18 अक्टूबर, 1977 को महाराष्ट्र विधानसभा में चर्चा के दौरान इंदिरा गांधी के साथ देवरस के पत्राचार के साथ ही कुछ अन्य पत्रों की प्रतियां भी सदन के पटल पर रखी गईं। इस पत्राचार में ही पता चला कि देवरस ने श्रीमती गांधी को दो नहीं, तीन पत्र लिखे थे। तीसरा पत्र उन्होंने 16 जुलाई, 1976 को लिखा था। उसमें भी सफाई देने के साथ ही संघ के ऊपर से प्रतिबंध हटाने तथा संघ के प्रचारकों, स्वयंसेवकों की रिहाई का अनुनय-विनय किया गया था। यह भी पता चला कि उन्होंने न सिर्फ श्रीमती गांधी और विनोबा भावे बल्कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण को भी तीन पत्र लिखकर आग्रह किया था कि वे आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए इंदिरा जी के साथ अपने अच्छे संबंधों का उपयोग करें।
उन्होंने 15 जुलाई, 1975 को चव्हाण को मराठी भाषा में लिखा, “संघ ने सरकार या समाज के खिलाफ दूर-दूर तक कुछ भी नहीं किया है। संघ के कार्यक्रमों में ऐसी चीजों के लिए कोई जगह नहीं है। संघ केवल सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में लगा हुआ है।” देवरस ने चव्हाण को दो और पत्र (24 नवंबर, 1975 और 22 दिसंबर, 1975 को) लिखे थे। संघ के बड़े नेता बापू राव मोघे ने 24 जुलाई, 1977 के पांचजन्य में इन पत्रों की पुष्टि करते हुए लिखा, “आरएसएस सरकार से संवाद चाहता था लेकिन सरकार ने बाला साहब देवरस के पत्रों का जवाब तक नहीं दिया था।”
बहरहाल, श्रीमती गांधी को लिखे देवरस के तीनों पत्रों में आपातकाल के विरोध, इसे हटाने या जेलों में बंद अन्य दूसरे लोगों को रिहा करने के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा गया। अपने पत्राचार में देवरस ने कभी भी आपातकाल और उसके दौरान लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर हुए कुठाराघात और सेंसरशिप की खुलकर आलोचना नहीं की और न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की वापसी पर जोर दिया। इसके बजाय, उनकी सलाह और निर्देश पर, आरएसएस के लोगों ने जेल से बाहर निकलने के लिए सरकार को बिना शर्त ‘वचन पत्र’ दिया। संघ के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे देशराज गोयल कहते हैं, “महाराष्ट्र सरकार ने जेल बंदियों की सशर्त रिहाई के लिए संघ से बिना शर्त लिखित आश्वासन की मांग की थी।
आरएसएस के लोगों ने स्वतंत्र एवं व्यक्तिगत रूप से ऐसे वचन पत्रों पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लिया था। इससे पुणे की यरवदा जेल में हलचल मच गई। सदाशिव बगाइतकर, बाबू राव सामंत और दशरथ पाटिल जैसे समाजवादी नेताओं ने जनसंघ के वरिष्ठ नेता रामभाऊ म्हालगी से मिलकर उनसे अपनी पार्टी के लोगों को इस तरह के वचन पत्रों पर हस्ताक्षर करने से रोकने को कहा। म्हालगी ने उन्हें बताया कि वचन पत्र पर हस्ताक्षर करने का निर्णय आरएसएस और जनसंघ के शीर्ष नेताओं द्वारा लिया गया था।”
