Subscribe for notification

वनाधिकार कानून की धज्जियां उड़ाते हुए अडानी ने खरीद लीं आदिवासियों की जमीनें

रायपुर। आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करने के लिए यूपीए सरकार ने वनाधिकार मान्यता कानून 2006 FRA बनाया था। उसकी खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। छत्तीसगढ़ में अडानी की कंपनी ने 15 आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की जमीन खरीद ली है। कंपनी ने यह जमीन IFR व्यक्तिगत वन अधिकार पत्रक की खरीददारी कर की है। अंडानी की कंपनी सरगुजा में परसा ईस्ट केते बासन कोल ब्लॉक को संचालित कर रही है। अडानी की कंपनी के नाम से चेक का भुगतान भी किया गया है।

एसडीएम, एसडीओ और असिस्टेंट कमिश्नर की संयुक्त रिपोर्ट में बताया गया है कि राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को घाटबर्रा स्थित 1898 हेक्टेयर वन भूमि गैर वानिकी कार्य के लिए सशर्त दी गई है। अडानी ने जिन 32 वन अधिकार पत्रक धारकों से जमीनें लीं हैं, वह जमीन भी इसी क्षेत्र में आती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर शासन की ओर से बनाई गई कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में यह माना है कि अडानी की कंपनी ने अवैधानिक तरीके से आदिवासियों से जमीन की खरीददारी की है। कमेटी ने यह स्पष्ट किया है कि वन अधिकार की भूमि को बगैर अधिग्रहण खनन के लिए ले लिया गया। कमेटी ने अग्रिम कार्रवाई के लिए सरगुजा कलेक्टर को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।

गौरतलब है कि उदयपुर तहसील के घाटबर्रा गांव के 32 आदिवासी किसानों की वन अधिकार पत्र के तहत मिली जमीनों को नोटरी के माध्यम से खरीद लिया गया था। अडानी की कंपनी ने आदिवासियों को चेक के जरिए भुगतान किया था, जबकि साल 2013 के कानून के तहत वन अधिकार पत्रक धारक ही वास्तविक भू स्वामी माना गया है, लिहाजा उनकी भूमि बगैर अधिग्रहण खनन के लिए नहीं लिया जा सकता।

छत्तीसगढ़ किसान सभा ने सरगुजा-कोरबा के केते बासन और परसा ईस्ट कोल क्षेत्र के घाटबर्रा और अन्य गांवों में अडानी इंटरप्राइजेज द्वारा नोटरी के शपथ पत्र के जरिए किसानों की जमीन हड़पने और अधिग्रहण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए अडानी प्रबंधन के लोगों के साथ ग्राम खिरती में तहसीलदार और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के पहुंचने की तीखी निंदा की है। इन दोनों मामलों में राज्य सरकार से एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है।

आज यहां जारी एक बयान में छग किसान सभा के अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने आरोप लगाया है कि इस क्षेत्र की ग्राम सभाओं के विरोध के बावजूद और हसदेव अरण्य की कोयला खदानों की नीलामी पर रोक की घोषणा के बावजूद ये दोनों उजागर मामले बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में आज कांग्रेस सरकार भी पहले की भाजपा सरकार की तरह ही अडानी की सेवा में लगी हुई है और पर्दे की आड़ में हसदेव स्थित कोयला खदानों को मुनाफा कमाने के लिए अडानी को देने का खेल खेला जा रहा है। साफ है कि हसदेव अरण्य के कोल ब्लॉकों को नीलामी से बाहर रखने की राज्य सरकार द्वारा केंद्र से की गई अपील मात्र ‘दिखावा’ है।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने कहा कि भूपेश राज में बेखोफ अडानी आदिवासियों की जमीन खरीद रहा है। क्या छत्तीसगढ़ सरकार स्वतः संज्ञान लेकर अडानी कंपनी के खिलाफ अपराध पंजीबद्ध करेगी? अडानी कंपनी का यह कृत्य सिर्फ वनाधिकार मान्यता कानून का ही उल्लंघन नही हैं बल्कि भूमि अधिग्रहण कानून 2013 और खनन के लिए जारी वन स्वीकृति की शर्तों का भी उल्लंघन हैं। इसीलिए इस परियोजना की वन स्वीकृति को ही राज्य सरकार को निरस्त कर देना चाहिए, जिसे पहले ही नेशनल ग्रीन ट्रिव्यूनल द्वारा निरस्त किया जा चुका है।

(जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

This post was last modified on August 27, 2020 12:55 pm

Share