भारी सिर और कमजोर धड़- क्या होगा अंजाम?

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भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा हाल को जाहिर करती हुई ये सटीक खबर है: भारत के कुल 284 अरबपति जितने धन के मालिक हैं, वह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक तिहाई के बराबर है। ताजा हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट के मुताबिक फरवरी 2024 से जनवरी 2025 के बीच भारतीय अरबपतियों के कुल धन में दस प्रतिशत बढ़ोतरी हुई और यह 98 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया।

(https://www.telegraphindia.com/amp/business/billionaires-comprise-one-third-of-indias-gdp-gautam-adanis-valuation-gains-ground/cid/2091091)

इसके पहले फरवरी में मुंबई स्थित फर्म ब्लूम वेंचर्स ने अपनी इंडस वैली रिपोर्ट का ताजा संस्करण जारी किया था। इसके मुताबिक इस फर्म के शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत की 140 करोड़ की आबादी में तकरीबन एक अरब लोग ऐसे हैं, जिनके पास मनपसंद वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने लायक पैसा नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत का उपभोक्ता वर्ग 13-14 करोड़ लोगों से ज्यादा बड़ा नहीं है। लगभग 30 करोड़ लोग उपभोक्ता वर्ग का संभावित हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन अभी वे रोजमर्रा की जरूरतों से इतर खरीदारी नहीं करते।

तो मौजूदा रुझान का उल्लेख करते हुए शोधकर्ताओं ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था ‘विस्तृत’ नहीं, बल्कि ‘गहरी’ हो रही है। इसका अर्थ है कि धनी लोगों की संख्या नहीं बढ़ रही है, मगर धनी लोगों का धन तेजी से बढ़ रहा है। विश्व के सबसे धनी लोगों की हुरुन सूची से भी इसी बात की पुष्टि हुई है।

ऐसी सूरत में भारतीय बाजार की सूरत यह बनी है कि यहाँ आम चीजों का कारोबार मंदा है, लेकिन महंगे- प्रीमियम उत्पादों के बाजार में तेजी बनी हुई है। इसके परिणामस्वरूप छोटे और मझौले कारोबार संकटग्रस्त होते चले गए हैं। वैसे, तो यह रोजमर्रा के अनुभव की बात है और इस तरफ पहले कई अध्ययन रिपोर्टों में ध्यान खींचा गया है, लेकिन संभवतः इस हफ्ते वो मौका आया, जब एक ऊँचे पद पर बैठे सरकारी अधिकारी ने इस हकीकत को स्वीकार किया।

नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्मण्यम की इस टिप्पणी पर ध्यान दीजिए: ‘कभी-कभी जब मैं भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में सोचता हूँ, तो मुझे चिंता होती है। हमारे यहाँ बड़ी संख्या में बड़ी कम्पनियाँ हैं। जबकि मझोली कम्पनियों की संख्या बड़ी कम्पनियों से भी कम है। वैसी स्थिति में आर्थिक वृद्धि कहाँ से हासिल होगी? यह स्थिति संस्थागत, ढाँचागत रूप लिए हुए है।’

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए एक नई पहल की शुरुआत के मौके पर उन्होंने अफसोस जताया कि भारत में ऐसी मध्यम- आकार की कम्पनियाँ पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, जो अपने को बड़ी कम्पनी बना सकने की स्थिति में हों, जबकि एमएसएमई का विकास विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए यह निर्णायक महत्त्व का है।

सुब्रह्मण्यम ने कहा- एमएसएमई सेक्टर बदहाल है और इसकी वजह ढाँचागत है।

(https://www.businessworld.in/article/not-enough-medium-sized-firms-in-india-says-niti-aayog-ceo-551840)

ये हाल क्यों है? इससे जानने के लिए किसी गहन शोध की जरूरत नहीं है। संसद की लोक लेखा समिति ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में जीएसटी सम्बन्धी प्रक्रियाओं को इसका बड़ा कारण माना है। (https://indianexpress.com/article/business/parliamentary-panel-flags-issues-faced-by-msmes-exporters-under-gst-suggests-easier-compliance-fast-tracking-refunds-9908032/)

वैसे तह में जाया जाए, तो एमएसएमई क्षेत्र की मुसीबत की कुछ वजहें सरकारी नीतियों और कदमों में तलाशी जा सकती हैं। उनमें एक खास कदम नोटबंदी था। अब शायद ही इस पर कोई सन्देह बचा हो कि नोटबंदी ने इस क्षेत्र की जो कमर टूटी, वह आज तक दुरुस्त नहीं हो सकी है।

