कर्नाटक चुनाव 2023: क्या बीजेपी से लिंगायत और जेडीएस से दूर जा रहे हैं वोक्कालिगा?

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नई दिल्ली। कर्नाटक विधानसभा चुनाव होने में अभी वक्त है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में चुनावी बिगुल बजाते हुए अपनी बदली हुई रणनीति का खुलासा कर दिया है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा 25 फरवरी को अपने 40 साल के विधायक करियर के समाप्त होने की घोषणा कर लिंगायतों को यह संदेश देने की कोशिश की कि वह विधानसभा चुनाव से दूर रहेंगे।

येदियुरप्पा का लिंगायत समुदाय पर अच्छा प्रभाव माना जाता है। इस घटना के बाद भाजपा ने सिर्फ लिंगायतों के भरोसे रहने के बाजाए वोक्कालिगा, जैन और दूसरे सामाजिक-धार्मिक समूहों के शीर्ष संतों से मिलकर हर जाति का समर्थन अपने पक्ष में करने का अभियान शुरू कर दिया है। बदली परिस्थितियों में भाजपा का दावा है कि राज्य में सिर्फ लिंगायत और वोक्कालिगा ही नहीं दूसरी जातियां भी चुनावी रूप से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।

कर्नाटक विधानसभा का कार्यकाल 24 मई, 2023 को समाप्त होने वाला है। पिछला विधानसभा चुनाव मई 2018 में हुआ था। चुनाव के बाद, जनता दल (सेक्युलर) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठबंधन ने राज्य सरकार बनाई, जिसमें एच.डी. कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बनाए गए थे। लेकिन जुलाई 2019 में, विधानसभा में कांग्रेस और जेडीएस के कई सदस्यों के इस्तीफे के कारण गठबंधन सरकार गिर गई।

इसके बाद, भाजपा ने राज्य सरकार का गठन किया और बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बनाया गए। 26 जुलाई 2021 को येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और बसवराज बोम्मई ने 28 जुलाई 2021 को नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। दरअसल, येदियुरप्पा की शर्त थी कि मुख्यमंत्री किसी लिंगायत नेता को ही बनाया जाए। इस कड़ी में भाजपा नेतृत्व ने बसवराज बोम्मई को चुना।

अब जब विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने वाला है और 224 सदस्यीय विधानसभा में जीत के लिए भाजपा, कांग्रेस और जेडीएस अपने-अपने समीकरण पर काम करना शुरू कर दिए है। कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत और वोक्कालिगा जाति का वर्चस्व है। लिंगायत भाजपा के साथ तो वोक्कालिगा पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के साथ माना जाता है।

लिंगायत समुदाय कर्नाटक में सबसे बड़ा जाति समूह है। वहीं, वोक्कालिगा राज्य का दूसरा सबसे प्रभावशाली जाति समूह है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई एक लिंगायत हैं। एक आंकड़े के अनुसार राज्य में लिंगायत (14 प्रतिशत) और वोक्कालिगा (11 प्रतिशत), दलित (19.5 प्रतिशत), ओबीसी(16 प्रतिशत) और मुस्लिमों की संख्या (16 प्रतिशत) है।

देश के अन्य राज्यों की तरह ही कर्नाटक की राजनीति में भी जातीय आधार पर ही मतदान होते हैं। सभी राजनीतिक दल जातियों को अपनी तरफ करने की चाल भी चलते हैं। 2013 से 2018 के बीच सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने लिंगायतों के अलग धर्म की मांग का समर्थन किया था। ऐसा इसलिए ताकि इस समुदाय का समर्थन हासिल किया जा सके, जो परंपरागत रूप से बीजेपी का समर्थन करता रहा है।

देवेगौड़ा कैसे बने वोक्कालिगा के सर्वमान्य नेता

कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत के साथ ही वोकालिगा का अहम स्थान है। दोनों जातियां एक दूसरे की प्रतिद्वद्वंदी मानी जाती है। लेकिन 1 जून, 1996 वोक्कालिगा समुदाय के लिए ऐतिहासिक दिन था। जब कर्नाटक की दूसरी सबसे शक्तिशाली जाति वोक्कालिगा समाज के नेता एचडी देवेगौड़ा ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उस दिन, देवेगौड़ा उनके निर्विवाद नेता बन गए जो अभी भी कर्नाटक में वोक्कालिगा वोट बैंक को नियंत्रित करते हैं। यह अलग बात है कि तीन साल बाद उसी जाति ने एक और वोक्कालिगा एसएम कृष्णा को मुख्यमंत्री बनाने के लिए गौड़ा दल को हरा दिया। लेकिन गौड़ा लगभग 30 वर्षों तक उनके शीर्ष नेता बने रहे।

क्या लिंगायत और वोक्कालिगा एक दूसरे के विरोधी हैं?

