Ram Rahim

आस्था के नाम पर जाल : क्यों बार-बार फँसता है समाज और बच निकलते हैं बाबा?

पिछले कुछ वर्षों में भारत में एक अजीब-सी पुनरावृत्ति देखने को मिल रही है। समय-समय पर कोई… Read More

दिल्ली चुनाव के पहले 12 वीं बार 30 दिन के पैरोल पर फिर बाहर आया राम रहीम

एक सजायाफ्ता अपराधी को जेल में अच्छे आचरण को आधार बना कर यूं बार-बार राज्य के आसपास या… Read More

राम रहीम के बाद लारेंस बिश्नोई: भाजपा के नए आराध्य, संघियों के नए ‘पां-पां’

जैसे कोई खिलाड़ी किसी बड़े मुकाबले को जीतकर आने के बाद अपनी ट्रॉफी दिखाते हुए खुशी और… Read More

राम रहीम को अब हाईकोर्ट की अनुमति के बिना नहीं मिलेगी पैरोल, हरियाणा सरकार को फटकार 

गुरमीत राम रहीम को लगातार पैरोल मिलने के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए… Read More

आज की सुबह पहले जैसी न थी, हवाओं में खून से सनी गंध महसूस की जा सकती थी

चालीस साल की बसासत का एक शांतिप्रिय शहर पल भर में तहस नहस हो जाता है। 28 लोगों के खून से सनी मेरे इस खूबसूरत शहर की मिट्टी का दर्द क्यों कोई जाने। उन्हें बस जुमलेफेंकने आते हैं। अजीबो-गरीब तर्क देने आते हैं। वे कुर्सी पर काबिज रह कर भी जवाबदेही से बचना चाहते हैं। प्रश्न गहरे हैं और हमारी बेचैनियां उस से भी ज्यादा गहरी हैं। क्योंकि उन प्रश्नोंके उत्तर हमारे पास नहीं हैं।  हमने एक अरसे से एक आदत बना रखी है कि धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों को हम या तो अंधभक्ति से सुलझाना चाहते हैं या राजनेताओं की बिसात परबिछी शतरंज की चालों के द्वारा। दोनों तरीकों से प्रश्न और उलझते हैं।  हम और अकेले हो जाते हैं। संस्कृति के मानवीय मूल्य तक हमारा साथ छोड़ने की हद तक चले गए दिखाई देते हैंऔर हमारे साथ जो खेल खेला जा रहा होता है उसके नायक या तो व्याभिचारी बाबा होते हैं या भ्रष्ट राजनेता। इन दोनों की मिलीभक्त से मेरे प्रिय शहर का जो हाल हुआ उसे मैंने अपनीआँखों से देखा। इन आँखों में अब आंसू भी नहीं हैं। आँखे बस घूर रही हैं अजनबी हो गयी मानवीय संवेदनाओं को। किस के पास इसका उत्तर है? मन बहुत आहत है… कल के घटनाक्रम से मन आहत है। आज की सुबह पहले जैसी… Read More