Saturday, October 23, 2021

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दास्तानगोई

उर्दू के क्लासिक अदब को जिंदा कर गए शम्सुर्रहमान फारूकी

यह सन् 1998 की बात है। तब मैं प्रकाशन विभाग से निकलने वाली उर्दू मैगजीन आज कल में सब एडिटर था और मेरे संपादक थे शम्सुर्रहमान फारूकी के भाई महबूब रहमान फारूकी साहब। तब शम्सुर्रहमान साहब का एक मजमून...

अलविदा शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी! दास्तानगोई को जिंदा कर खुद बन गए दास्तां

1995 के आस-पास का वक्त रहा होगा। किसी बातचीत में उनकी लाइब्रेरी का ज़िक्र सुना था। इलाहाबाद के घर में उनकी लाइब्रेरी के क़िस्से की छाप दिमाग़ में रह गई। हम अपनी निजी चर्चाओं में उन्हें लाइब्रेरी वाले फ़ारूक़ी...
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अडानी-भूपेश बघेल की मिलीभगत का एक और नमूना, कानून की धज्जियां उड़ाकर परसा कोल ब्लॉक को दी गई वन स्वीकृति

रायपुर। हसदेव अरण्य क्षेत्र में प्रस्तावित परसा ओपन कास्ट कोयला खदान परियोजना को दिनांक 21 अक्टूबर, 2021 को केन्द्रीय...
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