यूपी आउटसोर्स सेवा निगम : गैरकानूनी को कानूनी जामा पहनाना

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2 सितंबर को उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम का औपचारिक शुभारंभ किया है। एक साल से चल रही घोषणा के क्रियान्वयन में सरकार का दावा है कि इस निगम के गठन से सरकारी विभागों में चल रही आउटसोर्सिंग व्यवस्था अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित होगी। सरकार के पोर्टल पर कहा गया कि विश्वसनीय सेवा-पारदर्शी व्यवस्था-डिजीटल समाधान।

आउटसोर्स कर्मचारियों को समय से वेतन मिलेगा, ईपीएफ और ईएसआई की सुविधा सुनिश्चित होगी तथा आउटसोर्स एजेंसियों के चयन में मनमानी समाप्त होगी और कार्मिकों, एजेंसियों और विभागों के बीच स्थाई विश्वास पैदा होगा। एजेंसियों का चयन जेम पोर्टल के माध्यम से होगा।

निगम की स्थापना कंपनीज एक्ट, 2013 की धारा 8 के तहत गैर-लाभकारी कंपनी के रूप में की गई है। सरकार का कहना है कि निगम आउटसोर्स कर्मचारियों के हितों की रक्षा करेगा और विभागों तथा निजी एजेंसियों के बीच एक नियामक एवं समन्वयकारी संस्था की भूमिका निभाएगा। पहली नजर में यह व्यवस्था आकर्षक दिखाई देती है, लेकिन इसके प्रावधानों और वास्तविक उद्देश्य को गहराई से देखने पर कई गंभीर सवाल सामने आते हैं।

सबसे पहला सवाल यह है कि क्या आउटसोर्सिंग की व्यवस्था को पारदर्शी बना देना ही रोजगार की समस्या का समाधान है? प्रदेश के सरकारी विभागों में बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारी वर्षों से काम कर रहे हैं जो स्थायी प्रकृति के कार्य कर रहे हैं, लेकिन उन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा और सेवा-सुरक्षा हासिल नहीं है। वेतन कम है, रोजगार अस्थिर है और कई मामलों में उन्हें सामाजिक सुरक्षा के अधिकारों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।

निगम की व्यवस्था में चिकित्सा, इंजीनियरिंग, परियोजना प्रबंधन, लेखा, अनुसंधान, शिक्षण, नर्सिंग, फार्मेसी, पैरामेडिकल, डाटा प्रोसेसिंग, टंकण, विद्युत, मैकेनिक, प्रयोगशाला, वाहन चालक, कार्यालय सहायक, सफाई, बागवानी, खानपान और सुरक्षा सहित अनेक प्रकार की सेवाओं को आउटसोर्सिंग के दायरे में रखा गया है। यानी सरकारी संस्थानों में होने वाले बड़ी संख्या में नियमित और निरंतर प्रकृति के कामों के लिए आउटसोर्स मानव संसाधन उपलब्ध कराने की व्यवस्था तैयार की गई है।

यहीं सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। यदि कोई काम सरकारी विभाग में लगातार चल रहा है और उसकी जरूरत स्थायी है तो उसके लिए नियमित पद क्यों नहीं बनाया जाता? उत्तर प्रदेश सरकार के अपने पूर्व शासनादेशों में सृजित पदों के विरुद्ध आउटसोर्सिंग के संबंध में प्रतिबंधात्मक प्रावधान मौजूद हैं। फिर स्थायी प्रकृति के कामों के लिए लगातार आउटसोर्सिंग पर निर्भरता बढ़ाई जा रही है।

ठेका श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम, 1970 की धारा 10 सरकार को स्थाई प्रकृति के काम में ठेका श्रम के रोजगार पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति देती है। कानून का उद्देश्य केवल ठेका व्यवस्था को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसे समाप्त करना भी है और कार्यरत ठेका श्रमिक को नियमित करना है। आउटसोर्सिंग निगम स्थाई प्रकृति के काम में ठेका प्रथा की गैरकानूनी कार्रवाई को कानूनी जामा पहनाने की कवायद है।

सरकार का दूसरा बड़ा दावा है कि अब आउटसोर्स एजेंसियों की मनमानी समाप्त होगी। लेकिन सवाल यह है कि एजेंसी बदलने से कर्मचारी की स्थिति कितनी बदलेगी? निगम की व्यवस्था में भी कर्मचारी का औपचारिक नियोक्ता आउटसोर्स एजेंसी ही रहेगी। कर्मचारी सरकारी विभाग में काम करेगा, लेकिन सरकारी कर्मचारी नहीं होगा। उसका रोजगार निजी एजेंसी के अनुबंध और शर्तों पर निर्भर रहेगा।

जेम पोर्टल पर एजेंसी का चयन निश्चित रूप से प्रक्रिया को डिजिटल और अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकता है, लेकिन इससे अपने आप श्रमिक अधिकार सुनिश्चित नहीं होते। वास्तविक पारदर्शिता तभी होगी जब सरकार सार्वजनिक करे कि विभाग ने प्रति कर्मचारी एजेंसी को कितनी राशि दी, कर्मचारी को वास्तव में कितना भुगतान हुआ, एजेंसी ने कितना सेवा शुल्क अथवा मार्जिन लिया, ईपीएफ-ईएसआई में कितना पैसा जमा हुआ और कितनी शिकायतों पर कार्रवाई हुई।

