भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन और उसमें भागीदारी को लेकर आज भी राजनीतिक दावेदारी किसी भी तरह से कम नहीं हुई है। पिछले दस सालों में यह और भी गहरा होता हुआ दिख रहा है। पाकिस्तान की उपस्थिति भारत में आज भी राष्ट्रवाद की असफलता के तौर पर पेश की जाती है। इससे भी बढ़कर, इस कथित बहस से अपनी ही देश की जनता के एक हिस्से पर धार्मिक पूर्वाग्रह थोपकर राष्ट्रवाद को उन्माद, फासीवादी संरचना में बदल देने की पुरजोर कोशिशें जारी हैं।
उन्माद एक हिंसक प्रक्रिया है जिसमें विरोधी पक्ष के खिलाफ समूहों को हिंसा के लिए उकसाया जाता है और उसे संगठित करने की ओर ले जाया जाता है। यह उन्माद लोगों को साामजिक यथार्थ से दूर ले जाता है और हिंसा की उन फंतासियों को गढ़ लेने की आसानियां पैदा करता है जिससे न सिर्फ अपने ठहराव को तोड़ता है, सर्जना का अहसास भी करता है। यहीं से फासीवाद की जमीन पुख्ता होने लगती है।
राष्ट्रवाद की बहस इतिहास पर दावेदारी और भविष्य के निर्माण पर जब चलने लगती है और इसमें सामाजिक यथार्थ की भूमि जैसे ही खत्म होती है, इतिहास और भविष्य एक गहरे संकट के शिकार होने को अभिशप्त हो जाते हैं। यहां यह साफ करते हुए चलना चाहिए कि राष्ट्रवाद की दावेदारी एक सचेतन प्रक्रिया है और यह एक पुख्ता जमीन पर खड़ी होती है। यह कोई स्वतःस्फूर्त घटना नहीं है। राष्ट्रवाद पर बनने वाले विचार हवाओं के रुख से नहीं बनते। ये विचार पूंजीवाद के साथ बनते हैं।
पूंजीवादी राज्यों के विभिन्न रूपों में ढलने के साथ राष्ट्रवाद भी अपनी विचारधारा की आधारभूमि बदलता रहा है। पूंजीवाद के साम्राज्यवादी रूझान और साम्राज्यवाद में बदल जाने के साथ यह राजनीतिक विचारधारा के रूप में निर्णायक तब्दीली में चला गया। लेकिन, राष्ट्रवाद ने पूंजी के साथ अभिन्न रिश्ता बनाये रखा और पूंजी की वित्तीय साम्राज्यवादी आकांक्षाओं में साथ देने से पीछे नहीं हटा।
यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों ने इसी राष्ट्रवाद की पीठ पर सवार होकर चरम तानाशाही वाले राज्यों की अवधारणा, फासीवाद का रास्ता चुना। ऐतिहासिक तौर पर राष्ट्रवाद न सिर्फ पूंजी की सेवा में अग्रिम मोर्चे पर बना रहा है, समय आने पर फासीवाद जैसी मानव विरोधी अवधारणा और राज्य निर्माण की नींव भी बन गया। राष्ट्रवाद बीसवीं सदी के मध्य तक राजनीतिक अवधारणाओं और सामाजिक यथार्थ की जमीन पर अपने सामर्थ्य और सीमाओं को प्रदर्शित कर चुका था।
और, यह सिर्फ और सिर्फ पूंजी के हितों की सेवा कर रहा था और इसके लिए वह किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार था। यह भविष्य की मानवता के लिए एक संदेश था। यह साफ था कि यह आम मेहनतकश जन और मध्यवर्ग की कतई सेवा नहीं कर सकता।
भारत में आरम्भिक स्वदेशी आंदोलन
यहां हमें कुछ तिथियों और सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ को रेखांकित कर लेना उपयुक्त होगा। बंगाल वह पहला राज्य था जहां अंग्रेजों ने योजनाबद्ध तरीके से राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के बारे में सोचा। 1757 में अंग्रेजों ने बंगाल पर कब्जा कर लिया। इस बंगाल का अर्थ आज का बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा, बिहार और पूर्वांचल के कई जिले शामिल थे। ब्रिटिश व्यापार और पूंजी की जरूरतों से बनी इस उपनिवेश की आर्थिक नीतियां सर्वोपरि थीं।
इसके बाद यहां की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाएं आती थीं। ये आर्थिक नीतियां भारत को ब्रिटिश पूंजी के साथ जोड़ रही थीं और उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए ढाली जा रही थीं। इसमें न सिर्फ भारत के हथकरघा उद्योग और उभरता कारखाना बर्बाद किया जा रहा था, साथ ही अतिरिक्त पूंजी के दोहन के लिए खेती से कर वसूलने की व्यवस्था को बदला गया।
यहीं से भारत में ब्रिटिश हुक्मरानों ने ब्रिटिश जमींदारी व्यवस्था की शुरूआत की। यह सबकुछ महज तीस सालों के अंदर-अंदर किया गया और बंगाल को अकाल और मौत का केंद्र बना दिया गया।
उन्नीसवीं सदी के अंत तक अंग्रेज मद्रास और पूना को अपने नियंत्रण में ले चुके थे। राजपूताना क्षेत्र के राजपूत राजाओं को मराठों से संरक्षित करने के नाम पर उन्हें अपने पर निर्भर बनाने में लगे हुए थे। ग्वालियर, भोपाल और हैदराबाद के राजाओं और निजामों के दरबार में उनके राजनीतिक एजेंट नियुक्त हो गये थे और अवध को सीधे नियंत्रण में लिया जा रहा था। भारत के स्वतंत्र राज्यों की जगह पर औपनिवेशिक राज्य का अखिल भारतीय रूप दिखाई देने लगा था।
