Sunday, October 24, 2021

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सीपी कमेंट्री : पहुंची ‘महाराजा’ की खाक टाटा को जिसका खमीर था

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नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत की ध्वजवाहक अन्तरराष्ट्रीय विमानन कंपनी एयर इंडिया को मुनासिब कीमत पर बेचने के बरसों के अपने प्रयास में विफल रहने के बाद उसे औने-पौने दाम में टाटा संस समूह के हवाले कर दिया है। टाटा की पहले से ही दो नागरिक विमानन कंपनियां, विस्तारा और एयर एशिया इंडिया हैं जो घाटे में हैं। मोदी सरकार ने टाटा की बोली पिछले सप्ताहांत मंजूर कर ली। टाटा ने यह डील किन शर्तों पर की है उसका ज्यादा खुलासा नहीं किया गया है।

करीब 61 हजार करोड़ रुपए के कर्ज के बोझ से दबे एयर इंडिया को बेचने की मोदी जी की भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) की केंद्र में बनी पहली अटल बिहारी वाजपेई सरकार के कार्यकाल में 2001 में ही शुरू हो गई थी। उस सरकार ने बाकायदा पहली बार विनिवेश मंत्रालय ही खोल दिया था जिसके मंत्री विश्व बैंक की सेवा से बरास्ते पत्रकारिता राजनीति में घुस आए अरुण शौरी थे।

एयर इंडिया को बेचने की कोशिशें कई बार टांय-टांय फिस्स होने के बावजूद मोदी सरकार ने इसे बेचने के नए-नए प्रयास चालू रखे। 2018 में 118 एयरक्राफ्ट के साथ एयर इंडिया का बेड़ा , इंडिगो के बाद दूसरे नंबर पर था। लगातार बढ़ते घाटे और कर्ज में डूबी एयर इंडिया में भारत सरकार की हिस्सेदारी का 76 प्रतिशत विनिवेश करने के लिए मोदी राज की कोशिश 2019 के चुनावी बरस में नाकाम रही थी। तब सरकार ने मान लिया इसे बेचने का सही समय नहीं है।तत्कालीन केंद्रीय वित्त्त मंत्री अरुण जेटली (अब दिवंगत) द्वारा बुलाई बैठक में एक मंत्री-समूह ने इसे ‘ चुनावी साल ‘ में न बेचने का निर्णय कर उसे चलाने धन मुहैया कराने का निश्चय किया था।

लोक सभा चुनाव 2019

लेकिन उस बरस लोक सभा चुनाव समाप्त होने के पहले ही एयर इंडिया ने दक्षिण दिल्‍ली के पॉश वसंत विहार इलाके में अपने कर्मियों की कॉलोनी के 810 फ्लैट्स खाली करने के गुपचुप आदेश जारी कर दिए। फ्लैट्स खाली कराने के लिए एयर इंडिया ने उनमें रहने वाले कर्मचारियों को किराये पर मकान लेने के लिए योजना पेश की। इसके तहत किराये की राशि में 5 हजार रूपये से लेकर 25,000 रुपए तक की वित्‍तीय मदद, ब्रोकरेज चार्ज और घरेलू सामान के ट्रांसपोर्टिंग का खर्च वहन करने की बात शामिल थी। सरकार ने यह योजना एयर इंडिया की विभिन्‍न संपत्तियों की बिक्री से उसके भारी कर्ज को कम करने के लिए तैयार की। एयर इंडिया के विभिन्‍न शहरों में भूखंड , फ्लैट्स और भवन बेचने के लिए बोलियां आमंत्रित कर करीब 9,000 करोड़ रुपए की आमद की संभावना व्यक्त की गई। मोदी सरकार को लगा कर्ज का भार कम होने से एयर इंडिया के शेयर बेचने का वैलुएशन बेहतर होगा और उसके विनिवेश में विद्यमान गतिरोध दूर हो सकेंगे।

लाइन ऑफ क्रेडिट

मंत्री समूह ने 2019 में ही एयर इंडिया के ‘ रूपांतरण ‘ पर जोर दिया था ताकि यात्रियों को वैश्विक स्तर की सुविधाएं उपलब्ध हो सकें। लगातार घाटे में चल रही इस एयरलाइन में सरकार अप्रैल 2012 में घोषित बेलआउट पैकेज के तहत पहले ही 26,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी डाल चुकी थी। एयर इंडिया में नए सिरे से पूंजी डालना सरकार के लिए जरूरी हो गया। उसके कर्जदाता कंसोर्टियम के तीन बैंकों , देना बैंक, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक और इलाहाबाद बैंक ने इस एयरलाइन को आगे ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ देने से इनकार कर दिया। ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ बैंक और कर्जदार के बीच समझौता होता है जिसके तहत कर्जदार कभी भी तय सीमा के मुताबिक उधारी ले सकता है।

सरकार ने पहले ही स्वीकार कर लिया था कि एयर इंडिया के स्वामित्व की हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव पर बोली लगाने के लिए किसी ने एक्सप्रेशन ऑफ़ इंटरेस्ट दाखिल नहीं किया। विनिवेश के उक्त विफल प्रयास में एयर इंडिया, उसकी किफायती दरों की सहायक कम्पनी ,एयर इंडिया एक्सप्रेस और एयर इंडिया स्टैट्स एयरपोर्ट सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड की भी हिस्सेदारी बेचने की बात थी।

