इजरायल-अमेरिका-ईरान युद्ध : क्या विश्व खुद को इस्लामिक देशों के खिलाफ पूर्वाग्रहों से मुक्त करने के लिए तैयार है?

अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि मौजूदा विश्व व्यवस्था इजरायल-अमेरिका-ईरान युद्ध को झेल नहीं पाएगी। ईरानी प्रतिरोध इतना शक्तिशाली रहा है कि इसने पश्चिम को भयभीत कर दिया है।

मौजूदा विश्व व्यवस्था के पतन का पहला संकेत पश्चिमी एलायंस का बिखरना है। पुराने सहयोगियों में से किसी ने भी ईरान पर हुए अमेरिका नीत हमले में भाग नहीं लिया। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज पर आवाजाही बनाने के लिए जल युद्धपोत भेजने के लिए की गई अपील को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की अपील को कुछ देशों ने साफ तौर पर ठुकरा दिया, और बाकी देशों ने नम्रतापूर्ण शब्दों वाली अस्वीकृति चुनी।

ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, जापान और कनाडा द्वारा जारी संयुक्त बयान हालांकि अमेरिका को समर्थन का आश्वासन जरूर देता है, लेकिन ये उस कार्यवाही की गारंटी बमुश्किल देता है जो अमेरिका चाहता है। इसकी भाषा कूटनीतिक है और संकट के प्रति अमेरिकी दृष्टिकोण का शायद ही समर्थन करती है। ट्रंप इस मुद्दे का इस्तेमाल ईरान के साथ चल रहे युद्ध में सभी सहयोगियों को शामिल करने के लिए करना चाहते थे। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए।

बयान में कहा गया है, “हम सुरक्षित रास्ता सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी प्रयासों में योगदान देने के लिए तैयार हैं। हम उन देशों का स्वागत करते हैं जो इस दिशा में योजना बना रहे हैं।

हम अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी द्वारा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों की समन्वित निकासी को अधिकृत करने के निर्णय का स्वागत करते हैं। हम ऊर्जा बाजारों को स्थिर करने के लिए अन्य कदम उठाएंगे, जिनमें कुछ उत्पादक देशों के साथ मिलकर उत्पादन बढ़ाना शामिल है।”

“उचित प्रयासों के लिए तत्परता” उस मार्ग को इंगित करती है जिसे अमेरिका दरकिनार करना चाहता था। यह मार्ग था, संयुक्त राष्ट्र के मंच के जरिए वार्ता।

हम ईरान से आग्रह करते हैं कि वह हॉर्मूज स्ट्रेट में वाणिज्यिक जहाजों के आवागमन को बाधित करने के लिए अपनी धमकियों, बारूदी सुरंग बिछाने, ड्रोन और मिसाइल हमलों और अन्य प्रयासों को तुरंत बंद करे और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2817 का अनुपालन करे। 

नैवीगेशन की स्वतंत्रता अंतरराष्ट्रीय कानून का एक मूलभूत अधिकार है, जोकि संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के समुद्री कानून में भी शामिल है। 

बयान में कहा गया है, “हम संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (आईएफआई) के माध्यम से सबसे अधिक प्रभावित देशों को सहायता प्रदान करने के लिए भी काम करेंगे।”

ऐसा प्रतीत होता है कि यह बयान, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज को नेविगेशन के लिए मुक्त कराने के लिए अमेरिकी पक्ष का समर्थन करता है। लेकिन, यह यूएन की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर ज़ोर देता है। इससे यह भी पता चलता है कि अमेरिकी सहयोगियों में किसी को भी उसके आदेशों का पालन नहीं करना है।

यह एक बड़ा बदलाव है। ईरान पर अमेरिकी दृष्टिकोण को उसके सहयोगी परखे बगैर अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं। यह उत्तर-सोवियत विश्व में शासक देशों के बीच संचार के पतन को भी दर्शाता है। अमेरिका इसमें अग्रणी रहा है। हालिया युद्ध ने इनके बीच के समन्वय की कमी को भी उजागर कर दिया है। 

क्या यह ट्रंप के अंधराष्ट्रवाद का नतीजा है? नहीं। यह उस अस्थिर व्यवस्था का परिणाम है जिसने सोवियत यूनियन के विघटन के बाद दुनिया पर कब्जा कर लिया था। संसाधनों को लूटने की पूंजीवादी देशों की अनवरत आकांक्षा ने उन्हें विश्व की एक बड़ी जनसंख्या की जरूरतों के प्रति बेसुध बना दिया था।

अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र को पंगु बनाने का पूरा प्रयास किया क्योंकि संयुक्त राष्ट्र एक न्यायपूर्ण विश्व की वकालत करता था और गरीब देशों की समस्याओं, जैसे भुखमरी, स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण के समाधान के लिए प्रयासरत था। अमेरिकी पक्ष की क्रूरता और लालच इतने बढ़ गए थे कि यह घिनौना लगने लगा।

इराक युद्ध ने विश्व व्यवस्था के चरित्र को बेनाक़ब कर दिया था। रासायनिक हथियार रखने के झूठे आरोप लगाकर उसपर हमला किया गया था। यह वह युद्ध था जिसमें एक देश की तबाही का प्रसारण किसी मनोरंजन फिल्म की तरह हुआ था। कैमरे के सामने सद्दाम हुसैन पर मुकदमा और फांसी हुई थी। यही वह नया विश्व था जिसमें संचार की भाषा हिंसा थी।

संयुक्त राष्ट्र के मामलों से अमेरिका की दूरी का मूल कारण अंतरराष्ट्रीय मंच पर एकमात्र निर्णायक के रूप में उसकी स्व-घोषित भूमिका है। ट्रंप ने केवल अपने देश की स्वयं के बारे में बनाई गई धारणा को ही दोहराया है। उनकी अभद्र शैली ने भले ही उपहास को आकर्षित किया हो, लेकिन यह दुनिया पर एकाधिकार स्थापित करने की अमेरिकी इच्छा को प्रदर्शित करने का सबसे अच्छा तरीका था।

उनका नारा, ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (मागा)’, इसे दर्शाता है। उन्होंने अमेरिका के लिए एक ऐसा अतीत गढ़ा है, जो साम्राज्यवादी है। कनाडा को अमेरिकी प्रांत घोषित करना और ग्रीनलैंड को अपना क्षेत्र बताना अमेरिका को उस युग में ले जाता है जब उसने रेड इंडियंस का सफाया किया और अश्वेतों को गुलाम बनाया। इस तरह के युग को पुनः स्थापित करने की इच्छा विकृत लग सकती है, लेकिन यही वह सपना है जिसे ट्रंप बेच रहे हैं।

ईरान के साथ युद्ध इसी अमेरिकी सपने की अभिव्यक्ति है। इजरायल अमेरिका के हाथों की कठपुतली मात्र है। हमें इस नैरेटिव में नहीं फंसना चाहिए कि इजरायल ने अमेरिका को इस युद्ध में धकेला है।

यूरोप का मध्य पूर्व में अमेरिका के अभियानों में शामिल न होना ये दर्शाता है कि वह अमेरिका के मागा नैरेटिव में भविष्य नहीं देखता है। यह अमेरिका के नेतृत्वकारी भूमिका को लगभग नकारना है। यह एकध्रुवीय विश्व के अंत की घोषणा है। इसलिए, यह सवाल मन में उठता है कि आने वाले बहुध्रुवीय विश्व की प्रकृति क्या होगी।

इजरायल अमेरिका के गठजोड़ की संयुक्त सैन्यशक्ति के खिलाफ ईरानी प्रतिरोध इसका सुराग देता है। इसपर संशय नहीं होना चाहिए कि चीन-रूस धुरी इसके पीछे थी। पर यह इकलौती ताकत नहीं थी। बहुत से लोग धर्म के नाम पर दी गई कुर्बानियों को इसकी प्रेरक शक्ति कहेंगे। लेकिन अगर ऐसा होता, तो आईएसआईएस, हमास और अल कायदा अपने मिशनों में जरूर कामयाब होते।

ईरानी प्रतिरोध राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति है। हमें इस धारणा को स्वीकार नहीं करना चाहिए कि धार्मिक पहचान ही इसका एकमात्र आधार है। ये जड़ें इसकी प्राचीन सभ्यता में हैं। ईरानी राष्ट्र ने आधुनिकता से बहुत कुछ सीखा है। इसकी शिक्षा और अनुसंधान का स्तर इसका प्रमाण हैं। ईरान की शासन प्रणाली भी आधुनिक चरित्र दर्शाती है।

विश्व परिदृश्य विश्व व्यवस्था में एक व्यापक परिवर्तन का संकेत देता है। यह मुस्लिम जगत के प्रति हमारी धारणा में भी बदलाव की माँग करता है। इस्लामी देश निश्चित ही वह भूमिका निभाएंगे जिससे उन्हें लंबे समय से वंचित रखा गया है। क्या हम मुस्लिम जगत के प्रति पूर्वाग्रहों से मुक्त होने के लिए तैयार हैं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और राजनीति, समाज, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर लिखते हैं। मूल अंग्रेज़ी में लिखा उनका यह लेख बिज़बज़ से साभार। अनुवाद : शुभम रौतेला।) 

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