संभल मामले पर आज उच्चतम न्यायालय में सुनवाई होने जा रही है तो उधर उत्तर प्रदेश सरकार ने संभल हिंसा की जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन किया है। दरअसल संभल में जो कुछ हुआ है उसे बहराइच की निरंतरता में देखा जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश में इस तरह की घटनाएं ताबड़तोड़ क्यों हो रही हैं? योगी जी की कथित अच्छी कानून व्यवस्था का क्या हुआ?
दरअसल लोकसभा चुनाव में विशेषकर यूपी में लगे धक्के के बाद संघ-भाजपा की नई रणनीति का यह हिस्सा है। ध्रुवीकरण के लिए ये दो अब आजमाए हुए नुस्खे बन चुके हैं। भीड़ के साथ धार्मिक जुलूस निकालकर मुस्लिम बस्ती या मस्जिद के सामने गाली गलौज भरे उत्तेजक नारों, गानों के माध्यम से उकसावेबाजी और हिंसा या फिर मस्जिद-मजार को किसी मंदिर को तोड़कर बनाए जाने के नाम पर सर्वे के बहाने उकसावेबाजी और हिंसा।
बहराइच में पहला नुस्खा अपनाया गया तो संभल में दूसरा। कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय की ऐसे घेराबंदी की जा रही है कि वह या तो समर्पण कर दे, विपक्षी दलों को वोट देना बंद कर दे, अपनी अधिकार विहीनता को स्वीकार कर ले अथवा उकसावे के जाल में फंस जाय, ताकि उसे हमलावर साबित किया जा सके।
संभल में 16वीं सदी की शाही जामा मस्जिद को बताया जा रहा है कि वह 1526 में मंदिर तोड़कर बनाई गई है। संभल की यह मस्जिद पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक है। अब दावा किया जा रहा है कि यह हरिहर मंदिर को तोड़कर बनाया गया था।
इसके लिए कोर्ट के आदेश के माध्यम से सर्वे का निर्देश प्राप्त किया गया। उसी दिन 19 नवंबर को आनन फानन में सर्वे हो भी गया। लेकिन फिर 24 नवंबर को दूसरी बार सर्वे टीम पहुंच गई। उसके पीछे पीछे जय श्रीराम के नारे लगाती पूरी उन्मादी भीड़ और पुलिस। आखिर दूसरे पक्ष को बिना सुने कोर्ट ने जल्दबाजी में आदेश क्यों जारी कर दिया?
लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब एक बार सर्वे हो गया तो फिर दोबारा सर्वे क्यों करवाया जा रहा था और इसके माध्यम से उकसावे की कार्रवाई की गई। 24 नवंबर की इस घटना में 5 लोगों की मौत हो गई और अनेक घायल हुए। पुलिस एकतरफा कार्रवाई कर रही है जिसमें दर्जनों लोग गिरफ्तार हो चुके हैं, जिनमें महिलाएं और नाबालिग भी शामिल हैं तथा सैकड़ों लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो चुका है जिनमें वहां के सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क और सपा विधायक इकबाल महमूद के बेटे भी शामिल हैं, जो अखिलेश के बयान के अनुसार उस दिन संभल में थे ही नहीं।
जिस तरह सीएए आंदोलन के समय लखनऊ हिंसा के आरोप में लखनऊ में तमाम लोगों के, जिनमें नागरिक समाज की अनेक प्रतिष्ठित शख्सियतें थीं, पोस्टर चौराहों पर लगाए गए थे, उसी अंदाज में संभल में 100 से अधिक उपद्रवियों को चिह्नित कर उनके पोस्टर सोशल मीडिया और चौराहों पर लगाए गए हैं। डीजीपी मुख्यालय ने सरकारी और निजी संपत्तियों को हुए नुकसान का ब्यौरा मांगा है और आरोपियों से उसकी वसूली का निर्देश दिया है।
