Survival of the Fittest का झूठ: एक वैचारिक भ्रांति का निवारण

मनुष्य सदा से यह प्रश्न पूछता आया है कि उसे बचाने वाला कौन-सा गुण है; बल, बुद्धि, भाग्य या अनुकूलन? प्रकृति के मौन संगीत में क्या कोई ऐसा विधान है जो यह तय करता हो कि कौन टिकेगा और कौन मिटेगा? या फिर यह मनुष्य की सत्ता-लिप्सा है, जो प्रकृति की ध्वनि को तोड़-मरोड़कर अपने प्रभुत्व का औचित्य रचती है? प्रश्न यह नहीं है कि कौन बचा, प्रश्न यह है कि कौन किस मूल्य पर बचा, और किसे कुचलकर?

हमें अक्सर यह सुनने को मिलता है कि ‘जो श्रेष्ठ है वही बचेगा’, या कि ‘Survival of the fittest’ अटल वैज्ञानिक सत्य है, जिसे डार्विन ने प्रतिपादित किया था। लेकिन जब हम इस कथन के वैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण में उतरते हैं, तो स्पष्ट होता है कि यह न केवल डार्विन के विचारों की विकृति है, बल्कि इसे प्रचारित करने वाले वे लोग हैं जो विज्ञान के नाम पर सामाजिक शोषण, वर्ग भेद और नस्लीय श्रेष्ठता की अवधारणाओं को वैधता प्रदान करना चाहते हैं।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ‘Survival of the fittest’ वाक्य डार्विन का है ही नहीं। यह बात हर्बर्ट स्पेंसर ने कही थी। यह वाक्य पहली बार 1864 में स्पेंसर की किताब ‘Principles of Biology’ में आया था, न कि डार्विन की ‘On the Origin of Species’ के मूल संस्करण में। डार्विन ने बाद में, 1869 के संस्करण में, स्पेंसर के इस वाक्य को ‘natural selection’ के पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया, लेकिन यह वैज्ञानिक आवश्यकता से अधिक सामाजिक दबाव और उस समय के पूँजीवादी चिंतन का प्रभाव था। स्वयं डार्विन ने अपने लेखन में ‘fitness’ को ताक़त, चालाकी या श्रेष्ठता के अर्थ में नहीं, बल्कि ‘environment के अनुसार अनुकूलन की क्षमता’ के रूप में परिभाषित किया था।

यहाँ बड़ा बौद्धिक धोखा यह हुआ कि fitness को समाज में श्रेष्ठता के रूप में समझा गया, और फिर श्रेष्ठता को भी जाति, वर्ग, नस्ल, बुद्धिमत्ता, हिंसा या बाहुबल जैसे मापदंडों से जोड़ दिया गया। इस प्रकार डार्विन का वैज्ञानिक सिद्धांत, जिसे उन्होंने जैविक विकास को समझाने के लिए प्रस्तुत किया था, सामाजिक अन्याय को वैध ठहराने का औजार बना दिया गया।

यह वह जगह है जहाँ डार्विन और स्पेंसर के बीच का अंतर हमें स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। डार्विन का विकासवाद जैविक प्रक्रिया है, जिसमें अनगिनत अनुकूलन, परिवर्तन, और असंख्य पीढ़ियों की लंबी यात्रा शामिल है। इसके केंद्र में ‘evolution’ है, ऐतिहासिक, प्रक्रियागत, और संघर्षपूर्ण यात्रा। जबकि स्पेंसर समाजशास्त्री और राजनीतिक चिंतक था, जो पूँजीवादी व्यवस्था का समर्थक था और जिसे समाज में प्रतिस्पर्धा, निजी स्वामित्व और असमानता को नैसर्गिक सिद्ध करने की ज़रूरत थी। इसलिए उसने जैविक विकास के एक अंश, ‘natural selection’, को तोड़-मरोड़कर ‘Survival of the fittest’ बना डाला, और फिर इस कथन को समाज में प्रतिस्पर्धा के औचित्य के रूप में प्रचारित किया।

हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) (1820–1903) ब्रिटिश दार्शनिक, समाजशास्त्री, और राजनीतिक सिद्धांतकार थे, जो विक्टोरियन युग के सबसे प्रभावशाली विचारकों में गिने जाते हैं। वे जैविक विकासवाद (evolution) के सिद्धांत को सामाजिक और नैतिक जीवन में लागू करने के लिए प्रसिद्ध हैं। हालाँकि चार्ल्स डार्विन ने जैविक विकास का सिद्धांत प्रस्तुत किया था, लेकिन ‘Survival of the Fittest’ शब्द सबसे पहले हर्बर्ट स्पेंसर ने 1864 में अपनी पुस्तक Principles of Biology में प्रयोग किया। 

