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सुप्रीम कोर्ट की कमेटी में शामिल अशोक गुलाटी हैं तीनों कृषि कानूनों के प्रबल समर्थक

‘Ashok Gulati may be Modi’s surprise pick for Agriculture Ministry’
‘Suspend Farm Reforms for 6 Months, Compensate Farmers, but Don’t Repeal Laws’: Ashok Gulati
‘Gulati says increasing the role of the corporate sector in agriculture is essential because the investment the sector needs cannot be provided by the government.’
ये कुछ सुर्खियां हैं, जिनसे यह पूरी तरह स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा कृषि कानूनों पर गठित समिति में पूर्वाग्रहग्रस्त व्यक्ति को शामिल कर दिया गया है, जिसका क्या निष्कर्ष होगा यह पहले से ही मालूम है। नई दुनिया अख़बार में 13 दिसंबर 2020 में अशोक गुलाटी का तीनों कृषि कानूनों के समर्थन में कलम तोड़ लेख प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है। ‘कृषि का कायाकल्प करने वाले कानून’।

लेख में दावा किया गया था कि ये तीनों कानून यदि उचित रूप से लागू हुए तो इनमें भारतीय कृषि और किसानों की कायापलट करने की पूरी क्षमता है। लेख में कहा गया है, ‘कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए मोदी सरकार के कानूनों का किसानों के एक वर्ग द्वारा तीखा विरोध जारी है। इन किसानों के मन में शंका है कि इन कानूनों से उनकी आमदनी खतरे में पड़ सकती है। यह स्थिति तब है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भरोसा दिला चुके हैं कि न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी व्यवस्था समाप्त होने जा रही है और न ही मंडी व्यवस्था। इससे किसानों को आश्वस्त होना चाहिए, लेकिन वे उलटे आक्रोशित हो रहे हैं। कुछ राजनीतिक दल इन किसानों का भ्रम और बढ़ा रहे हैं।

केंद्र ने जो तीन कृषि कानून बनाए हैं, उनकी लंबे अरसे से प्रतीक्षा की जा रही है। जैसे आवश्यक वस्तु अधिनियम की व्यवस्था तब बनाई गई थी, जब हम अपनी आबादी का पेट भरने में ही सक्षम नहीं थे। इसके उलट आज ऐसे अधिशेष की स्थिति है कि भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई के गोदामों में अनाज रखने के लिए पर्याप्त जगह ही नहीं है। ऐसे में भारत को खाद्यान्न के मोर्चे पर अकाल से अधिशेष की स्थिति का लाभ उठाने की दिशा में अग्रसर होना ही होगा। इसी कारण सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन का उचित फैसला किया है।

इसी तरह कृषि उत्पादन एवं विपणन समिति यानी एपीएमसी से जुड़े कानून में संशोधन भी समय की मांग है। आप देश की किसी भी मंडी में जाकर देख सकते हैं कि कैसे पल भर में किसानों की उपज का मनमाने दामों पर सौदा हो जाता है। इससे कमीशन एजेंटों को तो बढ़िया फायदा मिल जाता है, लेकिन किसान अपेक्षित लाभ से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में एपीएमसी कानून में सुधार से किसानों के लिए आवश्यक विकल्पों का बढ़ना तय है और इससे खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। इसी तरह अनुबंध खेती से जुड़े कानून भी किसानों को राहत पहुंचाएंगे।

अमूमन किसान पिछली फसल के दाम देखकर ही अगली फसल की तैयारी करते हैं, लेकिन अनुबंध कृषि के जरिए वे भविष्य की फसल की कम से कम जोखिम के साथ बेहतर योजना बना सकते हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि किसानों को फसल उगाने से अधिक उसे बेचने में कहीं ज्यादा मुश्किल होती है। ये कानून काफी हद तक इस समस्या का समाधान करने में सक्षम हैं। इसी तरह आपूर्ति श्रंख्ला बेहतर होने से उपभोक्ताओं का भी भला होगा। ये तीनों कानून यदि उचित रूप से लागू हुए तो इनमें भारतीय कृषि और किसानों की कायापलट करने की पूरी क्षमता है।