आजादी के बाद से कर्नाटक की राजनीति में दो जातियों- लिंगायत और वोक्कालिगा का वर्चस्व रहा है। वे आमतौर पर बारी-बारी से राज्य पर शासन करते रहे हैं। लिंगायतों की आबादी पूरे कर्नाटक में है, जबकि वोक्कालिगा (शाब्दिक अर्थ ‘किसान’) पुराने मैसूर क्षेत्र तक केंद्रित जाति है, जिसकी आबादी केवल तीन-चार जिलों में है।

वोक्कालिगा पूरी तरह से किसान जाति से है। मध्यकाल में जन्मे इस समुदाय में केम्पे गौड़ा नामक सरदार को बेंगलुरु के संस्थापकों में माना जाता है। अंग्रेजों के अधीन मैसूर राजाओं के शासन के दौरान, वोक्कालिगा खेती तक ही सीमित थे। साक्षरता का स्तर और समुदाय की राजनीतिक भागीदारी बहुत ही कम थी। 1947 में स्वतंत्रता ने वह सब बदल दिया और वोक्कालिगा कर्नाटक के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में प्रमुख खिलाड़ी बन गए।

कर्नाटक राज्य बनाने में वोक्कालिगा नेताओं का योगदान

मैसूर राज्य में वोक्कालिगा राजनीतिक रूप से बहुत प्रभावशाली थे। लेकिन 1947 और 1956 के बीच मैसूर राज्य का सभी कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मिलाकर बने नए कर्नाटक राज्य में विलय के बाद वोक्कालिगा की स्थिति कमजोर हुई और उन्हें लिंगायतों के राजनीतिक आधिपत्य को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

1950 के दशक की शुरुआत में, कर्नाटक एकीकरण आंदोलन के शीर्ष पर पहुंचने के दौरान, वोक्कालिगा जाति के शीर्ष नेता अपने भविष्य को तय करने के लिए मध्य बेंगलुरु के एक घर में एकत्रित हुए थे। ये सभी कांग्रेसी नेता थे और इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। अधिकांश नेताओं की व्यक्तिगत साख थी। लेकिन उनमें से अधिकांश नेता एक राज्य के तहत सभी कन्नड़-भाषी क्षेत्रों के एकीकरण को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे। उनके पास इसके कई कारण थे।

कुछ नेताओं ने तर्क दिया कि महाराजा का मैसूर या पुराना मैसूर पहले से ही एक अच्छी तरह से विकसित राज्य था और गरीब मुंबई-कर्नाटक और हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्रों को विलय करना राज्य के खजाने और संसाधनों पर बोझ होगा। कुछ को बड़ा डर था। उन्होंने तर्क दिया कि एक बार जब सभी कन्नड़ भाषी क्षेत्र एकजुट हो जाएंगे, तो वोक्कालिगा लिंगायत आधिपत्य के लिए अपना जातिगत प्रभुत्व खो देंगे। राज्य की दो सबसे ताकतवर जातियां तब भी एक-दूसरे से सावधान थीं।

लेकिन पुराने मैसूर राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री केंगल हनुमंथैया राज्य के एकीकरण के पक्ष में थे। एक स्वतंत्रता सेनानी और एक सक्षम प्रशासक, हनुमंथैया वोक्कालिगा के एक बड़े नेता थे। अपने स्वजातीय नेताओं को वीटो करते हुए, हुनुमंथैया ने उनसे कहा कि यदि वे जाति और राजनीतिक कारणों से एकीकरण का विरोध करते हैं तो कन्नड़ों की भावी पीढ़ियां उन्हें कभी माफ नहीं करेंगी।

वोक्कालिगा नेता ने एकीकरण आंदोलन और बंबई प्रेसीडेंसी के कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मिलाकर नए मैसूर राज्य बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी – जिसमें वर्तमान कर्नाटक के कुछ जिले, निजाम का हैदराबाद, कर्नाटक, मद्रास प्रेसीडेंसी और कोडागु का एक स्वतंत्र, छोटा राज्य शामिल है (कूर्ग) का जन्म 1 नवंबर 1956 को हुआ था।