नासिक सेंट्रल जेल में बंद संघ से जुड़े एक अधिवक्ता, वी एन भिडे ने देवरस के निर्देश पर 12 जुलाई, 1976 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री चव्हाण को एक पत्र में लिखा, “लगभग सात महीने पहले आपने यह विचार व्यक्त किया था कि 60 साल से अधिक उम्र के लोग और जिनका स्वास्थ्य ठीक नहीं हैं, उन्हें रिहा कर दिया जाना चाहिए। तदनुसार, इस तरह के बंदियों की एक सूची तैयार की गई थी। इसके अलावा उन्होंने यह वचन दिया है कि वे आपातकाल के खिलाफ कुछ नहीं करेंगे। 60 वर्ष से अधिक आयु के 150 बंदियों में से केवल 10-12 को ही छोड़ा गया है।
मेरे सुझाव पर 60 साल से कम उम्र के लोगों के लिए भी इस तरह की रियायत दी गई थी। जैसा कि मैंने अपने पिछले पत्र में कहा था कि एक वचन पत्र के आधार पर बंदियों को रिहा करने की शुरुआत कर दोनों पक्षों को संतुष्ट करना चाहिए। जहां तक वचन पत्र की शब्दावली का संबंध है, उसमें ‘अच्छे व्यवहार’ का लिखा जाना उचित नहीं होगा। मुझे उम्मीद है कि आप इसे हटवा देंगे।” उन्होंने आगे लिखा, “6 जुलाई, 1975 को, भारत रक्षा कानून के नियम संख्या 33 के तहत आरएसएस के विरुद्ध कार्रवाई की गई थी। इसके बाद संघ के पदाधिकारियों ने संघ को भंग कर इसकी सभी गतिविधियों को स्थगित कर दिया। इसलिए, रिहाई के लिए आरएसएस की गतिविधियों में भाग नहीं लेने की शर्त बेमानी हो जाती है। मुझे उम्मीद है कि आप इस प्रश्न पर विचार करेंगे……मैंने जो कुछ भी ऊपर लिखा है, उससे हमारा रुख स्पष्ट हो जाना चाहिए।”
पुणे के समाजवादी नेता-सामाजिक कार्यकर्ता बाबा अढाव ने आरएसएस की इस ‘रणनीति’ का और खुलासा ‘सेक्युलर डेमोक्रेसी’ (अगस्त, 1977) और साप्ताहिक ‘जनता’ (16 सितंबर, 1979) में किया है। बाबा अढाव खुद भी यरवदा जेल में बंद थे। इस तरह वह जेल में आरएसएस के लोगों के वचन पत्र या कहें माफीनामों के साक्षी भी थे। उन्होंने लिखा, “यरवदा सेंट्रल जेल में तीन या चार बार प्रोफार्मा वितरित कर बंदियों से पूछा गया कि कौन-कौन ‘वचनपत्र’ पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार हैं। मैंने खुद आरएसएस के अधिकांश लोगों को अपनी रिहाई के लिए वचन पत्र पर हस्ताक्षर करते देखा।”
उस समय के जानकार सूत्रों की मानें तो सरकार और संघ के नेतृत्व के बीच अंदरखाने यह सहमति बनी थी कि संघ से प्रतिबंध तो नहीं हटेगा और न ही संघ के लोगों को सामूहिक तौर पर माफी मिलेगी। अलबत्ता अगर वे लोग व्यक्तिगत तौर पर सरकार द्वारा तैयार वचन पत्र (माफीनामे के प्रारूप) को भरकर देंगे तो उनकी रिहाई के बारे में अलग-अलग विचार किया जाएगा। सरकार ने एक संक्षिप्त मसौदा फार्म तैयार किया, जिस पर देश भर की जेलों में आरएसएस के लोगों ने खुशी-खुशी हस्ताक्षर किए।
उनमें से कुछ ने तो जेल से बाहर निकलने के लिए मसौदा फार्म का इंतजार भी नहीं किया और अपनी भाषा में, ‘मैं सरकार के 20 सूत्री कार्यक्रमों का समर्थन करता हूं,’ लिखकर दे दिए। सरकार की तरफ से तैयार माफीनामे का प्रारूप इस प्रकार था, “मैं, श्री………जेल बंदी इस शपथ पत्र के जरिए वचन देता हूं कि अपनी रिहाई के बाद मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा जो आंतरिक सुरक्षा और सार्वजनिक शांति के लिए हानिकारक हो। मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा जिससे आवश्यक वस्तुओं के वितरण में बाधा आए। किसी भी तरह की अवैध गतिविधियों में भाग भी नहीं लूंगा। मैं ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होऊंगा जो मौजूदा आपातकाल के विरुद्ध हो।”
