांतों पर आधारित है, या फिर आज भी शक्ति ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अंतिम सत्य बनी हुई है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक धरती के संपादक हैं।)

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