जब के. हनुमंथैया को गंवानी पड़ी मुख्यमंत्री की कुर्सी

अफसोस की बात है कि नया राज्य अस्तित्व में आने बाद केंगल हनुमंथैया ने सत्ता खो दी और एक लिंगायत नेता एस निजलिंगप्पा ने नए मैसूर राज्य के पहले मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। जिसके बाद वोक्कालिगा समुदाय को मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करने के लिए 38 साल तक इंतजार करना पड़ा। 1994 में, एचडी देवेगौड़ा संयुक्त कर्नाटक के पहले वोक्कालिगा मुख्यमंत्री बने।

1956 और 1972 के बीच, चार लिंगायत मुख्यमंत्री (एस निजलिंगप्पा, बीडी जत्ती, एसआर कांथी और वीरेंद्र पाटिल) ने राज्य पर शासन किया। 1972 और 1983 के बीच, एक क्षत्रिय डी देवराज उर्स और एक ब्राह्मण आर गुंडुराव ने लिंगायत समर्थन के बिना राज्य पर शासन किया। 1983 में कर्नाटक के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने रामकृष्ण हेगड़े को ब्राह्मण होने के बावजूद एक बेताज लिंगायत नेता माना जाता था।

हेगड़े के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए, तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने 1989 में एक लिंगायत नेता वीरेंद्र पाटिल को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। उनके नेतृत्व में, कांग्रेस ने 224 सदस्यीय सदन में 181 सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन कांग्रेस ने बाद में दो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नेताओं- एस बंगरप्पा और एम वीरप्पा मोइली को पाटिल का स्थान लेने के लिए चुना और वोक्कालिगा को 1994 तक इंतजार करना पड़ा।

लिंगायत धर्म का जन्म 12वीं शताब्दी में एक जातिविहीन, समतावादी समाज के लिए एक ब्राह्मण बासवन्ना के नेतृत्व में हुए आंदोलन से हुआ था और उनके अनुयायी अगली शताब्दियों में इसे कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के सभी कोनों में ले गए। वे वोक्कालिगा हृदयभूमि पुराने मैसूर भी आए, और कई निचली जातियों और अछूतों ने नए धर्म को अपनाया। लेकिन वोक्कालिगा, जमींदार समुदाय, ज्यादातर इससे दूर रहे, हालांकि दोनों के बीच किसी भी टकराव का कोई रिकॉर्ड नहीं है। सदियों से यह एक सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व था।

1960 के दशक में वोक्कालिगा राजनेताओं के संरक्षण से आदि चूंचनागिरी मठ ने तेजी से विस्तार किया। चुनावों के दौरान, सभी राजनीतिक नेता मठ का समर्थन करने के लिए उसके पास जाते हैं और यह दक्षिणी कर्नाटक की राजनीति और सामाजिक जीवन में एक बड़ी भूमिका निभाता है।

लीक हुए जातिगत जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, कर्नाटक की कुल आबादी में वोक्कालिगा 11% हैं। वे एससी, मुस्लिम और लिंगायत के बाद चौथे नंबर पर हैं। हालांकि, यह डेटा वोक्कालिगा और लिंगायत दोनों द्वारा विवादित है। वोक्कालिगा का दावा है कि उनकी संख्या इससे कहीं ज्यादा यानी 16% है। लिंगायत की तरह, वोक्कालिगा की भी कई उपजातियां हैं और वे आम तौर पर एक-दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं। वोक्कालिगा की चार उप-जातियां गंगातकरा, दासा, मरसु और कुंचितिगा हैं।

वोक्कालिगा लगभग 80 विधानसभा सीटों के चुनाव के नतीजे तय करते हैं, और लगभग 50 विधानसभा क्षेत्रों में उनका दबदबा है। 2018 में, लगभग 42 वोक्कालिगा ने विधानसभा चुनाव जीता था। इनमें से 23 जेडीएस के थे। एक वोक्कालिगा, एचडी कुमारस्वामी 14 महीने के लिए कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री भी बने।