गौरतलब है कि संघ के सरसंघचालक तथा अन्य बड़े नेताओं के द्वारा यह पूरा पत्राचार, लोक संघर्ष समिति के सदस्यों को अंधेरे में रखकर किया गया था, जिनके साथ आरएसएस, जनसंघ और उसके तमाम नेता खासतौर से नानाजी देशमुख महत्वपूर्ण पद पर जुड़े थे। बाद में इंदिरा गांधी को लिखे देवरस के पत्रों को लेकर उनकी बहुत आलोचना हुई। लेकिन उस समय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री और अभी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय का मानना है कि बाला साहब देवरस का ये कदम एक खास रणनीति के तहत था जिसे संघ के सामान्य कार्यकर्ताओं ने पसंद नहीं किया था।
राय के अनुसार, “जिन दिनों ये पत्र लिखे गये, उन दिनों भूमिगत आंदोलन में शामिल सभी लोगों की कोशिश थी कि इंदिरा गांधी किसी तरह से चुनाव करवाने के लिए तैयार हो जाएं। इसके लिए उन्होंने माफी भी मांगने तक का मन बना लिया था।” दरअसल, बाला साहब देवरस की चिट्ठी को लेकर आरएसएस में दो तरह की प्रतिक्रिया थी। जो लोग ‘टैक्टिकल लाइन’ का समर्थन करते थे, वे मानते थे कि ये चिट्ठी ठीक है, लेकिन जो लोग इस लड़ाई को सैद्धांतिक मानते थे, उनको इस बात का अफसोस था कि बाला साहब ने ऐसी चिट्ठी क्यों लिखी।
कुशा भाऊ ठाकरे की स्वीकारोक्ति !
मध्य प्रदेश के समाजवादी नेता एवं आईटीएम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलाधिपति रमाशंकर सिंह के अनुसार, मध्य प्रदेश में संघ, जनसंघ, भाजपा के पितृ पुरुष और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे कुशाभाऊ ठाकरे ने 1977 में एक मुलाकात के दौरान इस संबंध में पूछे जाने पर कि आपातकाल में आपके लोगों ने इतने बड़े पैमाने पर माफी क्यों मांगी? शुरुआती ना नुकुर के बाद संक्षिप्त जवाब में कहा, “देखो भाई, हमारी पार्टी और संघ में मध्यमवर्गीय कामकाजी और व्यापारी लोग भी हैं। घर में अकेले कमाने वाले गरीब भी हैं। हम तुम सोशलिस्टों की तरह काम करेंगे तो हमारा संगठन ही नहीं बन पाएगा और ना ही फैल पाएगा। हम वो पेड़ नहीं जो आंधी में तन कर खड़े हों और टूट जाएं। हम तो वो घास हैं, जो आंधी तूफान में लगातार झुकते रहेंगे, लेकिन बने रहेंगे।”
अपनों के निशाने पर भी संघ
आपातकाल में आरएसएस की दोहरी भूमिका को लेकर न सिर्फ इसके नये-पुराने विरोधी बल्कि इसके अपने लोग भी सवाल खड़े करते रहे हैं। अंग्रेजी दैनिक ‘दि हिंदू’ में प्रकाशित अपने एक लेख में तत्कालीन जनसंघ और अभी भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व सांसद, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने आरोप लगाया कि आपातकाल के दौरान संघ-जनसंघ के बड़े नेता इंदिरा गांधी के साथ सुलह-सफाई में लगे थे। स्वामी ने अपने लेख में कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी के कहने पर संघ, इंदिरा गांधी के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए काफी हद तक आगे बढ़ गया था। 13 जून, 2000 को, आपातकाल की 25वीं वर्षगांठ से कुछ ही दिन पहले, ‘दि हिंदू’ में प्रकाशित अपने लेख में स्वामी ने दावा किया कि आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को माफी के पत्र लिखकर आपातकाल विरोधी आंदोलन को धोखा दिया था।
