भारतीय रेल केवल एक परिवहन व्यवस्था नहीं है, वह इस देश की सामाजिक संरचना, मानसिकता और नागरिक अनुशासन का चलता-फिरता प्रतिबिंब है। लाखों लोग प्रतिदिन इसके माध्यम से यात्रा करते हैं, और इस विशाल व्यवस्था के भीतर हमारे समाज की अच्छाइयाँ और कमियाँ दोनों स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। आरक्षित डिब्बों में अनधिकृत यात्रियों का धड़ल्ले से प्रवेश और कब्ज़ा उसी विघटनकारी प्रवृत्ति का एक जीवंत उदाहरण है, जो आज भारतीय समाज में गहराई तक पैठ बना चुकी है।
आज उदयपुर-खजुराहो एक्सप्रेस (गाड़ी संख्या 19666) के ए-2 डिब्बे में हुई एक साधारण-सी घटना इस व्यापक समस्या की गम्भीरता को उजागर करती है। जब मैं अपनी आरक्षित बर्थ पर पहुँचा, तो वहाँ पहले से तीन अनधिकृत यात्री बैठे हुए थे। उन्हें हटाने का अनुरोध करने पर उन्होंने किसी अपराधबोध के बजाय एक प्रकार का एहसान जताते हुए कहा—“आप भी बैठ जाइए।” यह उत्तर केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि उस मानसिकता का परिचायक है जहाँ नियमों का पालन करना मूर्खता और उनका उल्लंघन करना सामान्य व्यवहार बन चुका है।
जब उनसे उनकी सीट के बारे में पूछा गया, तो उत्तर मिला—“बस भरतपुर तक जाना है, सीट नहीं है।” यह तर्क भारतीय समाज में प्रचलित उस नैतिक छूट का प्रतीक है, जिसमें व्यक्ति अपने छोटे से स्वार्थ के लिए नियमों को तोड़ना उचित मान लेता है। थोड़ी देर बाद वे यात्री स्वयं ही दूसरी खाली बर्थ पर चले गए, लेकिन उनकी जगह तुरंत अन्य लोग आकर बैठ गए। यह सिलसिला निरंतर चलता रहा, मानो यह एक स्थापित व्यवस्था हो—एक अनौपचारिक, लेकिन सर्वमान्य ‘सिस्टम’।
स्थिति तब और विचलित करने वाली हो गई जब कंडक्टर से इस विषय में पूछताछ की गई। उसका उत्तर था—“भीड़ हो जाती है तो उतार देते हैं।” यह कथन अपने भीतर प्रशासनिक उदासीनता और कर्तव्यहीनता का गहरा संकेत समेटे हुए है। नियमों का पालन करवाने की जिम्मेदारी जिन पर है, वे ही यदि उन्हें परिस्थितियों के अनुसार ढीला या सख्त करने लगें, तो व्यवस्था का पतन अवश्यंभावी हो जाता है।
कंडक्टर द्वारा अनधिकृत यात्रियों को “स्टाफ के लोग” बताना भी इसी प्रवृत्ति का हिस्सा है—रेलवे कर्मचारी, उनके संबंधी, परिचित मित्र, पुलिस कर्मचारी और स्थानीय दबंग लोग कोई भी बहुत अधिकारपूर्वक बिना आरक्षण आरक्षित डिब्बों में यात्रा कर सकता है। यानी सच्चाई को छिपाकर, प्रभावशाली वर्गों को मर्जी से संरक्षण दिया जाता है।
सबसे चिंताजनक पक्ष तब सामने आया जब वाश रूम से लौटने पर एक पुलिसकर्मी—जो कानून का रक्षक माना जाता है—मेरी बर्थ पर बिना अनुमति लेटा हुआ मिला। उसे यह बताने पर कि यह मेरी बर्थ है उसका अनमना व्यवहार यह दर्शाता है कि कानून के संरक्षक भी स्वयं को नियमों से ऊपर मानने लगे हैं। फिर तो आम नागरिक की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
यह समस्या केवल रेल के डिब्बों तक सीमित नहीं है; यह हमारे समाज में व्याप्त व्यापक नैतिक और सामाजिक गिरावट का संकेत है। ऐसी स्थितियों पर लोग प्रायः ग्लानि या अपराधबोध नहीं बल्कि गर्व महसूस करते हैं। नागरिक कर्तव्यों की भावना का क्षय, दूसरों के अधिकारों के प्रति असंवेदनशीलता – इस स्थिति के मूल कारण हैं। लोग यह भूल जाते हैं कि आरक्षित सीट केवल एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का अधिकार है जिसने नियमों के अनुसार टिकट लिया है।
इस पूरी स्थिति का एक गहरा सांस्कृतिक आयाम भी है, जिसे सामान्यतः “चलता है” मानसिकता कहा जाता है। यह मानसिकता केवल नियमों के उल्लंघन को सहन ही नहीं करती, बल्कि उसे वैधता भी प्रदान करती है। लोग न तो इसका विरोध करते हैं और न ही इसे बदलने का प्रयास करते हैं; वे इसे जीवन का एक सामान्य हिस्सा मान लेते हैं।
यहाँ नागरिकता का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। नागरिक होना केवल अधिकारों का उपभोग करना नहीं, बल्कि कर्तव्यों का निर्वहन भी है। लेकिन जब समाज में नागरिक कर्तव्यों के प्रति संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिक संरचना बनकर रह जाता है।
साथ ही, यह प्रशासनिक विफलता का भी स्पष्ट उदाहरण है। यदि टिकट जांच प्रणाली सख्त हो, यदि कर्मचारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, और यदि नियमों का समान रूप से पालन कराया जाए, तो इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन जब व्यवस्था स्वयं लचीली और पक्षपाती हो जाती है, तो अव्यवस्था स्वाभाविक परिणाम बन जाती है।
यह स्थिति गवर्नेंस डेफिसिट —अर्थात् शासन की कमजोरी—का उदाहरण है, जहाँ नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन सुनिश्चित करने की इच्छाशक्ति और क्षमता दोनों का अभाव है।
इस समस्या का समाधान केवल दंडात्मक उपायों में नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व, चेतना और नागरिक भाव के र्निर्माण में निहित है। नागरिकों को यह समझना होगा कि नियमों का पालन केवल व्यक्तिगत दायित्व नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन की आवश्यकता है। जब तक समाज में नैतिक अनुशासन और दूसरों के अधिकारों के प्रति सम्मान की भावना विकसित नहीं होगी, तब तक ऐसी समस्याएँ बनी रहेंगी।
अंततः भारतीय रेल के आरक्षित डिब्बों में अनधिकृत यात्रियों का अतिक्रमण केवल एक यात्रा की असुविधा नहीं है; यह उस गहरे सामाजिक संकट का संकेत है, जहाँ कानून, नैतिकता और नागरिकता के मूलभूत सिद्धांत धीरे-धीरे महत्वहीन होते जा रहे हैं। वे मनमर्जी के अधीन हैं। आवश्यक यह है कि हम इस समस्या को केवल व्यक्तिगत अनुभव न मानकर एक सामूहिक चुनौती के रूप में देखें और इसके समाधान के लिए गंभीरता से प्रयास करें। यद्दपि यह बहुत मुश्किल है क्योंकि यह यह हमारी प्राथमिकता में कहीं नहीं है।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)