आजादी के बाद कांग्रेस के समर्थक थे लिंगायत और वोक्कालिगा

लिंगायत और वोक्कालिगा दोनों ने आजादी के बाद कांग्रेस के समर्थक थे। लेकिन 1972 के बाद यह बदल गया। तत्कालीन कांग्रेस मुख्यमंत्री डी देवराज अर्स अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति और मुसलमानों के चैंपियन बन गए, जिससे इन दो जातियों के राजनीतिक आधिपत्य को खतरा पैदा हो गया। 1983 में, लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय ने एका बना कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका। 1983 और 1989 के बीच, जनता पार्टी की सरकार मुख्य रूप से लिंगायत-वोक्कालिगा गठबंधन थी। फिर 1994 में कांग्रेस को हराने के लिए ये दोनों जातियां साथ आईं। 1989 में ही दोनों ने कांग्रेस का समर्थन किया था।

अतीत में जब भी उनके राजनीतिक आधिपत्य पर खतरा मंडराता था, इन दोनों जातियों ने अपने मतभेदों को भुला दिया था और एक आम दुश्मन के खिलाफ एक साथ मतदान किया।

एचडी देवेगौड़ा के परिवार में कलह से विरासत पर खतरा

एचडी देवेगौड़ा अब 90 वर्ष के हैं और बीमार हैं। वह अपनी विरासत को बचाने के लिए एक मतभेदग्रस्त परिवार द्वारा चलाए जा रहे जेडीएस का नेतृत्व कर रहे हैं। बीएस येदियुरप्पा के चुनावी राजनीति से हटने के साथ ही लिंगायत समुदाय दूसरे अवसरों की तलाश में है। हालांकि बीजेपी उन्हें साधने की पूरी कोशिश कर रही है, कांग्रेस, जो मुख्य रूप से ओबीसी, एससी और मुस्लिमों की पार्टी है, उम्मीद कर रही है कि लिंगायत और वोक्कालिगा की एक बड़ी संख्या आने वाले विधानसभा चुनावों में उनका समर्थन करेगी।

कर्नाटक कांग्रेस का वोक्कालिगा और लिंगायत पर दांव

केपीसीसी के अध्यक्ष डीके शिवकुमार वोक्कालिगा हैं और चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष एमबी पाटिल लिंगायत हैं। लेकिन ये दोनों जातियां अब भी राज्य के सबसे लोकप्रिय नेता सिद्धारमैया से दूरी बनाकर चलते हैं। उनके (ओबीसी, एससी/एसटी और अल्पसंख्यक) कार्ड ने उन्हें नाराज कर दिया है। जब तक कांग्रेस को प्रत्येक समुदाय (लिंगायत और वोक्कालिगा) के कम से कम 30% वोट नहीं मिलते, तब तक उनके सत्ता में आने की संभावना बहुत कम है। सत्तारूढ़ भाजपा को उम्मीद है कि वोक्कालिगा जेडीएस के साथ रहेंगे और कांग्रेस की हार सुनिश्चित करेंगे।

वोक्कालिगा मठ आदि चंचनागिरी को गोरक्ष पीठ से संबंध

वोक्कालिगा समुदाय के कुछ नेताओं का आरोप है कि हाल के वर्षों में, बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में गोरखनाथ मठ के साथ उनके मठ आदि चंचनागिरी को जोड़कर वोक्कालिगा को अपने पक्ष में करने की चाल चल रही है। चूंकि वोक्कालिगा मठ एक प्राचीन नाथ पंथ मठ है, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले पांच वर्षों में कुछ अवसरों पर इसका दौरा किया है। मठ के वर्तमान महंथ द्रष्टा निर्मलानंद नाथ स्वामी का योगी के साथ अच्छे व्यक्तिगत संबंध हैं और यहां तक कि वह उनके शपथ ग्रहण समारोह में भी शामिल हुए थे। इस तरह का नया मेलजोल जेडीएस और कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

कांग्रेस देवेगौड़ा के किले को तोड़ने की पूरी कोशिश कर रही है। भाजपा, जिसके पास आधा दर्जन महत्वपूर्ण वोक्कालिगा नेता हैं, का तर्क है कि इस समुदाय पर किसी का एकाधिकार नहीं है, और वोक्कालिगा की एक बड़ी संख्या भगवा पार्टी के पास है।

(प्रदीप सिंह जनचौक के पॉलिटिकल एडिटर हैं।)

प्रदीप सिंह https://www.janchowk.com

दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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