यह एकीकरण था या औपनिवेशिक राज्य का निर्माण, इस पर काफी बातें शुरू हो चुकी थीं। इस संदर्भ में कई तरह की दावेदारियां हैं। औपनिवेशिक राज्य की आर्थिक संरचनाओं ने जिन सामाजिक यथार्थ का निर्माण किया उसे समझने वाला बौद्धिक वर्ग इसी प्रक्रिया का हिस्सा था। भारत के इस बौद्धिक वर्ग का ऐसा कोई अपवाद नहीं दिखता है जो इस कथित एकीकरण की तारीफ न कर रहा हो और अंग्रेजों की प्रगतिशील भूमिका पर कसीदे न गढ़ रहा हो।
ऐसा नहीं था कि उस समय अंग्रेजों के खिलाफ किसान, दस्तकार और आदिवासी समुदाय की ओर से प्रतिरोध नहीं खड़ा हुआ। वे लड़ रहे थे और अपने क्षेत्र से उन्हें भगा देने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे। लेकिन, इन लड़ाईयों में इन प्रतिरोध की शक्तियों का नेतृत्व करने वाला कोई ‘राज्य’ नहीं था। इन्हें आमतौर पर स्वतंत्र लड़ाकू समूह माना गया और ब्रिटिश हुक्मरानों ने इन्हें ‘अपराधी श्रेणियों’ में गिनकर उनके अस्तित्व को ही अवैध बना देने का रास्ता चुना।
इन प्रतिरोध समूहों में सबसे अधिक जटिल संरचना उन किसानों की थी जो मुसलमान थे। ये किसान अक्सर धार्मिक प्रतीकों के साथ जमीन पर संगठित हुए और ब्रिटिश राज को सीधी चुनौती में उतरे। निश्चित ही, इस संदर्भ में पहली भिड़ंत उनके अपने जमींदारों से हुई जिनके वे मातहत थे। यह प्रक्रिया हिंदू किसानों के संदर्भ में भी देखी गई। इस संदर्भ में दो उपन्यासों को जरूर पढ़ा जाना चाहिए। पहला, बंकिमचंद्र चटोपाध्याय का ‘आनंदमठ’ और दूसरी महाश्वेता देवी का ‘तीतू मीर’।
ये दोनों ही उपन्यास सामाजिक यथार्थ को ठीक वैसे ही प्रस्तुत नहीं करते जैसा वे थे। दोनों उपन्यास अतिरेकों के शिकार हुए और सामाजिक यथार्थ को अपनी अवधारणाओं के रंगों में रंग कर प्रस्तुत किये। बंकिमचंद्र चटोपाध्याय नये-नये उभरकर आ रहे हिंदू आग्रहों के साथ सामने आते हैं, वहीं महाश्वेता देवी अपने उपन्यास में धार्मिक रंग के नीचे दबी किसानों की आकांक्षाओं को उभारकर ले आती हैं।
लेकिन, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि इस उपन्यास की पृष्ठिभूमि में जो सामाजिक यथार्थ है उसमें हिंदू-मुस्लिम दंगे एक सच्चाई थी और आने वाले समय में भारत की राजनीति में स्थाई जगह बनाकर बनी रही। धर्म प्रतिरोध की संरचनाओं को नये तरह से प्रस्तुत करने लगा और राष्ट्रवाद की अवधारणा को गहरे प्रभावित किया। इसमें भाषा की उपस्थिति ने मामले को और भी जटिल बनाने का काम किया।
इसका कुल परिणाम औपनिवेशिक पूंजी से भारत का कथित एकीकरण, आधुनिकता और भारत की पूंजीवादी आकांक्षाओं से बनने वाला राष्ट्रवाद औपनिवेशिक निर्भरता और किसानों के प्रतिरोध से दूर रहने में अभिव्यक्त हुआ। भारत में होने वाले हिंदू-मुस्लिम दंगों को किसान और मेहनतकश की समस्या के तौर पर देखने की बजाय भारत का राष्ट्रवाद इसे धार्मिक रंग में रंगते हुए इस द्विराष्ट्र के सिद्धांत की ओर बढ़ गया।
बाद में, ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने इसे अपने हितों के अनुरूप एक भौगोलिक संरचना में बदल दिया। 1947 तक स्थिति इतनी बदतर बना दी गई थी कि इसे उनके प्रस्तावों को सहज ही स्वीकार कर लिया गया। इसका सीधा परिणाम एक बार फिर भयावह दंगों में बदल गया। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा नुकसान किसानों ने उठाया और देखते-देखते भूमिहीनों के समूह में बदल गये और सीमा के आर-पार जाने के लिए मजबूर कर दिये गये।
ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत की आर्थिक लूट को पहली बार रेखांकित करने वाले दादा भाई नौरोजी थे और साथ ही रोमेशचंद्र दत्त थे जो आंकड़ों के साथ दो देशों के बीच होने वाले व्यापार, कर, लूट का आंकड़ा पेश करते हैं और इस रोकने और संचित पूंजी को देश के उत्थान में लगाने की अपील करते हुए दिखते हैं।
लेकिन, राजनीतिक तौर अपने देश में राष्ट्रवाद की शुरूआती बहस बीसवीं सदी के पहले दौर में ही ठोस रूप में होते हुए दिखती है। 19वीं सदी के अंत तक कथित भारतीय पूंजी का निर्माण नगण्य ही था। लेकिन, इस दौर में, जमींदारों, बैंकरों और सूदखोरों, व्यापारियों आदि समूह शहर समाज में मुख्य भूमिका निभा रहे थे। जबकि सरकारी कर्मचारियों और इसी तरह के सहयोगी कार्यों में लगे समूह शहर की बड़ी जनसंख्या बन रहे थे जो अपनी बौद्धिक सक्रियता से अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बयान कर रहे थे।
