ग्राउंड रिपोर्ट: मुफलिसी की जमीन पर खड़े होकर रामबाबू ने छीन लिया एशियाई खेलों के आसमान से तमगा

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सोनभद्र। चार राज्यों झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमाओं से लगे उत्तर प्रदेश के अंतिम जनपद सोनभद्र का बहुअरा गांव इन दिनों सुर्खियों में है। इस गांव के एक साधारण से युवा रामबाबू की चर्चा पूरे देश में हो रही है। रामबाबू ने गरीबी, मुफलिसी और बेरोजगारी को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए अंतरराष्ट्रीय फलक पर अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ते हुए उन लोगों के लिए नजीर बन कर उभरे हैं जो चुनौतियों से घबरा कर बैठ जाते हैं।

जी हां! हम बात कर रहे हैं उस रामबाबू की जिसने संघर्षो के बीच न केवल जीना सीखा है, बल्कि कामयाबी हासिल करने के लिए वेटर से लेकर मनरेगा मजदूर तक का काम कर आगे की राह बनाना सीखा। चीन के हांगझू शहर में आयोजित 19वें एशियन गेम्स में 35 किमी पैदल स्पर्धा में कांस्य पदक हासिल करने वाले रामबाबू इसी सोनभद्र के बहुअरा गांव की माटी के लाल हैं।

गरीबी में पले-बढ़े रामबाबू का जीवन अभावों से भरा रहा है। गांव के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर नवोदय विद्यालय से इंटर तक की शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात रामबाबू ने अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर छाने के लिए हर उस चुनौती का सामना किया है जो उसकी राह में रोड़ा बने हुए थे। चाहे वह परिवार की आर्थिक विपन्नता से जुड़ा मसला रहा हो या सामाजिक ताने-बाने का- रामबाबू ने डटकर इनका सामना किया और लक्ष्य को पाने की ओर लगे रहे।

बहुअरा गांव से सटे गांव हिनौता के पूर्व प्रधान एवं पंचायती राज ग्राम प्रधान संगठन के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष गोपीनाथ गिरि हर्ष व्यक्त करते हुए कहते हैं कि “असुविधाओं और अभावों के बीच से निकल कर कामयाबी के शिखर को छूने वाले रामबाबू की इस उपलब्धि से निश्चित तौर पर जनपद को एक नया सितारा मिला है जिसकी कामयाबी पर हम सभी को हर्ष ही नहीं गर्व भी है।”

अभावों से भरा पारिवारिक जीवन

सोनभद्र के बहुअरा गांव के भैरवा गांधी टोला में रामबाबू के पिता छोटेलाल और मां मीना देवी रहते हैं। दो बड़ी बहनों किरन और पूजा की शादी हो चुकी है, जबकि छोटी बहन सुमन प्रयागराज में रहकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है। खुद रामबाबू घर के एकलौते बेटे हैं। मेहनतकश आदिवासी परिवार में जन्मे रामबाबू का जीवन भले ही अभावों के बीच गुजरा है, लेकिन शुरू से ही मेहनत के कामों में लगे होने के साथ वह नित्य दौड़ की आदत को अपनी दिनचर्या में शामिल किए हुए थे।

रामबाबू को शुरू से ही धावक बनने का शौक रहा है। सुबह शाम गांव की पगडंडियों, खाली पड़े खेत-खलिहानों में दौड़ लगाने के साथ-साथ वह मेहनत के कामों से जी नहीं चुराया करते थे। प्राथमिक शिक्षा व नवोदय विद्यालय से इंटर तक की परीक्षा पास करने के बाद परिवार की आर्थिक विपन्नता को देख रामबाबू को मेहनत मजदूरी भी करनी पड़ी। बेटे की कामयाबी में मां मीना का हमेशा सहयोग रहा। वह रामबाबू के खान-पान का हमेशा ध्यान रखती रहीं।

अति पिछड़े गांव से निकलकर राष्ट्रीय फलक पर छा गए रामबाबू साल 2022 में गुजरात में संपन्न हुए राष्ट्रीय पैदल चाल स्पर्धा में एक नए रिकॉर्ड के साथ-साथ स्वर्ण पदक हासिल करने में कामयाब हुए थे। इस 35 किमी की दूरी की प्रतियोगिता को उन्होंने महज 2 घंटे 36 मिनट और 34 सेकंड में पूरी कर अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ दिए थे। बस फिर क्या था यहीं से उनकी कामयाबी के सफर को मुकाम मिलना शुरू हो गया।