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि यह पूजास्थल कानून 1991 की भावना का खुला उल्लंघन है जिसके अनुसार बाबरी मस्जिद राम मंदिर विवाद के अलावा अन्य किसी धर्मस्थल के चरित्र को नहीं बदला जाएगा, वह 15 अगस्त 1947 को जिस स्वरूप में था, उसे बरकरार रखा जाएगा।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस कानून के रहते हुए ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे को यह कहकर उच्चतम न्यायालय ने इजाजत दे दी कि इससे कानून का उल्लंघन नहीं होता। इसके पहले इसी तरह के सर्वे मथुरा और काशी में करवाए गए थे। यह एक टेम्पलेट है जिसके माध्यम से तनाव और उत्तेजना फैलाने की साजिश की जाती है। जाहिर है अब लोगों की उम्मीदें सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी हुई हैं और संभल हिंसा की न्यायिक जांच तथा सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग उठ रही है।
जहां गोली चलाते हुए पुलिस के तमाम वीडियो वायरल हो रहे हैं, वहीं पुलिस का कहना है कि गोली देशी हथियारों से चलाई गई है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस पुलिस के ऊपर लोगों के रक्षा की जिम्मेदारी है, उसी के हाथों तमाम लोगों की जान जा रही है।
आखिर 1991 के कानून के बावजूद जगह जगह मंदिर मस्जिद का यह विवाद क्यों खड़ा हो रहा है। और इसका तो कोई अंत नहीं दिखता, क्योंकि मस्जिदें तो हर कहीं मौजूद हैं। अगर इस तरह सब मस्जिदों को खोदकर मंदिर तलाशे जाते रहे तो यह तो तनाव और हिंसा का एक अंतहीन सिलसिला चल पड़ेगा। अब न सिर्फ मथुरा और काशी या ताजमहल और कुतुब मीनार बल्कि अजमेर शरीफ की दरगाह पर भी दावा ठोक दिया गया है।
ऐसा प्रतीत होता है कि लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अपनी भारी पराजय से घबड़ाई हुई भाजपा अब पूरे प्रदेश को खतरनाक सांप्रदायिक विभाजन की अंधी गली में धकेल रही है। उसके पास महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली जैसे जनता के ज्वलंत मुद्दों पर कुछ भी नया देने के लिए नहीं है।
अब उसका एकमात्र एजेंडा ध्रुवीकरण बचा है। जाहिर है सत्ता के उसके राजनीतिक खेल में मुस्लिम समुदाय एक बड़ी बाधा बनकर खड़ा है, वे बड़े पैमाने पर भाजपा को हराने के लिए विपक्ष के साथ खड़े हो रहे हैं। मौजूदा संविधान के रहते उन्हें मताधिकार से वंचित करना भी संभव नहीं है, जो आरएसएस का एक प्रमुख लक्ष्य है कि मुसलमान सारे नागरिक अधिकारों से वंचित दोयम दर्जे के नागरिक बनकर भारत में रहें। भारत एक हिंदू बोलबाला वाला राष्ट्र बन जाय। ऐसी स्थिति में कानूनी अधिकार के बावजूद उन्हें मताधिकार से वंचित करने का दूसरा रास्ता निकाला गया जो खास तौर से उपचुनावों के दौरान कई जगह दिखा।
मुस्लिम बस्तियों के इर्द गिर्द पुलिस लगाकर उन्हें वोट डालने के लिए बूथ पर पहुंचने से ही रोक दिया गया। पिस्तौल ताने पुलिस अधिकारी के सामने बेखौफ अपने मताधिकार के लिए लड़ती महिलाओं का वीडियो वायरल हुआ।
इसी टेम्पलेट का हिस्सा यह भी है कि जहां जहां संभव हो वहां मुसलमानों को लक्षित किया जाए, उन्हें उकसाया जाय और हमलावर करार देकर उन्हें बदनाम किया जाय, उनके खिलाफ हिंदुओं के अंदर नफरत भरी जाय और हिंदुओं का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण किया जाय। इसी रणनीति का नारा योगी ने दिया है कि “बंटोगे तो कटोगे” और मोदी ने अपने शब्दों में कहा कि “एक हैं तो सेफ हैं।”
विपक्षी दलों और लोकतांत्रिक ताकतों को संघ भाजपा द्वारा देश की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी को अलगाव में डालने, उन्हें निशाना बनाने और उन्हें दोयम दर्जे के नागरिक में बदल देने के प्रयास को नाकाम करने के लिए मजबूती से मुसलमानों के साथ खड़ा होना होगा।
(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं)
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