स्पेंसर ने जैविक विकास के सिद्धांतों को समाज और राजनीति पर भी लागू किया। उन्होंने माना कि समाज भी जैविक इकाई की तरह विकसित होता है, और जो व्यक्ति या समूह ‘फिट’ है, वही जीवित रहता है। उन्होंने इसे आर्थिक प्रतिस्पर्धा, जातीय श्रेष्ठता और औद्योगिक उदारवाद के समर्थन में प्रयोग किया। वे लासेज़-फेयर (laissez-faire) पूँजीवाद के समर्थक थे। उनका मानना था कि राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, बल्कि समाज को प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया से ही विकसित होना चाहिए। उन्होंने सरकारी सहायता, श्रम सुधार और कल्याण योजनाओं का विरोध किया। स्पेंसर का दर्शन ‘Synthetic Philosophy’ कहलाता है, जिसमें उन्होंने भौतिकी, जीवविज्ञान, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और नैतिकता को साझा तर्क और विकासवादी परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

स्पेंसर का विचार औपनिवेशिक मानसिकता, नस्लीय श्रेष्ठता और पूँजीवादी शोषण का औचित्य बना। और हिटलर के काल में फासीवादी और नस्लवादी विचारों को वैचारिक आधार देने के काम आया। आधुनिक समाजशास्त्र और जीवविज्ञान स्पेंसर के ‘Survival of the Fittest’ के गलत सामाजिक उपयोग को नकार चुके हैं। उनकी सोच आज के संदर्भ में सिर्फ अवैज्ञानिक नहीं, अमानवीय भी मानी जाती है।

विडंबना ये है कि आज भी बहुत से ‘उदारवादी’ और ‘टेक्नोक्रेटिक’ विचारक डार्विन के नाम पर इसी स्पेंसरवादी दर्शन को आगे बढ़ाते हैं। वे यह मानते हैं कि समाज में जो सफल है, वही योग्य है, और जो योग्य है, वह सफल होगा। यह गोलमोल तर्क है जिसमें निष्कर्ष और कारण एक ही होते हैं। यह न तो कोई वैज्ञानिक तर्क है और न ही तार्किक।

यदि हम ‘fitness’ को इस tautological चक्र से बाहर निकालना चाहें तो हमें परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अनुकूलन की वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकारना होगा। लेकिन यहाँ एक और बाधा आती है। मनुष्य के संदर्भ में ‘परिस्थिति’ क्या है? क्या यह प्राकृतिक है? नहीं। मनुष्य की सामाजिक परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं। वे प्राकृतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और वर्गीय होती हैं। ये परिस्थितियाँ उत्पादन के साधनों पर किसका नियंत्रण है, इससे तय होती हैं। इसलिए यदि कोई पूँजीपति वर्ग गरीब मजदूरों को भुखमरी, बेघरी और शिक्षा के अभाव में धकेल दे, और फिर कहे कि ‘जो अनुकूलित होगा वही बचेगा’, तो यह धोखा है।

डार्विन का सिद्धांत विकास का संघर्षशील, ऐतिहासिक और भौतिक प्रक्रिया है। जैसे जीवों के बीच उनकी जैविक संरचना और वातावरण के बीच द्वंद्व चलता है, वैसे ही समाज में भी उत्पादन शक्तियों और उत्पादन संबंधों के बीच द्वंद्व होता है। यह द्वंद्व ही सामाजिक विकास का कारण है। इसलिए डार्विन और मार्क्स के विचारों में गहरी समरूपता दिखाई देती है। दोनों इतिहास को एक प्रक्रिया मानते हैं, जिसमें निरंतर परिवर्तन और द्वंद्व होते हैं।

मार्क्स ने स्वयं 19वीं शताब्दी के अंत में डार्विन की किताब ‘Origin of Species’ की अत्यंत सराहना की थी। उन्होंने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था कि डार्विन का सिद्धांत प्राकृतिक इतिहास में वर्ग संघर्ष की तरह है। इससे स्पष्ट होता है कि मार्क्स डार्विन को उस समय के अन्य विचारकों से अलग मानते थे। वह डार्विन को वैज्ञानिक क्रांतिकारी के रूप में देखते थे, जबकि स्पेंसर जैसे चिंतकों को पूँजीवाद के औचित्यशास्त्री।

आज जब हम ‘श्रेष्ठता’ की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि ‘श्रेष्ठ’ कौन है, इसका निर्धारण समाज करता है, और वह समाज, जिसमें एक वर्ग प्रभुत्व में है, उसकी श्रेष्ठता की परिभाषा भी अपने हितों के अनुरूप होगी। इसलिए यदि कोई कहे कि ‘जो सबसे ज्यादा पैसा कमाता है, वही सबसे फिट है’, तो यह पूँजीवादी नैतिकता का मुखौटा भर है। इसी प्रकार, यदि कोई कहे कि ‘जो उच्च जाति में जन्मा है, वही श्रेष्ठ है’, तो यह जातिवादी व्यवस्था का उदाहरण है।

