राजनीतिक माहौल बदलने के लिए सरकार डिलिमिटेशन बिल दोबारा लायेगी?

चुनाव धांधली-विरोधी आंदोलन से परेशान भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार क्या मौजूदा राजनीतिक माहौल को बदलने के लिए एक बार फिर ‘डिलिमिटेशन-सह-महिला आरक्षण बिल’ को संसद में ला सकती है? क्या वह उसे पारित भी करा सकती है? क्या उसने प्रस्तावित 131वें संविधान-संशोधन को सदन की मंजूरी दिलाने लायक दो-तिहाई बहुमत का जुगाड़ कर लिया है? पिछले कुछ दिनों से राजधानी के राजनीतिक गलियारों में ऐसे सवालों के साथ तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

17 अप्रैल 2026 को लोकसभा ने इस संविधान-संशोधन विधेयक को नामंजूर कर दिया था। तमाम कोशिशों के बावजूद तब मोदी सरकार अपने विधेयक के पक्ष में बहुमत नहीं जुटा सकी। तब सरकारी विधेयक के पक्ष में 298 वोट आये जबकि विपक्ष को 230 सदस्यों का समर्थन मिला। संविधान संशोधन विधेयक गिर गया क्योंकि उसे सदन का दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। उस समय सदन में 528 सदस्यों की उपस्थिति थी। विधेयक की मंजूरी के लिए 352 सदस्यों के समर्थन की जरूरत थी। लेकिन सरकार को वह समर्थन नहीं मिला। 54 वोटों की कमी रह गई। क्या सरकार ने अब वो कमी पूरी कर ली है? 

संसद का पिछला मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया था। लेकिन सरकार ने संसदीय कामकाज की दृष्टि से एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा की और अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किये सत्र के दो महीने बाद भी आज तक उसके सत्रावसान की अधिसूचना नहीं जारी कराई। यह अधिसूचना सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति भवन जारी करता है।

विपक्ष के कुछ प्रमुख नेताओं ने पिछले दिनों कहा कि सरकार के इस अटपटे रवैये के पीछे निश्चय ही उसकी कोई राजनीतिक योजना हो सकती है। हो सकता है कि वह नामंजूर हो चुके अपने विवादास्पद डिलिमिटेशन बिल में कुछ फेरबदल करके किसी वक्त सदन में पेश कर पारित कराने की योजना बना रही हो! सत्रावसान की अधिसूचना नहीं हुई है इसलिए वह बहुत कम समय के नोटिस पर सदन की कार्यवाही के लिए सत्र का पुनरारंभ कर सकती है।

पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं ने भी डिलिमिटेशन बिल के बारे में सांकेतिक बयान दिये हैं। इन बयानों में डीएमके के टैक्टिकल सहयोग से लेकर कुछ अन्य विपक्षी सदस्यों के सदन से अनुपस्थित रहकर भाजपा सरकार के विधेयक को सदन की मंजूरी पाने में ‘परोक्ष सहयोग’ की बात कही गई है। सत्ता के नजदीकी कुछ सूत्रों की तरफ से तो समाजवादी पार्टी के बारे में भी ऐसी ही बातें कही जा रही हैं। हालांकि समाजवादी पार्टी ने अभी तक इस बारे में कुछ भी नहीं कहा है। पिछले सत्र में उसने कांग्रेस, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस के साथ मिलकर विवादास्पद डिलिमिटेशन विधेयक का विरोध किया था। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि टीएमसी की टूट और इंडिया ब्लॉक से डीएमके का अलगाव के बाद संसद के दोनों सदनों के संख्यागत समीकरण में कुछ उल्लेखनीय बदलाव हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी और उसकी अगुवाई वाली सरकार इसका इस्तेमाल करने की हरचंद कोशिश कर रही हैं। इस वक्त देश के बड़े हिस्से में विपक्ष और युवाओं के चुनाव-धांधली विरोधी आंदोलनों के कारण राजनीतिक माहौल सरकार के प्रतिकूल बना हुआ है। मोदी-शाह की जोड़ी हर हालत में इस माहौल को बदलने की रणनीति तलाश रही है।

क्या डिलिमिटेशन संशोधन विधेयक इसका जरिया बन सकता है? क्या वाकई भाजपा ने कुछ अन्य विपक्षी दलों या उनके कुछ सदस्यों को अपने पक्ष में पटा लिया है? अगर ऐसा कुछ हो पाया तो निश्चय ही राजनीतिक माहौल में भाजपा का मनचाहा डायवर्जन या बदलाव संभव हो सकता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले चार-पांच महीने के दौरान सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी या उसकी अगुवाई वाले सत्ताधारी गठबंधन के चुनौती-विहीन होने के राजनीतिक अंहकार को विपक्षी दलों और ‘जेन-जी’ कहे जाने वाले युवाओं के आंदोलनों ने बहुत प्रभावशाली चुनौती दी है। जिस भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कहा करता था कि उसकी अगुवाई वाली सरकारों में किसी का (विपक्ष की मांग पर) इस्तीफा नहीं होता, उसे ‘नीट-परीक्षा धांधली विरोधी जेन-जी आंदोलन’ के दबाव में आकर अपने बेहद प्रभावशाली तत्कालीन शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा था।