इस समय तक शहर में रहने वाले मेहनतकश समूह शहर से बाहर ही थे और अमूमन उनकी चर्चा कथित सभ्य समूहों के लेखन और उल्लेख से भी बाहर रहा। लेकिन, शहरी मध्यवर्ग का हिस्सा तेजी से अस्मिता के सवाल पर गोलबंद होते हुए दिखता है। इसे आगे ले जाने में इस दौरान गांव की जमीनों के हस्तांतरण की संख्या में वृद्धि ने सहयोग किया। भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया और उसकी बढ़ती संख्या छोटे जमींदारों की बर्बादियों का एक नतीजा था। निश्चित ही, किसानों की बर्बादी भी इसमें जुड़ी हुई थी।
इससे गांव और छोटे कस्बों में होने वाली तबाही शहरीकरण से सीधे जुड़ रही थी। मंहगाई गांव और शहर दोनों को प्रभावित कर रही थी। इन बर्बादियों की आर्थिक संरचना बंगाल को विभाजित करने की राजनीति के विरोध में संगठित हो उठ खड़ी हुई थी। इसने स्वदेशी भाषा में खुद को अभिव्यक्त किया और तेजी से स्वदेशी आंदोलन में बदल गया।
स्वदेशी की अवधारणा इसी दौर की बर्बादियों से निपटने, औपनिवेशिकदौर की आर्थिक संरचना के बाहर पूंजी का निर्माण करने और परम्पराओं को बनाये रखने की से सामने आई। हर अवधारणा की तरह यह भी समाज के एक हिस्से का राजनीतिक-अर्थशास्त्र था जो उसके हितों को पूरा करने के लिए था। यह साफ है कि उपनिवेशवाद के दौर में एक प्रतिरोध की संस्कृति की तरह इसने जड़ें जमाने की कोशिश की और यह आने वाले समय में अलग-अलग रूपों में लगातार बनी रही और जनसमूहों के इस या उस हिस्से को प्रभावित करती रही है।
‘चरखा’ स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बन गया और यह अपने देश में बर्बाद हुए बुनकरों की याद दिलाते हुए उनके प्रति कर्तव्यों की नैतिकता में भी बदल गया। इसे गांधी के प्रयोगों में खूब देखा जा सकता है। गांधी ने इसे अपने व्यक्तित्व के अनिवार्य हिस्से में बदल दिया।
1870-80 के दशक में स्वदेशी को लेकर की जाने वाली बातों में चरखा ठीक वैसे ही उपस्थित नहीं था जैसा बाद के समय में देखा गया। 1870-1910 के बीच को दौर में मुंबई और सूरत के भारतीय व्यापारियों की बढ़त का असर बंगाल और मद्रास तक में देखा जा रहा था। खासकर, पारसी और मारवाड़ी व्यापारी बंगाल की आढ़त और जूट और कुछ हद तक औद्योगिक मालों की आपूर्ति में काफी आगे बढ़ चुके थे।
ब्रिटिश अधिकारी पटसन, चाय जैसे उद्योगों पर एकाधिकार सा बना लिया था। ब्रिटिश हुकूमत की राजधानी कलकत्ता में रहने वाले बंगाली जाति समूहों के जमींदार और बाबू इनके सामने टिकने की स्थिति में नहीं थे। छोटे जमींदार और वकील, डाक्टर, सरकारी नौकर आदि बढ़ती मंहगाई के सापेक्ष अपनी आय को लेकर चिंतित थे। इस दौर में स्वदेशी का अर्थ इन चुनौतियों के सापेक्ष था।
बंगाल का मध्यवर्ग और छोटे-मध्यम जमींदार खुद का एक सामानान्तर बाजार बनाने की अवधारणा पर काम कर रहे थे जिससे वे न सिर्फ अपनी आय को बढ़ा सकें, अपनी बचत के आधार पर खुद की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत कर सकें। इसकी आधारभूमि में न तो मेहनतकश किसान थे और न ही शहरों में आ रहा नया मजदूर वर्ग था।
स्वदेशी की अवधारणा पेश करने वालों में वे समूह थे जिन्हें अंग्रेजी उपनिवेश ने अपने आरम्भिक दौर में पैदा किया था जो पूंजीवाद के संकेंद्रण के दौर में अपनी बर्बादियां देख रहा था। निश्चित ही, बंगाल में भी उपनिवेशवाद के आरम्भिक दौर में यह बनने वाला समूह अपने बहुमत में सवर्ण हिंदू था जो परम्परागत धार्मिक रूढ़ व्यवस्था को बचाने की जुगत में था और साथ आधुनिकता का पैराकार बन नये उन्मेष का भोग करना चाहता था।
लेकिन, यहां यह बात स्वीकार करनी पड़ेगी कि उनकी स्वदेशी की दावेदारी ने नई स्फूर्तियों को पैदा किया और इसका प्रभाव आगे के समय में कई रूपों में अभिव्यक्त हुआ।
इस संदर्भ में इतिहासकार सुमित सरकार की पुस्तक ‘बंगाल में स्वदेशी आंदोलन’ से एक लंबा उद्धहरण पढ़ना उपयुक्त होगा:
‘‘वास्तव में यह छोटे उत्पादकों पर आधारित अर्थव्यवस्था के उस काल्पनिक आदर्श का भारतीय रूप था जो रूसो और जैकोबिनों से लेकर बहुत से अराजकतावादी चिंतकों और रूस के नारोदनिकों तक समस्त यूरोपीय आमूल परिवर्तनवादी चिंतन पर छाया रहा है। अंतर सिर्फ इतना है कि यहां हमें मानवमात्र की समानता और भ्रातृत्व की उदात्त कल्पना, शरीर श्रम की महिमा और ‘स्वाभाविक’ जीवन के वरदान से वंचित बौद्धिक जनों की व्यथा नहीं देखने को मिलती।
नवपरम्परावादी हिंदू भद्रलोक वर्ग के जात-पात की भावना से ग्रस्त मानस को अपने संतोष-सांत्वना का आधार उक्त आदशों में नहीं, वरन वर्गविभाजित समाज के उस स्वप्न में प्राप्त हुआ जिसमें इस बात की स्पष्ट व्यवस्था थी कि ‘सत्य के उद्घाटन या प्रचार का काम करने वाले उच्चतर वर्गों के कर्मियों के जीवननिर्वाह का सामान जुटाना या उन्हें अन्य प्रकार से संबल देना’ शेष समाज का काम है।