डार्विन की मौलिक अवधारणा उद्विकास (evolution) है, न कि केवल natural selection। और यह भी महत्वपूर्ण है कि डार्विन ने ‘selection’ को प्रकृति की अमूर्त शक्ति के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक प्रक्रिया के रूप में, जिसमें विविधताएं उत्पन्न होती हैं, कुछ टिकती हैं, कुछ समाप्त हो जाती हैं। यह सब किसी नियत नियम से नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक और जटिल प्रक्रिया के तहत होता है। वहीं दूसरी ओर ‘प्रकृति बनाम मानव’ या ‘मानव बनाम समाज’ जैसी द्वंद्वात्मक धारणाएँ भी हमारे समझने की प्रक्रिया को जटिल बनाती हैं, क्योंकि मनुष्य स्वयं प्रकृति का हिस्सा है और प्रकृति पर प्रभाव डालने की उसकी क्षमता भी विकास का ही हिस्सा है।

समस्या तब और गहराती है जब लोग विज्ञान के शब्दों को लेकर अवैज्ञानिक निष्कर्ष निकालते हैं। ‘Fitness’, ‘Evolution’, ‘Selection’, ‘Adaptation’ जैसी वैज्ञानिक संज्ञाएँ जब बिना संदर्भ के किसी समाजशास्त्रीय या दार्शनिक विमर्श में उपयोग होती हैं, तो वे अक्सर भ्रामक हो जाती हैं। यह प्रवृत्ति बहुत व्यापक है। कोई ‘quantum’ शब्द को आध्यात्मिकता से जोड़ता है, कोई ‘entropy’ से सामाजिक पतन को सिद्ध करता है, तो कोई ‘genetics’ से जाति व्यवस्था की वैधता खोजता है। यह वैज्ञानिक शब्दों की चुराई गई आभा से समाज को मूर्ख बनाने की रणनीति है, जिसे हमें पहचानना होगा।

हमारे समय की सबसे बड़ी बौद्धिक जिम्मेदारी यह है कि हम विज्ञान को विज्ञान की भाषा में समझें, और जब उसे समाज के प्रश्नों से जोड़ें, तो उसकी दार्शनिक नींव की गहराई में उतरें। डार्विन का विकासवाद हमें यह नहीं सिखाता कि कोई श्रेष्ठ है इसलिए वह बचेगा, बल्कि यह सिखाता है कि निरंतर परिवर्तन और संघर्ष की प्रक्रिया से ही कुछ जीव टिकते हैं, और यह टिकना भी स्थायी नहीं होता।

इसी दृष्टिकोण से हमें यह स्वीकार करना होगा कि समाज में यदि कुछ वर्ग टिके हुए हैं तो वह उनके श्रेष्ठ होने का प्रमाण नहीं, बल्कि उनकी सत्ता संरचना का प्रमाण है। इसलिए हमें न सिर्फ ‘fitness’ की परिभाषा पर पुनर्विचार करना है, बल्कि यह भी देखना है कि किसने उसे परिभाषित किया और किस उद्देश्य से।

इस पूरी बहस का निष्कर्ष यह है कि ‘Survival of the fittest’ वैज्ञानिक तथ्य नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता की विकृत वैधता है, जिसे विज्ञान के नाम पर गढ़ा गया। डार्विन का विज्ञान हमें मुक्त करता है, स्पेंसर का दर्शन हमें गुलाम बनाता है। इसलिए आज जब समाज के युवाओं को, विद्यार्थियों को, शिक्षकों को और बुद्धिजीवियों को यह कहा जाता है कि ‘तुम्हें सबसे श्रेष्ठ बनना होगा, तभी तुम बचोगे’, तो यह केवल सामाजिक भय नहीं, बल्कि योजनाबद्ध बौद्धिक शोषण है।

विकास का सिद्धांत यह नहीं कहता कि सभी को दौड़ में भाग लेना होगा, बल्कि यह कहता है कि विविधता, सहयोग, संघर्ष, और अनुकूलन से ही विकास संभव है। यही विचार हमें बेहतर समाज की ओर ले जाता है; जहाँ श्रेष्ठता नहीं, बल्कि सहजीविता (mutualism), समानता, और नैतिक विवेक का स्थान हो। इसलिए इस संसार में बचना है तो केवल ‘फिटनेस’ से नहीं, संवेदना, सहजीवन और सजगता से। क्योंकि अंततः वही बचेगा, जो दूसरों के बचने की जगह भी छोड़ेगा।

(मनोज अभिज्ञान स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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