पारिश्रमिक का सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है। निगम की व्यवस्था में विभिन्न श्रेणियों के कर्मचारियों के लिए न्यूनतम पारिश्रमिक निर्धारित किया गया है। लेकिन केवल न्यूनतम राशि घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। नियमित सरकारी कर्मचारी को मिलने वाले वेतन, भत्ते, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सुविधाओं की तुलना में आउटसोर्स कर्मचारी को मिलने वाले वास्तविक पारिश्रमिक का अंतर भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। विशेषज्ञ सेवाओं में यह अंतर और भी गंभीर हो सकता है।

उदाहरण के लिए यदि किसी सरकारी अस्पताल में डॉक्टर, नर्स या किसी विभाग में इंजीनियर या तकनीकी कर्मचारी की वास्तविक स्थाई कार्य की दर निगम द्वारा निर्धारित न्यूनतम पारिश्रमिक से काफी अधिक है तो सरकार को यह बताना चाहिए कि इतनी कम दर पर गुणवत्तापूर्ण सेवाएं कैसे सुनिश्चित होंगी।

यह भी महत्वपूर्ण सवाल है कि उत्तर प्रदेश में पिछले 12 सालों से न्यूनतम वेतन का वेज रिवीजन नहीं किया गया। नोएडा श्रमिक आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री ने खुद घोषणा की थी कि मई माह के प्रथम सप्ताह में उत्तर प्रदेश में वेज बोर्ड का गठन किया जाएगा और न्यूनतम वेतन का पुनरीक्षण किया जाएगा। लेकिन आज 4 माह बीत जाने के बावजूद यह कार्य नहीं हुआ।

ईपीएफ और ईएसआई के मामले में भी सरकार को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। ईएसआई के लिए वर्तमान वेतन सीमा ₹21,000 प्रतिमाह है, जबकि ईपीएफ में ₹15,000 की वेतन सीमा का है। ऐसे में इन कार्मिकों को कैसे सरकार लायेगी। इस सवाल का जबाव नहीं दिया गया है।

सरकार द्वारा घोषित बीमा, इलाज, दुर्घटना लाभ संबंधी घोषणाएं पहले से ही ईपीएफ-ईएसआई के दायरे में आते हैं। चिकित्सा अवधि में सवैतनिक अवकाश भी इसमें शामिल है। इसलिए  महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पात्र कर्मचारियों का वास्तविक अंशदान समय से जमा हो और कर्मचारी को उसका रिकॉर्ड उपलब्ध हो।

आरक्षण के प्रावधान को भी व्यवहार में लागू करने की चुनौती है। निगम की व्यवस्था में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, महिलाओं, दिव्यांगजन और पूर्व सैनिकों आदि के लिए आरक्षण का प्रावधान बताया गया है। यह तभी प्रभावी होगा जब भर्ती की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक हो, चयन सूची उपलब्ध हो और आरक्षण के उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई की व्यवस्था हो।

एक और महत्वपूर्ण सवाल एजेंसी की अवधि का है। निगम की व्यवस्था में एजेंसी के न्यूनतम तीन वर्ष के एम्पैनलमेंट का प्रावधान है। इसे कर्मचारी की नौकरी की तीन वर्ष की निश्चित अवधि मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि एक एजेंसी के स्थान पर दूसरी एजेंसी आती है तो कर्मचारी की निरंतर सेवा, वरिष्ठता, अवकाश, ग्रेच्युटी और अन्य सामाजिक सुरक्षा अधिकारों का क्या होगा—सरकार को इसका स्पष्ट उत्तर देना चाहिए।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस निगम का उद्देश्य आउटसोर्सिंग व्यवस्था को नियंत्रित करना है, उसकी अपनी व्यवस्था में भी विभिन्न पदों पर आउटसोर्स मानव संसाधन का उपयोग किए जाने की बात सामने आती है।

दरअसल, समस्या केवल बिचौलियों की नहीं है। समस्या यह है कि स्थायी प्रकृति के सरकारी कामों को स्थायी रोजगार से अलग किया जा रहा है। एक कर्मचारी वर्षों तक वही काम करता है, उसी सरकारी कार्यालय में काम करता है, लेकिन उसे नियमित कर्मचारी के अधिकार नहीं मिलते। सरकार बदल सकती है, एजेंसी बदल सकती है, ठेका बदल सकता है, लेकिन कर्मचारी की असुरक्षा बनी रहती है।

उत्तर प्रदेश में रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान लगातार मांग कर रहा है कि सरकारी विभागों में खाली पड़े लाखों नियमित पदों को तत्काल भरा जाए, जनसंख्या और जरूरत के अनुरूप नए पद सृजित किए जाएं, वर्षों से लंबित भर्तियों को पारदर्शी तरीके से पूरा किया जाए तथा स्थायी प्रकृति के कामों में ठेका और आउटसोर्सिंग व्यवस्था को समाप्त किया जाए।

निगम में यदि समय पर वेतन, ईपीएफ-ईएसआई, शिकायत निवारण और एजेंसियों की जवाबदेही सुनिश्चित होती है तो इससे कुछ तत्कालिक समस्याओं का समाधान जरूर हो सकता है। लेकिन इसे रोजगार की स्थायी समस्या का समाधान नहीं कहा जा सकता।
सरकारी काम के लिए स्थायी कर्मचारी, स्थायी काम के लिए स्थायी पद और समान काम के लिए समान वेतन—यही वास्तविक समाधान है।

यदि आउटसोर्स सेवा निगम केवल ठेका एजेंसियों को व्यवस्थित करने तक सीमित रहता है तो यह आउटसोर्सिंग में लगे कार्मिकों की समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उसे गैरकानूनी संस्थागत रूप देने की प्रक्रिया बन जायेगा।

(लेखक ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तर प्रदेश के महासचिव हैं।)

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