तात्पर्य यही कि इसमें सदा की भांति शारीरिक मेहनत-मशक्कत से मुक्त ब्राम्हण बुद्धिजीवी अभिजात वर्ग के लिए पूरी गुंजाइश रखी गई थी। पश्चिम की अस्वीकृति स्वदेशी आर्थिक चिंतन की एक प्रमुख विशेषता प्रतीत होती है, लेकिन, इस अस्वीकृति की प्रेरणा का स्रोत उदीयमान औद्योगिक समाज की बुराइयों के सच्चे एहसास या आम दलित जनों के कष्टों की वास्तविक चिंता के बजाय राष्ट्रवादी उद्देश्य थे।(पृष्ठः 82)।’’
यहां रेखांकित करना जरूरी है कि बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के प्रभाव में देशी दस्तकारी से लेकर जहाजरानी और छोटे उद्यमों, खासकर रसायन के क्षेत्र में नवीन प्रयोग हुए, उद्यम स्थापित हुए और नये तरह के शिक्षण संस्थान खोले गये जो विज्ञान की शिक्षा दे रहे थे।
इन्हीं प्रक्रियाओं का एक परिणाम हम रवीन्द्रनाथ टैगोर की शिक्षा की दिशा में उठाया वह कदम था जो हम शांतिनिकेतन की स्थापना में देखते हैं। इससे पैदा होनी वाली राष्ट्रवाद की अवधारणा और इस पर बनने वाले राजनीतिक संगठन, जिसमें निश्चित ही अनुशीलन समिति सर्वोपरि है, का गहरा असर भारत के आगामी राजनीतिक जीवन पर पड़ा।
राष्ट्रवाद और हिंदू-मुसलमान की राजनीति
स्वदेशी आंदोलन की अवधारणा जैसे-जैसे जमीन पर उतरती गई, वैसे-वैसे इससे बनने वाली राष्ट्रवाद की अवधारणा की सीमाएं उजागर होने लगी। स्वदेशी आंदोलन को जमीन पर उतारने के लिए देशी वस्तुओं का उत्पादन, खरीद और बिक्री के केंद्र बनाने, इसका प्रचार करने, इसे चलाने के लिए कार्यकर्ताओं की नियुक्तियाँ और उनका प्रशिक्षण जरूरी था। साथ ही, दमन की स्थिति में इसका प्रतिरोध करना भी जरूरी था। स्वदेशी को नैतिक मूल्य की तरह पेश करने के लिए इसका रूपाकार बनाना भी जरूरी था। साथ ही इसे दार्शनिक और विचारधारा में बदल देने का लक्ष्य भी था।
इसके अंतिम हिस्से पर सबसे अधिक कार्य अरविंदो घोष ने किया जिसमें हिंदू धर्म की छाया विशिष्टाद्वैतवाद के रूप में अभिव्यक्त हुई और भारतीय गौरव की दार्शनिक अवस्थिति विवेकानंद के भाषणों में आ रही थी। रही सही कसर ‘आनंदमठ’ पूरी कर रही थी।
राष्ट्रवाद की यह अवधारणा जैसे ही जमीन पर उतरी, इसकी टकराहट अंग्रेज़ों से अधिक भारतीय समाज के उन लोगों से हुई जो इस अवधारणा में फिट नहीं बैठते थे। समूह के तौर दलित और मुसलमानों की ओर से गहरा प्रतिरोध सामने आया और कई जगहों पर इसने दंगों की शक्ल ले ली। जैसे-जैसे ये चुनौतियां सामने आईं, इस दौर के राष्ट्रवाद के सबसे बड़े चिंतक अरविंदो घोष योग और धर्म की ओर बढ़ते गये और 1909 तक उन्होंने राजनीति से सन्यास ही ले लिया।
भारत में इस समय तक भारत के इतिहास की ‘खोज और निर्माण’ औपनिवेशिक अफसरों द्वारा ही अंजाम दिया जा रहा था। इतिहास का यह निर्माण मुख्यत उस प्राचीन काल के अनुसंधान पर निर्भर था जिसमें आर्य नस्ल की अवधारणा, हिंदू धर्म की कथित अक्षुणता और सर्वोच्चता के सिद्धांत पर काम कर रहा था। अतीत का गौरवगान पूरी तरह से हिंदू धर्म की ध्वजा फहराने जैसा था। विलियम जोंस का प्रभाव इतिहास, सभ्यता, भाषा से लेकर इसकी जीवन पद्धति की खोज और उसे जीवन में उतार लाने तक गया था।
जेम्स प्रिंसेप और अलेक्जेंडर कनिंघम के कार्यों से बौद्ध धर्म के इतिहास के सामने आने और हड़प्पा-मोहनजोदाड़ो की सभ्यता के सामने आने तक हिंदू-मुस्लिम विभाजन राष्ट्रवाद की शक्ल ले चुका था। मध्यकाल को इतिहास के पन्नों में एक विचलन की तरह देखा जा रहा था। यह सबकुछ औपनिवेशिक विचारधारा पर निर्मित हो रहा था।
हालांकि जाॅन के जैसे इतिहासकार आज भी इससे इतर बात करते हैं। वह अपनी पुस्तक ‘इंडिया डिस्कर्वड’ की भूमिका में वह एडुवर्ड सईद की पुस्तक ‘ओरिएंटलिज्म’ की आलोचना करते हुए लिखते हैं: ‘‘अधिग्रहण और स्वार्थी लक्ष्यों से प्रेरित पश्चिमी दृष्टिकोण की सईद ने निंदा की। प्राच्यवाद के इस आलोचनात्मक नजरिए को सईद के अनेक अनुवर्तियों तथा समीक्षकों ने आगे भी बरता।’’
वह आगे लिखते हैं: ‘‘भारत मध्य-पूर्व की तरह नहीं है। इसका औपनिवेशिक संपर्क भिन्न प्रवृत्ति का था। बर्बरता के कृत्यों के साथ कुछ संरक्षण के कार्य भी थे। पूर्व के अपमान के हर पैराग्राफ के एवज में विस्मयकारी आश्चर्य के पृष्ठ भी थे।’’
भारतीय राष्ट्रवाद की आरम्भिक निर्मिति औपनिवेशिक आर्थिक संरचना में हो रही थी जिसका बौद्धिक समुदाय अतीत के आत्मगौरव में डूब जाने को व्याकुल था और वर्तमान की सामाजिक यथार्थ को समझने में औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि से बाहर आने के लिए तैयार नहीं था। सरकारी संस्थानों में यूरोपीय लोगों के बाद सबसे बड़ी संख्या हिंदुओं की थी, मुसलमानों की संख्या बेहद कम थी।