इसके बावजूद इन कानूनों का विरोध समझ से परे है। इस विरोध में एक स्पष्ट रूझान भी दिख रहा है कि यह मुख्य रूप से पंजाब के किसानों द्वारा किया जा रहा है। इसकी पड़ताल करें तो यही पाएंगे कि पंजाब में एफसीआई बड़े पैमाने पर खरीद करता है। ऐसे में वहां के किसानों को लगता है कि मंडी व्यवस्था उनके लिए पूरी तरह उपयुक्त है। फिर आढ़तियों के आर्थिक हित और राज्य सरकार को मिलने वाले करीब 5,000 करोड़ रुपये के राजस्व का भी पहलू है।

ऐसे में आढ़तियों और राज्य सरकार को ये अपने हाथ से फिसलता दिख रहा है। उनकी ये चिंताएं कुछ हद तक वाजिब भी हैं। ऐसे में उन्हें कुछ वर्षों के लिए इसकी क्षतिपूर्ति दी जा सकती है। या फिर निजी क्षेत्र के लिए खरीद की एक सीमा निर्धारित की जा सकती है। इस गतिरोध का सार्थक संवाद या ऐसे ही किसी मध्यमार्ग के जरिये हल निकाला जा सकता है, मगर इस पर पेंच फंसा कर कुछ हासिल नहीं होने वाला। साथ ही पंजाब के किसानों को अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए गेहूं और धान जैसे विकल्पों से इतर भी देखना होगा।

प्रदर्शनकारी किसान जिस एमएसपी को लेकर अड़े हैं, वह व्यवस्था भी 1965 के दौर में तब की गई थी, जब देश खाद्यान्न के मोर्चे पर खस्ताहाल था। आज स्थिति ऐसी है कि उत्पादित खाद्यान्न के भंडारण के लिए पर्याप्त स्थान का अभाव है। स्पष्ट है कि हम अतीत की नीतियों के जरिये नहीं चल सकते। ये कृषि सुधार इन्ही गड़बड़ियों को सुधारने के लिए किए गए हैं। कृषि क्षेत्र की भलाई के लिए निजी निवेश आवश्यक होगा। बाजार की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। कृषि सुधारों का विरोध करने वालों को यह भी समझना होगा कि मौजूदा व्यवस्था को रातों-रात नहीं बदला जा सकता। इस संक्रमण अवधि में वे निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों से मुकाबला करने के लिए अपनी क्षमताएं बेहतर कर सकते हैं। इससे होने वाली प्रतिस्पर्धा का लाभ उत्पादक और उपभोक्ता दोनों को मिलेगा।’

अशोक गुलाटी ने लेख में कहा है कि वास्तव में कृषि क्षेत्र में ऐसे सुधारों की प्रतीक्षा तो लंबे समय से की जा रही थी, लेकिन मसला संवेदनशील होने के कारण कोई सरकार इन्हें आगे नहीं बढ़ा पाई। प्रधानमंत्री मोदी ने साहसिक फैसले लेने की अपनी विशिष्ट शैली में इन सुधारों पर कदम बढ़ाए हैं। उनकी सरकार पर जल्दबाजी में ये कानून बनाने का आरोप भी सही नहीं है, क्योंकि इन सुधारों पर विमर्श की शुरुआत वर्ष 2003 में वाजपेयी सरकार के समय से ही शुरू हो गई थी।

कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग की सरकार में भी इन पर यदाकदा चर्चा होती रही। यहां तक कि वर्ष 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में इन मांगों का उल्लेख भी किया था और अब वह इसका विरोध कर रही है। मोदी सरकार ने अभी तक दृढ़ता से इन सुधारों का समर्थन किया है। उसे किसानों द्वारा बनाए जा रहे दबाव के आगे नहीं झुकना चाहिए। यदि मोदी ऐसे किसी दबाव के चलते कृषि सुधारों पर कदम पीछे खींचते हैं, तो भविष्य में किसी भी सरकार के लिए इन सुधारों पर कदम आगे बढ़ा पाना असंभव नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on January 12, 2021 4:39 pm

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