IIT जैसे उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित-आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों के प्रति क्यों है, इस कदर घृणा

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आईआईटी-बॉम्बे के छात्र दर्शन सोलंकी ने गत 19 फरवरी को आत्महत्या कर ली। एक दलित प्लंबर का पुत्र दर्शन सिर्फ 18 साल का था और  केमिकल इंजीनियरिंग में दूसरे सेमेस्टर में था। वह अपने परिवार का पहला स्नातक बनने का सपना पाले हुए मुंबई पहुंचा था।

लेकिन इतने बड़े उच्च शिक्षण संस्थान में व्याप्त संस्थागत जातीय घृणा ने इस मासूम सपने का दम घोंट दिया। दर्शन की मौत ने एक बार फिर हमें झकझोर कर इन बड़े संस्थानों और हमारे समाज में व्याप्त इस घृणा को समझने को मजबूर किया है।

2016 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध-छात्र रोहित वेमुला को इसी भेदभाव के चलते विश्वविद्यालय के छात्रावास से बाहर निकाल दिया गया था। लंबी मानसिक यंत्रणा के बाद वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी, जिस के बाद इस भेदभाव के खिलाफ एक देशव्यापी आंदोलन खड़ा हो गया था। लेकिन दर्शन की आत्महत्या ने साबित कर दिया है कि इन परिसरों में यह घृणा कम होने का नाम नहीं ले रही।

दिसंबर 2021 में केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने लोकसभा में बताया था कि 2014 से 2021 के बीच आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुल 122 छात्रों ने आत्महत्याएं कीं, जिनमें 24 अनुसूचित जाति के, 3 अनुसूचित जनजाति के, 41 अन्य पिछड़ी जातियों के और 3 अल्पसंख्यक थे। इन कमजोर वर्गों की कुल संख्या 71(58%) थी।

बीच-बीच में इन संस्थानों में भेदभाव की तमाम घटनाएं मीडिया में भी आती रही हैं। जैसे, आईआईटी खड़गपुर में अप्रैल 2021 में अंग्रेजी की तैयारी कराने वाली कक्षा में टीचर सीमा सिंह ने दलित-आदिवासी छात्रों को खुलेआम गालियां दी थीं। इसके बाद काफी विरोध प्रदर्शन के बाद आईआईटी ने उन्हें निलंबित किया।

देश भर में सांप्रदायिक कट्टरता तथा हिंदुत्ववादी राजनीति के उभार के बाद से उच्चवर्ण वर्चस्व और निम्न जातियों के प्रति घृणा का उभार भी बढ़ा है और साथ ही गांवों, मुहल्लों से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों के परिसरों तक जातीय भेदभाव और उत्पीड़न की घटनाएं भी बेलगाम होती गयी हैं।

आदर्श स्थिति तो यह है कि हर संस्थान को स्वयं को भाषा, जाति, वर्ग, लिंग और धर्म आधारित सभी व्यवधानों से मुक्त करना चाहिए ताकि हाशिये पर धकेल दिये गये समूहों के लोग वहां बेहिचक आकर अपनी योग्यता और नियति गढ़ सकें।

सबसे बड़ी समस्या है इन संस्थानों द्वारा अपने परिसरों में होने वाले जातीय भेदभाव और उत्पीड़न की घटनाओं को नज़रअंदाज करना, अस्वीकार करना और शिकायतों को दबाना तथा हतोत्साहित करना।

इन घटनाओं के प्रकाश में आने से संस्थान बदनाम होगा, इस नजरिये के चलते उनकी हर संभव कोशिश ऐसी समस्याओं को प्रकाश में आने से रोकने की होती है। नतीजा, समस्याएं भीतर-भीतर बढ़ती रहती हैं, जिनकी परिणति फिर किसी मासूम की आत्महत्या के रूप में होती है।

अपने परिजनों और सामाजिक समूहों द्वारा रोज-ब-रोज झेले जा रहे अपमान की दलदल से निकल कर ये नौजवान जब विज्ञान, तकनीकी, चिकित्सा और प्रबंधन के इन विश्वविख्यात संस्थानों की दहलीज पर क़दम रखते होंगे और उस अतीत से पीछा छुड़ा कर एक पूर्वाग्रह रहित परिवेश में कुछ नया रचने की उम्मीद पालना शुरू करते होंगे, ठीक उसी समय जब इन्हें यह अहसास होता होगा कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा “दिमाग़ी गुहांधकार की अतल गहराइयों में बैठाया गया वह औरांग उटांग” यहां भी उनका पीछा छोड़ने वाला नहीं है, तो पहले ही दिन उनके भीतर कितना कुछ टूट जाता होगा!