बताते चलें कि इसके पहले यह रिकॉर्ड हरियाणा राज्य के मोहम्मद जुनेद के नाम था। राष्ट्रीय खेल स्पर्धा में जुनेद को हराकर ही सोनभद्र के रामबाबू ने स्वर्ण पदक जीता था। इसके बाद 15 फरवरी 2023 को रामबाबू ने झारखंड राज्य की राजधानी रांची में आयोजित राष्ट्रीय पैदल चाल गेम्स में अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए दो घंटे 30 मिनट 36 सेकंड का एक नया रिकॉर्ड कायम किया। इसके बाद 25 मार्च को स्लोवाकिया में 2 घंटे 29 मिनट 56 सेकंड में यही दूरी तय करते हुए रामबाबू ने अपने नाम एक और रिकॉर्ड स्थापित किया।

अभावों के बीच जीवन गुजारते आए रामबाबू के घर-परिवार की ओर से सभी ने मुंह फेर लिए थे। परिजन उन सभी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हो कर रह गए थे जिनकी उनको नित्य जरूरत होती थी। पीने का पानी लाने के लिए एक किमी दूर जाना पड़ता था, तब जाकर प्यास बुझती थी। आवास के नाम पर खपरैल और झोपड़ी वाला मकान गर्मी, बरसात और जाड़े के थपेड़ों को सह पाने में लाचार नज़र आता है, बावजूद इसके सामने कोई विकल्प नहीं था, सो उसी में गाय के साथ जीवन कटता आ रहा है।

डीएम ने दिया था परिवार को जमीन देने का आदेश

वह तो भला हो सोनभद्र के जिलाधिकारी चंद्र विजय सिंह का, जिन्होंने राष्ट्रीय खेलों में स्वर्ण पदक हासिल करने के बाद मीडिया में चर्चा में आए रामबाबू के घर पहुंचकर जब पारिवारिक स्थिति को देखा, तो उन्होंने पानी की समस्या को हल करने के लिए तत्काल हैंडपंप लगवाने का निर्देश दिया। जिलाधिकारी के निर्देश का असर ही कहा जाएगा कि रामबाबू के परिवार को पानी की समस्या से निजात मिल गई है। जिलाधिकारी चंद्र विजय सिंह ने खेती के लिए परिवार को 10 बिस्वा जमीन का पट्टा करने के साथ आवास के लिए अलग से एक बिस्वा जमीन उपलब्ध कराने के भी आदेश दिए थे।

डीएम के आदेश का लेखपाल और ग्राम प्रधान ने बनाया मखौल

जिलाधिकारी ने रामबाबू के परिवार को आवास और खेती-किसानी के लिए जमीन जरूर आवंटित की, लेकिन यह जमीन रामबाबू के परिवार के लिए अन-उपयोगी है। जो जमीन उन्हें मिली है वह डूब क्षेत्र में है। जो 10 बिस्वा जमीन परिवार को दी गई है, वह तीन किमी दूर चंद्रप्रभा नदी के किनारे है तथा बहुअरा बंगाल में एक बिस्सा जमीन आवास के लिए मिली है।

दरअसल लेखपाल और प्रधान ने मनमानी करते हुए आवंटित जमीन की जगह दूसरी जगह नाप दी, जहां से 11 हजार पावर की लाइन गुजरी है, जबकि बगल में ही ग्राम समाज की जमीन खाली पड़ी हुई है। रामबाबू के परिवार को जमीन न देकर जिलाधिकारी के आदेश को भी एक तरह से दरकिनार करते हुए मनमानी की गई है। जबकि तत्कालीन जिलाधिकारी ने स्पष्ट कहा था कि रामबाबू के परिवार की सुगमता को देखते हुए इन्हें जमीन का पट्टा कर आवश्यक जीवन उपयोगी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं।

दबंगों के खौफ से सहमा रहता है परिवार

रामबाबू के परिवार को 1998 में जो आवास मिला था वह अब जर्जर हो चुका है। परिजन बताते हैं कि ‘हम लोग यहां 35 सालों से रहते आ रहे हैं। गांव के ही लालब्रत मौर्या को दस बिस्सा का पैसा आज से 25 साल पहले दिया था, बावजूद इसके वह न जमीन दे रहे हैं न पैसा वापस कर रहे हैं। यही नहीं रंजिशवश क्षति पहुंचाते आ रहे हैं। कच्चे घर का खपरैल आदि भी तोड़ देते हैं’। आरोप है कि बार बार शिकायत और फरियाद लगाने के बाद भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। जिससे जाड़ा, गर्मी, बरसात के थपेड़ों को सहते हुए जंगली जीव जंतुओं के भय के बीच परिवार को रहने के लिए विवश होना पड़ रहा है।

रामबाबू के घर तक सड़क, खड़ंजा, नाली का अभाव बना हुआ है। हल्की बारिश में भी जल-जमाव के साथ कीचड़ में चलना दूभर हो जाता है। नाली न होने से खुले में पानी बहाना पड़ता है। जबकि लिंक मार्ग से रामबाबू का घर लगा हुआ है। पचास मीटर तक खड़ंजा बिछा दिया जाए तो कीचड़ से राहत मिल जाए, लेकिन इसके लिए न तो प्रधान ने पहल की और ना ही अन्य किसी जनप्रतिनिधि ने।