आज एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार को विपक्ष और कुछ गैर-पार्टी संगठनों और सिविल सोसायटी आदि ने गंभीर चुनौती दी है। वे देश के बेहद विवादास्पद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के अलावा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को रद्द कराने की मांग पर अड़े हुए हैं। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ राजनीतिक और न्यायिक दोनों मोर्चों पर लड़ रहा है। गैर-पार्टी संगठनों और सिविल सोसायटी का भी एक ढीला-ढाला समन्वय सामने आ चुका है, जिसमें काकरोच जनता पार्टी के अलावा वामपंथी छात्रसंगठन-एआईएसए, एसएफआई और एआईएसएफ आदि हैं।

इनके साथ सिविल सोसायटी का एक प्रभावशाली हिस्सा भी जुड़ गया है। सरकार छात्र-युवाओं और सिविल सोसायटी के प्रोटेस्टर्स के एक हिस्से को कानूनी पेंच में फंसाकर निष्किय करने की रणनीति में जुटी है लेकिन उसे मालूम है कि संसदीय विपक्ष, खासतौर पर कांग्रेस, ममता बनर्जी की टीएमसी और वामपंथी दलों को वह ऐसे हथकंडों से खामोश नहीं कर सकती है। इसके लिए उसके पास फिलहाल दो विकल्प नजर आ रहे हैं। एक तो ये कि एसआईआर और चुनाव-धांधली सम्बन्धी विपक्षी दलों की तरफ से दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट से ऐसा कोई फैसला आ जाये जिससे विपक्षी खेमा हताश होकर चुप हो जाय! 

दूसरा विकल्प है कि सरकार संसद के स्थगित अधिवेशन को फिर से बुलाए और उसमें डिलिमिटेशन-सह-महिला आरक्षण विधेयक को मंजूर कराने लायक दो-तिहाई बहुमत हासिल कर ले! क्या ऐसा संभव है? है भी और नहीं भी, कुछ भी हो सकता है! तमिलानाडु और पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजे के बाद परिस्थितियां बदली हैं। चुनाव से पहले ऐसा होना बिल्कुल संभव नहीं था। पर आज की परिस्थिति में कुछ भी हो सकता है। अपनी कामयाबी के लिए हर तरह के दंद-फंद के इस्तेमाल में उस्ताद मानी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार के लिए दोनों राज्यों के चुनावी नतीजे से समीकरण कुछ अनुकूल हुए हैं।

2024 के संसदीय चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद लोकसभा के लिए चुने गये थे, इनमें कम से कम 20 सांसद अब सत्ता-पक्ष के साथ हैं। पिछली बार जब डिलिमिटेशन विधेयक पर वोटिंग हुई थी, इन सबने विपक्ष के साथ वोटिंग की थी। इस बार ऐसा नहीं होने वाला है। जहां तक तमिलनाडु के डीएमके से सम्बद्ध 22 लोकसभा सांसदों का सवाल है; उनके बारे में फिलहाल ऐसा नहीं कहा जा सकता। हालांकि तमिलनाडु में भी विपक्ष के राजनीतिक समीकरण पहले जैसे नहीं रह गये हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव के तत्काल बाद कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन में अपने बेहद सक्रिय सहयोगी दल-डीएमके को नजरंदाज कर फिल्म अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय की नयी-नवेली पार्टी टीवीके को सरकार बनाने में साथ दिया। विजय की पार्टी नंबर वन बनकर उभरी थी पर बहुमत से कुछ पीछे थी। डीएमके विधानसभा में दूसरे नंबर की पार्टी के रूप में उभरी और वह किसी हालत में भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान ने डीएमके को छोड़कर टीवीके के साथ गठबंधन में उतरने का फैसला कर लिया।

इसके एवज में कांग्रेस को तमिलनाडु से राज्यसभा की एक सीट और कैबिनेट में दो मंत्री पद मिले। डीएमके नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने इसे कांग्रेस की दगाबाजी कहा। देखते-देखते दो पुराने सहयोगी दल एक-दूसरे के विरोधी बन गये। तमिलनाडु से आने वाले कांग्रेस के  प्रभावशाली अपेक्षाकृत नये किन्तु प्रभावशाली नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व से यह फैसला कराया। पी चिदम्बरम सहित ज्यादातर पुराने कांग्रेसी नेता ऐसा नहीं चाहते थे। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे भी डीएमके को छोड़ने के पक्ष में नहीं थे।

लेकिन प्रवीण चक्रवर्ती और प्रदेश कांंग्रेस अध्यक्ष मानिकम टैगोर जैसे अपेक्षाकृत नयी पीढ़ी के कांग्रेसी नेता डीएमके के साथ विपक्ष में बैठने के मुकाबले सत्ता में हिस्सेदारी के पक्ष में थे। बताते हैं कि नयी पीढ़ी के सुझाव को राहुल गांधी की भी हरी झंडी मिल गई। उसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को भी सहमत होना पड़ा। उस समय टीम-राहुल को चक्रवर्ती और टैगोर की राजनीतिक व्याख्या पंसद आई। चक्रवर्ती को राज्यसभा सीट भी मिल गई। पर दिल्ली में संसदीय समीकरण बुरी तरह गड़बड़ हो गये।