ज्यादातर आरक्षण वाले छात्रों का मानना है कि सवर्ण छात्र आरक्षण की वजह से उनसे घृणा करते हैं। वे सोचते हैं कि इन्हें आरक्षण देकर खुद सवर्ण छात्रों के साथ अन्याय किया जा रहा है। वे आरक्षण के पीछे के ऐतिहासिक सामाजिक पिछड़ेपन पर बात किये बिना मेरिट का समर्थन करते हैं।

आईआईटी-बॉम्बे में बीटेक प्रथम वर्ष की एक कक्षा में एक प्रोफेसर सवाल करता है कि “यहां कोटा से कौन-कौन है?” इस सवाल के धूर्त मंतव्य को समझे बिना रिजर्वेशन कोटा वाले मासूम छात्र खड़े हो जाते हैं। उसी दिन से उन पर “कोटा” का ठप्पा लग जाता है। जबकि यह पहचान उजागर करवा कर और उनके सीधेपन को उपहास का पात्र बनाकर वह प्रोफेसर बड़े आराम से बोल देता है कि मेरा आशय राजस्थान के कोटा शहर से तैयारी करके सेलेक्ट हुए छात्रों से था।

इसके बाद तो इन छात्रों को क्लास से कैंटीन तक, और पुस्तकालय से गलियारों तक, हर जगह “फ्रीलोडर”(मुफ्तखोर) या “छात्रवृत्ति वाले” का लेबल लगाकर छांट दिया जाता है, और “हम” और “वे” का अलगाव अस्तित्व में आ जाता है जो आगे हमेशा के लिए बना रहता है।

आईआईटी-बॉम्बे के भोजनालय में ‘शुद्ध शाकाहारियों,’ यानि लहसुन-प्याज भी न खाने वालों के लिए एक अलग स्थान निर्धारित है, हालांकि वहां ऐसा कोई बोर्ड नहीं लगा है। उस स्थान पर ग़लती से बैठ जाने वाले दलित-आदिवासी छात्रों को कई बार अपमान जनक तरीक़े से हटाया गया है।

ये छात्र जिन परिवारों और परिवेश से निकले होते हैं, वहां की चाल-ढाल, पहनावा, बातचीत का तरीक़ा, त्वचा की रंगत और रुक्षता वगैरह इन्हें पैसे वाले और सवर्ण परिवारों के छात्रों की परिमार्जित बोली-भाषा, तौर-तरीक़ों और लहजे से अलग पहचान लिया जाना आसान बना देता है।

जैसे, हो सकता है कि टेनिस कोर्ट में आरक्षित समूह का छात्र बहुत सधे हुए शॉट न लगा पाये, क्योंकि हो सकता है टेनिस खेलने का उसके जीवन में यह पहला मौक़ा हो, उसके पास अच्छे जूते या टेनिस की कोचिंग के लिए अतिरिक्त पैसे की व्यवस्था न हो। हो सकता है कि उसकी अंग्रेजी बोलने की टोन पर उसकी मातृभाषा या बोली का असर हो। ज्यादातर ये छात्र ज्यादा फीस वाले महंगे संस्थानों से पढ़ कर या कोचिंग करके नहीं आये होते हैं, जिसकी वजह से इनकी मेरिट भी उतनी ऊंची नहीं होती है।

कारण कोई भी हो सकता है। अंदर पहले से बैठी हुई नफरत की वजह से इनकी किसी भी बात का मजाक बनाया जा सकता है। मजाक बनाने में छात्रों के साथ-साथ, प्रोफेसरों और ऑफिस के कर्मचारियों से लेकर गार्ड तक कोई भी शामिल हो सकता है। ये परिस्थितियां इनके भीतर धीरे-धीरे अवसाद भरती रहती हैं। शिकायतों के प्रति संस्थान के टालमटोल वाला रवैया इस अवसाद को खतरनाक अंजाम तक पहुंचाने का कारक बन जाता है।