इन तथ्यों को याद करना इसलिए जरूरी है कि जब तक इन कारणों से उपजी समस्याओं का हल नहीं सोचा जाता, कोई ऊपरी पहल एमएसएमई सेक्टर को उबार नहीं सकती। मध्यम अर्थव्यवस्था के बदहाल होने का नतीजा बढ़ी गैर-बराबरी के रूप में आया है।

पहले से मौजूद इन हालात के बीच अब भारत के सामने नई चुनौतियाँ आ खड़ी हुई हैं। अब खुद केन्द्रीय वित्त मन्त्रालय ने स्वीकार किया है कि भू-राजनीतिक तनावों, व्यापार नीति सम्बन्धी अनिश्चितताओं और अन्तरराष्ट्रीय बाजार में कॉमोडिटी के मूल्यों में उतार-चढ़ाव के कारण अगले वित्त वर्ष में भारत के आर्थिक विकास के लिए गम्भीर जोखिम पैदा हो गए हैं। अपनी ताजा मासिक आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में मन्त्रालय ने कहा है कि शुल्क सम्बन्धी नीतिगत घटनाओं ने अन्तरराष्ट्रीय व्यापार के लिए जोखिम और बढ़ा दिया है, जिसका असर निवेश पर भी पड़ रहा है।

(https://economictimes.indiatimes.com/news/economy/indicators/trade-uncertainty-geopolitics-risks-to-growth-finmin-report/articleshow/119554607.cms)

स्पष्टतः मन्त्रालय का इशारा अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के टैरिफ वॉर की तरफ है, जिसमें अगले दो अप्रैल को नया आयाम जुड़ेगा, जब ट्रम्प जैसा को तैसा टैरिफ प्रणाली लागू करेंगे। उसकी खास मार भारत पर पड़ सकती है।

वित्त मन्त्रालय ने मौजूदा हालात के बीच विभिन्न देशों में बने सन्देह और हताशा के माहौल का उल्लेख किया है और भारतीय कारोबारियों को सलाह दी है कि वे वैसी भावनाओं से प्रभावित होने से बचें। वैसे उसकी इस स्वीकारोक्ति ने यह भी जाहिर किया है कि सब कुछ हरा-भरा होने और नई सदी भारत की होने के बनावटी कथानकों में फँसे रहना अब कितनी बड़ी मुश्किल का कारण बन गया है।

ट्रम्प ने अमेरिका के बाहर बनी कारों और कार के पाट-पुर्जों पर 25 प्रतिशत शुल्क लगा कर भारतीय कार उद्योग के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।

(https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/india-caught-in-crossfire-as-trumps-25-auto-tariffs-roil-global-supply-chains/articleshow/119571332.cms)

दो अप्रैल से reciprocal tariff लागू होने के साथ मुश्किलों का दायरा और बढ़ जाएगा। मगर अब यह साफ हो चुका है कि बात सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं है। अमेरिका इस मौके का इस्तेमाल भारतीय बाजार को पूरी तरह अपने अनुकूल ढाल लेने के लिए कर रहा है। एक ताजा खबर के मुताबिक भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए चल रही वार्ता में डेटा को भारत के अंदर रखने का मुद्दा एक प्रमुख अवरोध बन गया है। अमेरिका नहीं चाहता कि उसकी कम्पनियों पर भारत का डेटा भारत में ही करने की कोई शर्त लगाई जाए।

ट्रम्प प्रशासन के ऐसे आक्रामक रुख कारण कम-से-कम भारत के मामले में अमेरिका का व्यापार जगत पूरी तरह राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के साथ है। बल्कि ट्रम्प ने जिन कदमों का प्रस्ताव किया है, उसने उनसे भी आगे जाकर दबाव बनाने की माँग की है। यूनाइटेड स्टेट्स चैंबर्स ऑफ कॉमर्स (यूएससीसी) और कॉलिशन ऑफ सर्विसेज इंडस्ट्रीज (सीएसआई) ट्रम्प प्रशासन से टैरिफ के साथ-साथ “गैर-शुल्क रुकावटों” और “विनियमन सम्बन्धी बाधाओं” को हटाने के लिए भी भारत पर दबाव डालने की माँग कर चुके हैं।

(https://www.moneycontrol.com/news/business/us-firms-urge-trump-to-address-india-s-high-tariffs-and-trade-barriers-report-12973063.html)