स्वामी ने लिखा, “यह महाराष्ट्र विधानसभा की कार्यवाही में रिकॉर्ड पर है कि तत्कालीन आरएसएस प्रमुख, देवरस ने इंदिरा गांधी को पुणे के यरवदा जेल से कई ‘माफी पत्र’ लिखे थे, जिसमें जे पी के नेतृत्व वाले आंदोलन से आरएसएस को अलग बताने के साथ ही इंदिरा गांधी के कुख्यात 20 सूत्री कार्यक्रमों के लिए काम करने की पेशकश की गई थी।” स्वामी ने दावा किया कि वाजपेयी ने भी इंदिरा गांधी को ‘माफी पत्र’ लिखा था। बकौल स्वामी, वाजपेयी के सरकार के खिलाफ किसी भी कार्यक्रम में भाग नहीं लेने के लिखित आश्वासन के बाद ही वह आपातकाल के दौरान अधिकतर समय जेल के बाहर पैरोल पर या नई दिल्ली में फिरोजशाह रोड पर स्थित अपने सरकारी बंगले पर ‘नजरबंद’ ही रहे।
हालांकि, स्वामी के अनुसार संघ में सभी लोग सरकार के समक्ष समर्पण मोड में नहीं थे। माधवराव मुले, दत्तोपंत ठेंगड़ी और मोरोपंत पिंगले जैसे अपवाद भी थे। स्वामी के आरोपों को कितना गंभीरता से लिया जाना चाहिए? वरिष्ठ पत्रकार कूमि कपूर की पुस्तक ‘दि इमरजेंसी: ए पर्सनल हिस्ट्री’ में भी इसका जिक्र मिलता है। कूमि कपूर सुब्रमण्यम स्वामी की पत्नी रोक्सना की बहन भी हैं। उनके पति, वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर का भी संघ के साथ गहरा जुड़ाव रहा है। अरुण जेटली के बेहद करीबी रहे वीरेंद्र कपूर भी आपातकाल में जेल गये थे।
अपनी पुस्तक के एक अध्याय, ‘स्वामी ऑन द रन’ में कूमि कपूर लिखती हैं, “विडंबना यह है कि बाला साहब देवरस ने, जिन्हें जेल में डाल दिया गया था, कोई वीरोचित भूमिका नहीं निभाई। जेल से उन्होंने इंदिरा गांधी को उनके नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कई पत्र भेजे, जिन्हें माफी पत्र के रूप में माना गया।” इससे भी संघ नेतृत्व पर स्वामी द्वारा ‘दि हिंदू’ में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है।
कूमि कपूर के अनुसार भी देवरस आरएसएस में अकेले नहीं थे, जो दबाव में झुक गए। वह स्पष्ट रूप से कहती हैं कि “नानाजी देशमुख और दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे आरएसएस के नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आपातकाल के विरुद्ध भूमिगत आंदोलन में सक्रिय लोगों का मनोबल टूट गया था। इनमें से अधिकतर लोगों ने इंदिरा गांधी के बीस सूत्री और संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रमों के प्रति अपनी निष्ठा जताई थी।” दि हिंदू के अपने लेख में, सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि आरएसएस के नेता मुले ने उन्हें विदेश जाने की सलाह दी थी।