जातीय घृणा की जड़ें हमारे समाज के पोर-पोर तक धंसी हुई हैं। इतनी गहरी कि उच्चशिक्षा और तकनीक के संस्थानों का परिवेश भी इसे बदल नहीं पा रहा। हम बार-बार इस अहसास से रूबरू हो रहे हैं कि हमारा पारिवारिक-सामाजिक परिवेश हमें बोदा बना रहा।

यह समस्या सिर्फ किन्हीं दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़े वर्गों या अल्पसंख्यकों की नहीं है। यह पूरे भारतीय समाज के अस्तित्व का संकट है। जाति एक ऐसी बीमारी हैं,आज भी सबके जीवन को नर्क बनाये हुए है। यह असंख्य दिमागों में जहर बनकर बैठी है और पूरे परिवेश को विषाक्त बनाये हुए है। पूरे समाज में वैज्ञानिक नजरिये और विज्ञान की संस्कृति के विकास के मार्ग की यह सबसे बड़ी रुकावट है।

हालत यह है कि भारत से जाकर पश्चिमी देशों में नौकरी या व्यवसाय कर रहे तथा वहां की नागरिकता ग्रहण कर लिये लोगों में भी यह जहर अभी तक बना हुआ है। इसी वजह से बड़े-बड़े विदेशी संस्थानों मे भी लिंग, नस्ल, त्वचा के रंग, सांप्रदायिकता जैसे भेदभाव के प्रचलित रूपों के साथ-साथ अब जातीय भेदभाव को भी शामिल किया जाने लगा है।

2020 में अमरीकी कंपनी ‘सिस्को’ में कैलिफोर्निया में जातीय भेदभाव की एक घटना के प्रकाश में आने के बाद तो गूगल, फेसबुक, एप्पल जैसी सिलिकॉन वैली की कई कंपनियों में ऐसे भेदभाव की सैकड़ों घटनाएं सामने आईं। इसीलिए इन कंपनियों में अब भेदभाव के इस रूप के प्रति जागरूकता पैदा करने के पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण चलाये जाने लगे हैं।

हमारे देश में परिवार और गांव-मुहल्ला सबसे प्राथमिक इकाइयां हैं, जहां से मनुष्य बचपन में ही इस नफरत से संक्रमित होने लगता है। इसलिए इसके खिलाफ लड़ाई की शुरुआत भी यहीं से करनी होगी।

वर्तमान प्रभावी राजनीति के विकास की दिशा इस विष की ही खेती पर टिकी है। इसलिए उससे इसे हल करने की उम्मीद करना बिल्कुल व्यर्थ है। इसके हल के लिए वैज्ञानिक नजरिये वाले लोगों को अपने सुरक्षित खोल से बाहर निकलना होगा और संगठित होकर गांव-मुहल्लों तथा प्राइमरी से उच्च शिक्षा संस्थानों में नियमित शिविर आयोजित करने होंगे। अन्यथा न तो रोहित वेमुला इसके पहले शिकार थे, न ही दर्शन सोलंकी अंतिम। यह विष एक-एक कर हमारे बच्चों की जिंदगियों को निगलता रहेगा। 

(शैलेश अनुवादक और टिप्पणीकार हैं।)

4Comments

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  1. 1
    रघुवीर जैफ

    उक्त लेख समाज में व्याप्त सामाजिक बुराई का सटीक विश्लेषण हैं. मेरा अनुभव हैं कि हिन्दू समाज का तथाकथित उच्चवर्ग का “ओवरवैल्यूएशन “किया जा रहा हैं. इस “ओवरवैल्यूएशन”की हकीकत उजागर होते ही गौतम अडानी की तरह पर्दाफास हो जायेगा.

    • 2
      Gulab

      Peace comes after the bloody revolution by Lenin. No doubt if they want to do suicide they do but after finishing the body whichever responsible for their suicide even professor, students, director or any body and writing the notes for the reason behind this. In every institution students suffering by discrimination should sacrifice to them for next generation for peaceful education because without bloody revolution they will not stop to harrasment. Today too they think education is only their right.

  2. 3
    मुकेश

    आत्म हत्याएं उसी ratio में हुई जिस रेश्यो में रिजर्वेशन है लेकिन ऐसा लगता है जनरल कैटेगरी वालों का जिक्र करना भी गुनाह है। IIT में सभी पढ़ाई के दबाव में होते है । सीधी सी बात है हाई ranker कम दबाव में होगा। हर घटना को जातिवाद से जोड़ना धंधा बन चुका है।

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