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) पहले ही भारत के “व्यापार व्यवहार” की जाँच शुरू कर चुके हैं। सीएसआई ने ऑनलाइन डिलिवरी सेवा में भारतीय कम्पनियों के हित में लागू “अनुचित प्रावधानों” को हटवाने की माँग की है। अमेरिकी व्यापारियों को भारत में गुणवत्ता नियन्त्रण सम्बन्धी नियमों पर भी एतराज है। अमेरिकी दुग्ध व्यापारियों का संगठन- आईडीएफए चाहता है कि भारत का डेयरी बाजार अमेरिकी उत्पादकों के लिए खुलवाया जाए। गेहूँ, सोयाबीन, और ड्राई फ्रूट कारोबारियों ने भारत में कथित ऊँचे शुल्क और अन्य रुकावटों की तरफ अपनी सरकार का ध्यान खींचा है।

अमेरिकी दवा उद्योग भारत के पेटेंट कानून का मसला उठा ही चुका है। अमेरिका ने स्टील और अल्यूमिनियम पर 25 प्रतिशत का जो शुल्क लगाया, उससे भारत के सम्बन्धित उद्योग प्रभावित हो चुके हैं। यानी बात अब सिर्फ टैरिफ की नहीं रह गई है। ट्रम्प प्रशासन ने द्विपक्षीय सम्बन्धों में अधिकतम लाभ वसूलने की नीति खुलेआम अपना रखी है। अब यह भी साफ है कि उनकी इस नीति के पीछे अमेरिका के शक्तिशाली कॉरपोरेट्स, कृषि कम्पनियाँ, एवं टेक इंडस्ट्री समूह मजबूती से खड़े हैं। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा उन देशों को भुगतना पड़ेगा, जिन्होंने झुकने की नीति अपना रखी है।

दुर्भाग्य है कि भारत ऐसे ही देशों की कतार में नजर आता है। मगर यह बात सबको ध्यान में रखनी चाहिए कि अमेरिका को दी गई हर छूट का बुरा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। टैरिफ में दी गई हर छूट से राजकोष में सेंध लगेगी। सवाल है कि भारत सरकार उसकी भरपाई कैसे करेगी? और अधिक ऋण लेकर या परोक्ष करों के माध्यम से अपनी जनता पर बोझ डाल कर?

वर्तमान सरकार के गुजरे 11 साल के रिकॉर्ड पर ध्यान दें, तो संकेत यही मिलता है कि उसने अपने खजाने को भरने के लिए परोक्ष करों पर अधिक भरोसा किया है। उसका परिणाम उपभोक्ता बाजार सिकुड़ने के रूप में सामने आया है। लेकिन सरकार उससे अप्रभावित रही है।

सरकार के उसी नजरिए का एक और संकेत यह खबर है कि जीडीपी की गणना की अगली शृंखला में जीएसटी की उगाही को एक पैमाना बनाया जा सकता है। नए पैमानों पर मापी गई जीडीपी की अगली शृंखला फरवरी 2026 से लागू होने वाली है। सरकारी हलकों में समझ बनी है कि जीएसटी की उगाही निजी उपभोग को मापने का बेहतर पैमाना है। जीएसटी के आँकड़ों से सरकारी उपभोग का भी सही अन्दाजा लगता है। जीएसटी की जितनी उगाही होती है, उसमें लगभग साढ़े नौ प्रतिशत हिस्सा सरकारी उपभोग का है।

(https://www.business-standard.com/economy/news/mospi-to-start-using-gst-data-to-compute-gdp-post-base-year-revision-124091301352_1.html)

तो सरकारी हलकों में समझ बनी है कि जीएसटी उगाही को पैमाना बनाने से जीडीपी वृद्धि दर में अनुमान में सुधार होगा। जबकि जीएसटी के साथ एक पेच है। पेच यह है कि महँगाई बढ़ने के साथ जीएसटी की उगाही बढ़ जाती है। इसलिए कि जीएसटी वस्तुओं या सेवाओं के दाम पर प्रतिशत के हिसाब से लगता है। इसी तरह जीएसटी की दर बढ़ जाए, तो बिना उपभोग बढ़े सरकार को अधिक आय होगी।

इन दोनों स्थितियों में आर्थिक गतिविधियों में कोई बदलाव नहीं आएगा। मगर बिगड़ते हालात के बीच बेहतर आर्थिक सूरत पेश करने के लिए बेसब्र सरकार के पास आखिर पैमानों को बदलने के अलावा रास्ता क्या है!

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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