क्यों? स्वामी लिखते हैं, “…. रुआंसे मुले ने नवंबर, 1976 की शुरुआत में मुझसे कहा था कि मुझे फिर से विदेश भाग जाना चाहिए क्योंकि आरएसएस ने जनवरी, 1977 के अंत में हस्ताक्षर किए जाने के लिए समर्पण के दस्तावेज को अंतिम रूप दे दिया है। और वाजपेयी के दबाव पर इंदिरा गांधी को खुश करने के लिए मुझे बलि का बकरा बनाया जा सकता है।” इसका जिक्र उनकी पत्नी रोक्सना ने भी अपनी पुस्तक ‘इवॉल्विंग विद सुब्रमण्यम स्वामीः ए रोलर कोस्टर राइड’ में किया है।
क्या स्वामी के इस आरोप का समर्थन करने के लिए पुख्ता सबूत हैं कि वाजपेयी ने इंदिरा गांधी के साथ किसी तरह का सौदा किया था? कूमि कपूर अपनी पुस्तक ‘दि इमरजेंसी: ए पर्सनल हिस्ट्री’ में लिखती हैं, “वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को 26 जून को बंगलौर (अभी बेंगलुरु) में गिरफ्तार किया गया था। कुछ दिनों के बाद, वाजपेयी के पेट में भारी दर्द और तेज बुखार की शिकायत पर उन्हें शहर के विक्टोरिया अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां गलती से उनके अपेंडिसाइटिस का ऑपरेशन किया गया जबकि उन्हें टाइफाइड था। अनावश्यक ऑपरेशन के कारण उन्हें सेप्टिसीमिया हो गया। उन्हें स्लिप डिस्क भी हो गया। उनका चलना फिरना बंद हो गया था। बाद में उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में स्थानांतरित कर पांचवीं मंजिल पर अलग-थलग रखा गया।” कूमि कपूर ने वाजपेयी के किसी माफी पत्र का उल्लेख नहीं किया है। लेकिन वह कहती हैं, “आखिरकार, ‘बेड रिडेन’ होने के कारण वाजपेयी को घर में रहने के लिए पैरोल दी गई थी। वह फिरोजशाह रोड पर स्थित अपने सरकारी आवास पर अपनी मित्र कौल परिवार के साथ रहने लगे।”
23 मार्च, 1998 के अंक में आउटलुक पत्रिका ने स्वामी की आत्मकथा, ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स-ए फ्यू एनिमीज टू’ के कुछ अंश प्रकाशित किए जिसे तमिल साप्ताहिक ‘कुमुदम’ ने सीरियलाइज किया था। 20 फरवरी, 1997 के ‘कुमुदम’ में स्वामी एक जगह कहते हैं, “जेल से बाहर आने के लिए, इंदिरा गांधी को माफी का पत्र देकर वाजपेयी ने एक बुरी मिसाल कायम की थी।” 25 नवंबर-1 दिसंबर, 2012 को, दि इकोनॉमिक टाइम्स की साप्ताहिक परिशिष्ट में निस्तुला हेब्बर ने स्वामी के हवाले से लिखा, “आपातकाल के दौरान वाजपेयी चाहते थे कि मैं आत्मसमर्पण कर दूं।
उन्हें लगा कि इससे सरकार के पास सकारात्मक संदेश जाएगा। लेकिन आरएसएस में कुछ बड़े लोगों ने मुझे किसी भी परिस्थिति में ऐसा नहीं करने के लिए कहा था। इसलिए मैंने वैसा नहीं किया।” अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति स्वामी की शुरू से ही जगजाहिर खुन्नस के मद्देनजर उनके आरोपों की ‘गंभीरता’ को समझा जा सकता है! उन्होंने लगातार अपने लेखों और बयानों में वाजपेयी के जिस माफी पत्र का जिक्र किया है, वह पत्र पब्लिक डोमेन में कहीं देखने को नहीं मिलता। लेकिन ‘दि हिंदू’ में उनका लेख जब प्रकाशित हुआ, उस समय वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे, उनकी तरफ से किसी तरह का कोई खंडन और प्रतिवाद भी देखने को नहीं मिला।
(आपातकाल में जयशंकर गुप्त खुद अपने समाजवादी पिता विष्णुदेव के साथ लंबे समय तक आज़मगढ़ की जेल में कैद थे।)