विनिवेश के लिए निर्धारित समय की समाप्ति तक किसी भी खरीदार की कोई बोली नहीं आयी थी। विनिवेश की भावी योजना पर इस मंत्री समूह को निर्णय लेना था। इसके सम्मुख कई विकल्प पेश किये गए थे। एयर इंडिया के कर्मचारियों के वेतन भुगतान में देरी तथा कम्पनी की विनिवेश योजना में अनिश्चितता माहौल में तत्कालीन नागर विमानन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने कहा था कि मोदी सरकार ,एयर इंडिया को पर्याप्त नकदी और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराएगी।

सरकार ने कर्ज में डूबी इस कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने के विकल्प पर भी विचार किया। लेकिन यह भी संभव नहीं हो सका। कंपनी को सूचीबद्ध करने से पूंजी की उगाही हो सकती थी। लेकिन इसके लिए भारत के प्रतिभूति एवं शेयर बाजार के नियमन के लिए बनी संस्था ,सेबी के मानदंडों के अनुरूप एयर इंडिया को तीन वर्ष तक लाभ की स्थिति में रहना आवश्यक है।

मजदूर यूनियनों का विरोध

एयर इंडिया के विनिवेश प्रस्ताव का कर्मचारियों की यूनियन विरोध करती रही हैं। भाजपा के घोषित मात्र (आदि) संगठन , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस ) समर्थक स्वदेशी जागरण मंच ने एयर इंडिया कंपनी का प्रारम्भिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाने का सुझाव देते हुए कहा था कि एयर इंडिया को बचाने और इसके सक्षम संचालन की जरूरत है।
आर्थिक मामलों के तब के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के अनुसार एक विकल्प यह भी था कि सरकार अपनी शत-प्रतिशत हिस्‍सेदारी बेच दे। एयर इंडिया के नियुक्त सलाहकार,’ ईवाई ‘ ने कहा कंपनी में अल्पांश हिस्सेदारी सरकार के पास रखने जाने का प्रावधान इसकी बिक्री की राह में सबसे बड़ी बाधा बनी है। बिक्री में अड़चन के अन्य आधार एक साल तक कर्मचारियों को कंपनी के साथ बनाए रखने का प्रावधान भी है।
भारत की सबसे बड़ी घरेलू एयरलाइंस, इंडिगो ने शुरु में एयर इंडिया को खरीदने में रूचि दिखाई थी। बाद में उसने अपने हाथ खींच लिए। इसकी वजह सरकार द्वारा एयर इंडिया के अंतरराष्‍ट्रीय ऑपरेशंस को अलग से न बेचना था. एयर इंडिया को चालू रखने कई बेलआउट पैकेज भी दिए गए। लेकिन इसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।

इतिहास

यह भारत की ध्वजवाहक राजकीय विमानयात्रा -सेवा कम्पनी है जिसकी स्थापना देश की आज़ादी से पहले 1932 में टाटा एअरलाइन्स के रूप मैं की गई थी। इसके बेड़ा में अभी मुख्यतः एयरबस और बोईंग कम्पनी के 31 विमान है। बड़े में और 40 विमानों को लाने के आदेश 2019 में दिए गए। उसकी भारत में 12 और देश के बाहर 39 नगरों की नियमित उड़ानें हैं।
जेआरडी टाटा ने 1932 में टाटा एयरलाइंस लॉन्च की थी। इसका नाम 1946 में बदल कर एयर इंडिया कर दिया गया। सन 1953 में सरकार ने इसको टाटा से खरीद लिया था। 2000 तक एयर इंडिया मुनाफे में चलती रही। 2001 में कंपनी को 57 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।

वाजपेई सरकार के बाद केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की मनमोहन सिंह सरकार ने 2007 में एयर इंडिया में इंडियन एयरलाइंस का विलय कर दिया। इस विलय के वक्त संयुक्त घाटा 770 करोड़ रुपये था, जो विलय के बाद बढ़कर के 7200 करोड़ रुपये हो गया। एयर इंडिया ने घाटे की भरपाई के लिए अपने तीन एयरबस 300 और एक बोइंग 747-300 को 2009 में बेच दिया था। लेकिन उसे अपने कारोबार के लिए लगातार कर्ज लेना पड़ा।

मोदी सरकार ने 2018 में एअर इंडिया की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने और 5.1 अरब डॉलर कर्ज उतारने की कोशिश की थी। लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हुआ। उस वक्त एयर इंडिया के खरीददार नहीं मिलने पर मोदी सरकार ने कहा कि वह इसमें अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने तैयार है, बस खरीददार कर्ज का बोझ भी उठा ले। मूल योजना यह बनाई गई थी जो भी एअर इंडिया को खरीदेगा, उसे इसमें से 23,286.5 करोड़ रुपए का कर्ज का बोझ उठाना होगा। एअर इंडिया पर 31 मार्च 2019 तक कुल 60,074 करोड़ रुपए का कर्ज था। एयर इंडिया के खरीदारों को लुभाने के लिए मोदी सरकार कंपनी पर आधे से अधिक अपने कर्ज माफ ही कर दिए।
भविष्य

इस स्तंभकार को सरकारी हल्कों से छन कर जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक मोदी सरकार एयर इंडिया पर कुल 61 हजार करोड़ रुपये कर्ज का करीब 75 फीसद यानि 45 हजार करोड़ रुपये इसकी परिसंपदा नीलाम या बेच कर चुकाएगी। टाटा सिर्फ करीब 25 फीसद यानि 15 हजार रुपये का कर्ज चुकाएगा ।

एयर इंडिया को खरीदने की टाटा समूह की 18,000 करोड़ रुपये की बोली को मोदी सरकार की मंजूरी मिल जाने के बाद लेटर ऑफ इन्टेन्ट जारी किया जाएगा। डील दिसंबर 2021 तक पूरी कर ली जाएगी।
(चंद्र प्रकाश झा स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं।)

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