बंगाल में किसानों की विशाल बहुसंख्या मुसलमानों की थी। निश्चित ही इन किसानों के अतीत में वे समूह थे जो दलित, बौद्ध थे। धर्मांतरण ने इसमें एक बड़ी भूमिका का निर्वाह किया था। उस समय तक इन समुदायों मुस्लिम धर्म से इतर व्यवहार काफी प्रचलित थे। जैसे जैसे धर्म का जोर बढ़ रहा था धर्म की रूढ़ व्यवहार पर जोर भी बढ़ता जा रहा था और इस आधार पर गोलबंदी भी बढ़ रही थी। धर्म और समाज के बीच के इन रिश्तों को अध्ययन या रेखांकन उस और भी प्रभावित हुआ जब जनसंख्या गणना में इसे स्पष्ट खांचों में बांट दिया गया।
इन सब बातों के साथ साहित्यिक रचनाओं ने भी इस विभाजन और गैरबराबरी को बढ़ावा देने का काम किया जिसमें मुसलमानों और दलितों का चित्रण दोयम दर्जे के इंसान के तौर पर किया गया। इसने पूर्वाग्रह भरी मानसिकता का निर्माण किया और यथार्थ को समझने में बाधा पहुंचाई।
इस संदर्भ में नीरद चौधरी के लेखन के माध्यम से सुमित सरकार ने उनके लेखन के हवाले से स्पष्ट किया है: ‘‘नीरद चौधरी ने 1905 के पूर्व मुसलमानों के प्रति भद्र वर्गीय हिंदुओं के दृष्टिकोण को संक्षेप में ‘चार प्रकार की भावनाओं’ के मिश्रण के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है: ‘अव्वल तो हमारे मन में मुुसलमानों के प्रति पुरानी शत्रुता की भावना थी, क्योंकि किसी समय हम हिंदुओं पर उनका प्रभुत्व था; दूसरे विचार के धरातल पर हम समकालीन समाज के अंग के रूप में उनके अस्तित्व के प्रति सर्वथा उदासीन थे;
तीसरे आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से अपने समकक्ष मुसलमानों के प्रति, जिनके साथ हमारा व्यक्तिगत संपर्क था, हममें मित्रता की भावना थी; और चौथे, मुसलमान किसानों के प्रति जिन्हें हम उसी दृष्टि से देखते थे जिस दृष्टि से अपने निम्न जातियों के हिंदू किसानों को, या दूसरे शब्दों में, अपने मवेशी को देखते थे- हमारे मन में हमदर्दी और तिरस्कार की मिली-जुली भावना थी।(उपरोक्त; पृष्ठः 345)।’’
एमएन राय ने इस तरह के मानस से बन रहे राष्ट्रवाद को ‘आध्यात्मिक सभ्यता की श्रेष्ठता’’ पर आधारित माना और यह उम्मीद जता रहे थे कि यह बोध निम्नतम वर्गों के साथ जुड़कर एक विशाल आंदोलन में बदल जाएगा।(देखेंः संक्रांति के दौर का भारत, पृष्ठ: 179)।
जैसे जैसे स्वदेशी आंदोलन बढ़ता गया और स्वदेशी बनी वस्तुओं की बिक्री वाली समितियों और दुकानों का विस्तार हुआ इससे जुड़े विचार भी तेजी से आगे बढ़े। विदेशी सामानों के बहिष्कार की नीति और इसे अमल में लाने के लिए कार्यकर्ताओं की जोर-जबरदस्ती उस समय बुरे मोड़ पर पहुंच जाती थी जब गरीब किसान, दलित जातियों और मुसलमान औपनिवेशिक विलायती सामानों को तरजीह देते और उसकी खरीदारी करते।
मामला जब धक्कामुक्की और मारपीट तक जाने लगा। इसके पीछे एक बड़ा कारण था स्वदेशी वस्तुओं की लागत अधिक होने से इनका मूल्य अधिक होता था और ये अक्सर टिकाऊ नहीं होते थे। गरीब आय वर्ग के लिए यह नुकसान का सौदा था और उनके लिए स्वदेशी एक भार की तरह था। दलित समुदाय, खासकर नामशूद्र और मुसलमान किसानों ने इसका विरोध किया और कभी कभी यह दंगों की शक्ल लेने लगा।
इस दौर में मुस्लिम पुनुरूत्थानादियों ने, जो मुख्यतः धनिक और जमींदार वर्ग से आ रहे थे, इन टकराहटों के मैदान में कूद गये और इससे होने वाले विभाजनों को और भी बढ़ाने का काम किया। अंग्रेजों को, जो स्वदेशी की राजनीति और बायकाट से जूझ रहे थे, मुसलमानों के तौर पर एक सहयोगी मिल गया। इस दौर में उन्होंने मुसलमानों की सरकार में भर्ती के लिए न सिर्फ दरवाजे खोले साथ ही कुछ और भी नई नीतियों की शुरूआत की। उपनिवेशवादियों ने हिंदू बनाम मुसलमान के विभाजन को और भी गहराई से बांटने का काम किया।
दलित समुदाय हिंदू और मुसलमान की राजनीति के विभाजन और आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों के कारण इस आंदोलन का मुखर हिस्सा नहीं बन पाया और न ही उन्हें इसका हिस्सा बना देने का कोई प्रयास दिखाई देता है। लेकिन, स्वदेशी आंदोलन में मुसलमानों की भागीदारी महत्वपूर्ण थी, वह इन टकराहटों के बीच बनी रही और आने वाले समय में भी यह कांग्रेस की तरफदारी में अभिव्यक्त हुई।
लेकिन, इस दौरान हिंदू-मुसलमान विभाजन धर्म के आधार पर एक गहरा राजनीतिक रंग ले चुका था और राष्ट्रवाद को नये सिरे से प्रभावित कर रहा था। इन सबके बीच बंगाल की राष्ट्रीयता भी नये सिरे से संगठित हो रही थी। इसे संगठित करने वाले महान किसान नेता और समाजवादी फजलुल हक थे।