डीएमके जैसा एक विश्वस्त राजनीतिक सहयोगी भी बिछड़ गया और लोकसभा में कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडिया एलायंस ने 22 सदस्यों का स्थायी समर्थन खो दिया। डीएमके सूत्रों का कहना है कि पार्टी के नेता एम के स्टालिन चुनाव के बाद कांग्रेस ने जिस तरह उनके साथ ‘राजनीतिक दगाबाजी’ की, उससे वह नाराज जरूर हुए थे। पर कांग्रेस आलाकमान ने अगर उनसे संवाद का सिलसिला बनाये रखा होता तो वह शायद इतने आहत नहीं हुए होते। पर टीवीके के साथ सत्ता में हिस्सेदार बनने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने उनको नजरंदाज करना शुरू कर दिया। बताते हैं कि इसमें चक्रवर्ती और टैगोर की बड़ी भूमिका रही।

लेकिन तमिलनाडु की राजनीति के ज्यादातर गंभीर प्रेक्षक मानते हैं कि डीएमके डिलिमिटेशन बिल के मौजूदा प्रारूप का हरगिज समर्थन नहीं करेगी। किसी गठबंधन-सहयोगी के साथ उभरे राजनीतिक मतभेद या ‘मनभेद’ के बावजूद एम के स्टालिन जैसा प्रौढ़ नेता तमिलनाडु सहित पूरे दक्षिण भारत के लिए नुकसानदेह माने जाने वाले डिलिमिटेशन विधेयक का समर्थन करने जैसा आत्मघाती कदम उठाने का जोखिम नहीं लेगा। लेकिन कांग्रेस से खुन्नस निकालने के लिए डीएमके दोबारा इंडिया एलायंस में नहीं आयेगी।

बताते हैं कि भाजपा की तरफ से डीएमके को मनाने की पुरजोर कोशिश हो रही है। इसके लिए देश के हर राज्य की संसदीय सीट में 50 फीसदी की बढ़ोत्तरी का एक फार्मूला भी चर्चा में है। लेकिन डीएमके के नेता अच्छी तरह जानते हैं कि इसका फायदा भी उत्तर और मध्य के ज्यादातर आबादी वाले राज्यों को ही मिलेगा। यह भी कहा जा रहा है कि डीएमके को वोटिंग के समय सदन से वाकआउट करने के लिए मनाने के साथ कुछ और बडे़ आफर भी दिये जा रहे हैं। इनमें एक आफर केंद्रीय मंत्रिमंडल में डीएमके को दो कैबिनेट पोस्ट का भी आफर हो सकता है।

क्या डीएमके एक फिर एनडीए की तरफ मुखातिब होने की गलती कर सकती है, वह भी ऐसे दौर में जब एनडीए के नेता वाजपेयी नहीं, मोदी हैं और आज की भाजपा के पास लोकसभा-राज्यसभा में अपेक्षाकृत ज्यादा सीटें ही नहीं हैं, सिस्टम पर संघ-भाजपा की वैचारिकी का लगभग कब्जा हो चुका है।

चर्चा में समाजवादी पार्टी भी है कि उसके कुछ सांसद ‘डिलिमिटेशन बिल’ पर भाजपा का साथ दे सकते हैं। बहुत संभव है, राजनीतिक गलियारों से मीडिया में आने वाली ऐसी गप-नुमा खबरें विपक्ष का मनोबल तोड़ने के लिए प्रसारित की जा रही हों! पर देश की मौजूदा संसदीय राजनीति में ऐसे उलट-पुलट की संभावना या आशंका से इंकार भी नहीं किया जा सकता। कुछ महीने पहले तक कौन कह सकता था कि काकोली घोष दस्तीदार और सयानी घोष जैसी तृणमूल की सेक्युलर मिजाज वाली मुखर सांसद भी भाजपा के पक्ष में जा सकती हैं!

इसलिए डिलिमिटेशन विधेयक पर सत्ता-पक्ष और विपक्ष की भावी रणनीति को लेकर अटकलें लगाने की बजाय फिलहाल कुछ इंतजार करना श्रेयस्कर होगा। पर भाजपा हारी हुई बाजी जीतने के लिए काफी कोशिश कर रही है और विपक्ष इस मुद्दे पर लगभग निष्क्रिय नजर आ रहा है!  पिछले कुछ महीनों में विपक्ष के सबसे बड़े और सर्वमान्य नेता राहुल गांधी दो बार चैन्नई गये लेकिन डीएमके प्रमुख स्टालिन से संवाद या सम्बन्ध सुधारने की किसी पहल की सूचना नहीं आई। फिलहाल कोई नहीं जानता कि अगले महीने संसदीय राजनीति के मौजूदा संख्यागत समीकरण यथावत रहेंगे या फिर कुछ उलटफेर हो सकता है?    

(उर्मिलेश प्रिंट और टीवी मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं और यूट्यूब चैनल UrmileshOfficial भी चलाते हैं।)

    

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