सुमित सरकार के शब्दों मेंः ‘‘एक पीढ़ी बाद फजलुल हक की कृषक प्रजा पार्टी जोतदारों को अपना आधार बनाकर अपने जमींदार विरोधी कार्यक्रम के बल पर 1937 के चुनावों में बंगाल में भारी विजय प्राप्त करने वाली थी। कम से कम एक हद तक बंगाल कांग्रेस के नेतृत्व की सामाजिक कुंठाओं के कारण मुस्लिम लीग की शरण में जाने वाली फजलुल हक की यह पार्टी अपने सहगामी दल को ऐसा जन-आधार प्रदान करने वाली थी जैसे बंगाल में पहले कभी प्राप्त नहीं हुआ था।
और इस प्रकार जिस राष्ट्रीय आंदोलन ने बंगाल के एक विभाजन के बाद अपनी जुझारू अवस्था में प्रवेश किया था उसी की चरम परिणति बयालीस वर्ष बाद उसके दूसरे विभाजन, पहले से अधिक स्थायी और कष्टप्रद विभाजन के रूप में होने वाली थी।(पृष्ठः 375)।’’ फजलुल हक ने बंगाल की जमीन पर कृषक प्रजा पार्टी की स्थापना की और किसानों को जमींदार विरोधी आंदोलन में बदल देने का काम किया। यहां संदर्भ बांग्लादेश का निर्माण है जिसका नेतृत्व मुजीबुर्ररहमान ने किया।
यहां यह बता देना उचित होगा कि मुजीबुर्ररहमान का आरम्भिक राजनीतिक प्रशिक्षण अनुशीलन समिति के तत्वाधान में हुआ था।
बंगाल में स्वदेशी आंदोलन, राष्ट्रवाद का उभार और बांग्लादेश के निर्माण तक इतिहास बंगाल में राष्ट्रीयता के बिखरने, संगठित होने और विभाजित होने के लिए आज भी अभिशप्त है और अतीत का बोझ उस पर आज भी बना हुआ है। खासकर, धार्मिक बोझ को देखा जा सकता है।
आज के पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व की ताकत हिंदुत्व का खेल जोरों से खेला जा रहा है जबकि बांग्लादेश में इस्लाम का झंडा लहराने का जोश जुल्म के रास्तों को खोल रहा है। इस संदर्भ में सुमंता बनर्जी की पुस्तक का यह अंश देखा जाना चाहिएः ‘‘स्थानीय क्षेत्रीय पहचान की परम्परा और बाहर से लाए गए नए-नए अखिल भारतीय राष्ट्रवाद के बीच के अंतर्विरोध और तनाव ने बंगाली समाज को 19वीं सदी में हिंदू-मुस्लिम में विभाजित कर दिया।
इस अतीत को खंगालना जरूरी है, इन टकराहटों की प्रवृत्तियों ने आगामी शताब्दी में बंगाल के समाज और राजनीति को लगातार प्रभावित किया, जो दशकों तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, 1940 के दशक और विभाजन के समय तक इसका प्रभाव बना रहा। ये आज के बंगाल के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर एक खतरनाक बादल की तरह मंडरा रहा है। (अनरैवेलिंग द बंगाली आइडेंटिटी; भूमिका से उद्धृत)।’’ यह पुस्तक 1992 में लिखी गई थी जबकि आज की स्थिति कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो चुकी है।
राष्ट्रवाद और रवीन्द्रनाथ टैगोर
बंगाल में स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रवाद की जमीन उस समय बनती और उभरती दिखती है जब पूंजीवाद साम्राज्यवादी अवस्था में प्रवेश कर रहा है और पूंजीवादी संकेद्रण तेजी से बढ़ता हुआ दिखता है। एकाधिकारी पूंजी जो खुद को आज की प्रचलित शब्द में कारपोरेट जगत का निर्माण करने और बाजार की होड़ में जा रही थी, ऐसे दौर में भारत में स्वदेशी उत्पादन और बाजार बनाने के लिए शहर केंद्रित प्रयास जिस जमीन पर खड़ा हो रहा था वह काफी कमजोर था।
इस समय तक ब्रिटिश हुक्मरान ग्रामीण भूमि संबंधों को अंतिम रूप दे चुके थे और भूमि सुधार के नाम पर भूमिकर बढ़ोतरी पर अधिक से अधिक निर्भर हो रहे थे। ऐसे में, किसानों की स्थिति बदतर हो रही थी। किसानों का असंतोष आमतौर पर स्वतःस्फूर्त तरीके से उठ खड़ा हो रहा था, जिसे शहरी बौद्धिक वर्ग हिंदू-मुस्लिम नजरिये से देखने का अभिशप्त था और इससे आगे जाने का साहस वह नहीं दिखा रहा था।
स्वदेशी आंदोलन के मजबूत होने के साथ ही 1906-07 में हिंदू-मुस्लिम दंगों में बढ़ोतरी के साथ इसकी सीमाएं दिखने लगी थी। इस दौरान हुए दंगों का कारण राष्ट्रवादियों की समझ में मुल्लों और साम्प्रदायिक पर्चाें पर जोर देने की थी। और, इस तरह के राष्ट्रवादी खुद न सिर्फ पुनरूत्थानवादी रूख का प्रदर्शन कर रहे थे, बहुत तेजी से धार्मिक रूढ़ियों से भरे कथित क्रांतिकारी शपथ ले रहे थे और कार्यक्रम बना रहे थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर इन दंगों का अध्ययन और विश्लेषण एक नये नजरिये से कर रहे थे।
ऐसा नहीं था कि रवीन्द्रनाथ टैगोर स्वदेशी की अवधारणा से प्रभावित नहीं थे। उन्होंने भूमि सुधार और उसके विकास के लिए एक ‘आदर्श फार्म’ की स्थापना की। ग्रामोद्धार के सिलसिले में ही 1907 में शांतिनिकेतन की स्थापना की, जो बाद में एक विश्वविद्यालय की तरह विकसित हुआ। 1908 में मनोरंजन बंदोपाध्याय को लिखे पत्र में ग्रामोद्धार के दौरान जात-पात से ग्रस्त हिंदू समाज से बनने वाली बाधा का वह उल्लेख कर रहे थे।
और, यही वह समय था जब जमीनी हकीकत को देखते हुए उन्होंने ‘आदर्श हिंदू’ की अवधारणा से खुद को अलग करना शुरू कर दिया। उन्होंने लिखा है: ‘‘यह सब कुछ अपनी आंखों से देखने के बाद कर्णप्रिय किंतु अंततः आत्मघाती भ्रमों के सहारे हिंदू समाज का ‘आदर्श’ चित्रण करने की अब मेरी इच्छा नहीं है।’’ उन्होंने ग्रामीणों को साहूकारों से मुक्त रखने के लिए एक देहाती बैंक की स्थापना की जिसमें नोबेल पुरस्कार से मिला पैसा भी उसमें डाल दिया। लेकिन, यह बैंक जल्द ही दीवालिया हो गया और पूरा पैसा डूब गया।
1905 में सियालदह के इस जगह पर जमींदारों से मुक्त पंचायत पद्धति को विकसित करने का प्रयास किया और इसे इस जिले से सटे इलाकों में प्रचारित करने का प्रयास किया। एक उदार और परमार्थी जमींदार रवीन्द्रनाथ टैगोर का भ्रम 1930 रूस की यात्रा के दौरान टूटा: ‘‘आज मुझे जमींदारी के इस सारे कारोबार पर शर्म आती है। …मेरी व्यथा यह है कि बचपन से ही मेरा लालन-पालन एक परोपजीवी की तरह हुआ है।
…हमारी जीवनपद्धति में बुनियादी परिवर्तन का समय आ रहा है। मुझे उस परिवर्तन को शालीनता के साथ और पश्चाताप के बिना स्वीकार करने की शक्ति प्राप्त हो, यही मेरी कामना है।(रूस की चिठ्ठी; अक्टूबर, 1930 में लिखी गई)।’’
रवीन्द्रनाथ टैगोर स्वदेशी आंदोलन से बने राष्ट्रवाद से खुद को दूर करते गये। उनका चिंतन उनके राष्ट्रवाद पर लेखन के रूप में सामने आया जो 1916-17 के दौरान लिखे और व्यक्तव्य में प्रस्तुत हुए। इसका प्रकाशन कई जगहों से हुआ है। नेशनल बुक ट्रस्ट ने इसकी ईपी थाॅम्सन की भूमिका वाले संस्करण को प्रकाशित किया है जिसका हिंदी अनुवाद सौमित्र मोहन ने किया है। ‘भारत में राष्ट्रवाद’ की शुरूआत इस वाक्य से होती है: ‘‘भारत में हमारी असली समस्या राजनीतिक नहीं, सामाजिक है।’’
इसके दूसरे पैरा में वह लिखते हैं ‘‘इतिहास के आरम्भिक काल से ही भारत भी अपनी एक समस्या से जूझता रहा है- और यह समस्या है जाति प्रथा की।’’ रविन्द्रनाथ टैगोर जिस समय लिख रहे थे उस समय तक एशियाई देशों में एक मात्र जापान ही था जो यूरोप से बाहर एक राष्ट्र की तरह उठ खड़ा हुआ था। इसके बाहर मूलतः यूरोपीय राष्ट्रवाद ही था और यूरोप से बाहर अमेरीका में विकसित हुआ। उनके तीन निबंध यूरोप, जापान और भारत के राष्ट्रवाद को लेकर हैं।
उनके राष्ट्रवाद की समझ इन्हीं ठोस अभिव्यक्तियों पर निर्भर थी। वह सिर्फ यूरोप और जापान के राष्ट्रवाद को लेकर ही सशंकित नहीं थे। वे भारत में उभर रहे राष्ट्रवाद को लेकर काफी सशंकित थे और उनके सामने ही इस तरह के उभार के चलते यह दंगों और मारपीट में बदलता हुआ दिखा था।
इसीलिए वह लिखते हैंः ‘‘भारत में हममें से जो लोग इस भ्रम में हैं कि मात्र राजनीतिक स्वतंत्रता पाकर हम स्वतंत्र हो जाएंगे, वे भी पश्चिम से सीखे सबक को वेदवाक्य की तरह मानने लगे हैं और मानवता पर से उनका विश्वास उठ गया है। हमें याद रखना होगा कि हम अपने समाज की जिन कमजोरियों को आंख की पुतली बनाए हुए हैं, राजनीति में वही खतरनाक साबित हो सकती हैं।
जिस निष्क्रियता के कारण हम अपने सामाजिक संस्थानों के मृत रूपाकारों की पूंजा में संलग्न हो जाते हैं, वही राजनीति में कठोर दीवारों वाले कैदखाने भी बना देगी। सहानुभूति की जिस कमी के कारण हम मानवता के एक बहुत बड़े अंश पर हीनता का जुआ डाल देते हैं, वही हमारी राजनीति में अन्याय की निरंकुशता थोपने के लिए विवश कर देगी।(पृष्ठः 61)।’’
वह उस समय लिख रहे थे भारत में मौलिक औद्योगिकता का स्थान अब नहीं है क्योंकि इसका अपना कोई बाजार नहीं है। इसी लेख के अंत में वह लिख रहे हैं कि वह अर्थशास्त्री नहीं हैं। लेकिन, वह भारत की आर्थिक संरचना को जिस नजरिये से देख रहे थे वह सटीक थी, उनके सामने स्वदेशी आंदोलन की सीमा और उसका सामर्थ्य प्रकट हो चुका था और इससे पैदा होने वाले राष्ट्रवाद की आत्मा से भी वह रूबरू हो चुके थे।
स्वदेशी आंदोलन और इसके बाद के दौर के रवीन्द्रनाथ टैगोर को समझने के लिए इस दौर की उनकी रचनाओं में उनका अध्ययन जरूरी है। उनकी रूस से लिखी चिठ्ठयों को पढ़ना जरूरी है। इस दौर में उनकी बनाई गई पेंटिग्स उनकी दृष्टि को नये सिरे से उद्घाटित कर रही थी। उनके सामने जाति प्रथा से मुक्ति का कोई खांचा सामने नहीं आया, वह इसे मानवतावादी दृष्टिकोण से देख रहे थे।
उनके सानिध्य में क्षितिजमोहन सेन ने इसको परखने की कोशिशें की और एक पुस्तक भी लिखी। उनके सानिध्य में जन सरोकार से जुड़े उन कवियों को सामने लाने का प्रयास हुआ जिन्हें हाशिये पर डाल दिया गया। नाथ और सिद्ध साहित्य हिंदी में इसी शांति निकेतन के रास्ते आया।
निष्कर्ष
भारत में स्वदेशी आंदोलन सौ वर्ष से अधिक का समय पूरा कर चुका है। यह आज भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए है और राजनीति में कभी बिम्ब-प्रतीकों की तरह और कभी जुमलों की तरह प्रयोग में आता रहता है। यह हर बार एक छोटे से हिस्से को, खासकर उसको जो मुख्य बाजार के शिकार बना दिये जाते हैं, उन्हें अपने पक्ष में कर लेने के लिए पेश कर दिया जाता है। लेकिन, इससे भी अधिक यह उन प्रतीकों, नैतिकताओं और धार्मिक पूर्वाग्रहों की याद दिलाता है जो मूल रूप से हिंदू धार्मिक संस्कारों से जुड़े होते हैं।
धार्मिक संस्कार और रूढ़ियां अपने साथ सामाजिक सरंचना के पूर्वाग्रह तो लाती ही हैं, ये विलायती और ‘अन्य’ की अवधारणा को मजबूत करने लगती हैं। आज भी यह राजनीतिक भाषणों और आर्थिक समृद्धि के जुमलों में ‘लोकल-वोकल’ और ‘चीनी सामानों के बहिष्कार’ जैसे नारे में दिखाई देता है। निश्चित ही स्वदेशी की एक निश्चित अवधारणा नहीं है और यह इतिहास के विभिन्न पड़ावों पर इसे अलग-अलग निहितार्थ बने रहे हैं।
लेकिन, इसके हिंदू धार्मिक पूर्वाग्रहों और निम्न-स्तर की उत्पादक गतिविधियों को बढ़ाने के भाव से इंकार नहीं किया जा सकता। इसके दायरे में मजदूर और किसान बाहर होता है। हालांकि इसकी आर्थिक संरचना को लेकर यह दावा किया जाता रहा है कि इससे इन्हें फायदा पहुंचेगा और उन्हें समृद्धि हासिल होगी।
1990 के दशक में जब वैश्वीकरण का जोर बढ़ा तब स्वदेशी आंदोलन का नया उभार देखने का मिला। आरएसएस के तत्वाधान में इसने तेजी से लोकप्रियता हासिल की और भाजपा के लिए एक मजबूत आधारभूमि प्रदान की। यह ठीक उन्हीं धार्मिक पूर्वाग्रहों पर काम कर रहा था जो शुरूआती स्वदेशी आंदोलन में देखा गया था। अंतर सिर्फ और सिर्फ किसानों को अपने पक्ष में करने को लेकर था।
इस बार का स्वदेशी आंदोलन किसानों को आश्वस्त कर रहा था कि वह उसे साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से मुक्ति दिलाएगा। लेकिन, जल्द ही इसने किसानों को धार्मिक रंग में रंगने और धार्मिक दंगों में झोंक देने का काम किया। भाजपा ने आने वाले समय में साम्राज्यवादी नीतियों को लागू करने में कांग्रेस से भी तेज गति को अख्तियार की।
यदि स्वदेशी के विशुद्ध शाब्दिक अर्थों को आदिवासी जीवन पर लागू करें, तब हमें वहां सबसे अधिक स्वदेशी व्यवहार दिखाई देगा। प्रकृति के साथ जुड़े जीवन में वहां उपभोग लगभग उन्हीं वस्तुओं का हो रहा होता है जो वहां उत्पादित है और जो आवश्यक होने पर खरीद कर पास के हाट से ले आई जाती है। लेकिन, हम जानते हैं कि विशुद्ध स्वदेशी अर्थ में जीवन जीने वालों के खिलाफ भारत में सबसे बड़ा सैन्य अभियान चलाया गया।
उनके जीवन, रहन-सहन को बर्बाद कर देने वाली आर्थिक नीतियों का शिकार बनाया गया। उन्हें ‘सभ्य’ बनाने के दावे किये गये और करोड़ों लोगों को विस्थापित किया गया। यह सबकुछ विशाल उद्योगों की स्थापना और साम्राज्यवादियों की जरूरतों को पूरा करने वाले खनिज पदार्थों के दोहन के लिए किया गया।
सुमित सरकार अपने निष्कर्ष में लिखते हैं: ‘‘भारत और बंगाल के किसान जगत को आज भी अपने इतिहासकारों की प्रतीक्षा है, और भूमि विषयक परिस्थितियों तथा कृषक मनोविज्ञान के विशद अनुसंधान के सहारे ही हम उस चीज के मूल कारणों को समझ पाएंगे जो आधुनिक भारत का शायद सबसे बड़ा दुखद प्रसंग है- अर्थात राष्ट्रीय और सामाजिक असंतोष की धाराओं को उपनिवेशवाद और सामंतवाद की विरोधी एक ही क्रांति में अंतर्मिश्रित कर देने की विफलता।’’
स्वदेशी आंदोलन और इसकी सीमाओं का जो गहरा रेखांकन रवीन्द्रनाथ टैगोर ने किया वह हमारे लिए आज भी एक चेतावनी की तरह है। ऐसा लगता है कि इस चेतावनी से आगे जाकर जिस तरह के अध्ययनों की दरकार थी, वह आज भी पूरी नहीं हुई है। यहां कहना जरूरी है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर सिर्फ सामाजिक यथार्थ और जाति की सरंचनाओं के बारे में बात नहीं कर रहे थे, वह राष्ट्रवाद की औद्योगिक आकांक्षाओं की सीमाओं और इसे लांघ जाने से पैदा होने वाले खतरे के बारे में भी सचेत कर रहे थे।
उनकी इन अवधारणाओं के पीछे सामाजिक यथार्थ के अन्य पक्षों के अलावा बंगाल के नामशूद्र समूहों के प्रति उनकी चिंता और हिंदू-मुसलमान टकराहटों और दंगों का अनुभव शामिल था। रवीन्द्रनाथ टैगोर इससे भी बढ़कर ठोस सामाजिक यथार्थ से रूबरू हो रहे थे और इन संदर्भों में वह जमीनी स्तर पर सक्रिय थे और अपनी पक्षधरता के साथ काम कर रहे थे।
(अंजनी कुमार लेखक और एक्टिविस्ट हैं।)