गांव के निवासी सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र पटेल और ग्रामीण पवन मिश्रा कहते हैं कि “अभावों को दरकिनार कर रामबाबू ने जो कामयाबी हासिल की है वह काबिले तारीफ है। हम सभी को रामबाबू पर फक्र है।” महेंद्र पटेल रामबाबू की पारिवारिक स्थिति पर बोलते हुए कहते हैं कि “शासन प्रशासन को इनकी माली हालत की ओर ध्यान देना होगा ताकि यह अभी तक जिन बुनियादी सुविधाओं से वंचित होते आए हैं वह इन्हें मुहैय्या कराई जा सकें।”

पूर्व विधायक परमेश्वर दयाल रामबाबू की सफलता पर हर्षित होते हुए ‘जनचौक’ से कहते हैं कि “रामबाबू इस जिले के अभावों में पले-बढ़े युवाओं के लिए आइकन बन कर उभरे हैं, जिनकी सफलता और अभावों भरी जिंदगी से प्रेरित होकर बुलंद लक्ष्य और कामयाबी को हासिल किया जा सकता है।” वो कहते हैं कि “भारत गांवों का देश है जहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है। आवश्यकता है उन्हें प्रोत्साहित करने की, ताकि ग्रामीण प्रतिभाएं आगे बढ़कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने देश, गांव, समाज और परिवार का नाम रोशन कर सकें।”

वेटर से लेकर मनरेगा मजदूर तक का सफर

देश में कोरोना लॉकडाउन के दौरान जब समूचा श्रमिक वर्ग परेशान था, उस दौर में भी रामबाबू ने साहस नहीं छोड़ा। रामबाबू भोपाल में खेल की प्रैक्टिस कर रहे थे, लेकिन लॉकडाउन के चलते गांव लौटना पड़ा। इस दौरान वो माता-पिता के साथ मनरेगा में मजदूरी करते थे। इसके पहले वो वाराणसी के एक होटल में वेटर का भी काम कर चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक हासिल करने के बाद शनिवार को अपने गांव लौटे रामबाबू के चेहरे पर लंबी यात्रा की थकान के बावजूद प्रसन्नता और कामयाबी के भाव झलक रहे थे। नींद से उठकर दरवाजे पर आए लोगों से हाथ जोड़कर मिलते रामबाबू सभी का आशीर्वाद लेते रहे।

इस दरमियान वो “जनचौक” से कहते हैं कि “चुनौतियों से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए।” अपनी कामयाबी का सारा श्रेय अपने माता-पिता को देते हुए वह कहते हैं कि “यदि माता-पिता का साथ ना होता, उनका हौसला मेरे साथ ना होता तो शायद मैं आज इस कामयाबी के शिखर को छू नहीं पाता।”

अब ओलंपिक में भारत का झंडा गाड़ना लक्ष्य

चीन में सम्पन्न हुए पैदल स्पर्धा में कांस्य पदक हासिल कर ग्रामीण प्रतिभाओं के लिए नजीर बने रामबाबू भारतीय सेना में हवलदार हैं (आरटीई सेंटर हैदराबाद)। भारतीय सेना में बतौर हवलदार वह 25 नवंबर 2022 को भर्ती हुए थे। वो बैंगलोर में रह कर खेल की प्रैक्टिस करते हैं। इनका अगला लक्ष्य पेरिस ओलंपिक गेम्स 2024 में कामयाबी हासिल करना है। इसके पहले अप्रैल 2024 में तुर्की जाकर कंपटीशन में भाग लेना है।

ज़श्न के बीच उठते प्रश्न

6 अक्टूबर की सुबह हवाई मार्ग के जरिए चीन से चलकर दिल्ली फिर दूसरे दिन 7 अक्टूबर की सुबह दिल्ली एयरपोर्ट से वाराणसी पहुंचे रामबाबू सड़क मार्ग से जैसे ही अपने घर पहुंचे, माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बड़ी संख्या में ग्रामीण और रामबाबू के इष्ट मित्रों ने फूल मालाओं से लादकर उनका स्वागत किया। हर कोई चीन में वह कैसे रहे? कैसे प्रतियोगिता संपन्न हुई? जानने की जिज्ञासा के साथ उनके साथ चिपक रहे थे।

इन सब के बीच ग्रामीणों में इस बात का आक्रोश भी रहा कि गांव के जिस लाल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम सुनहरे अक्षरों में अंकित किया उसके स्वागत में सत्ताधारी दल का कोई भी जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर उपस्थित नहीं हुआ। पूर्व विधायक परमेश्वर दयाल को छोड़ दिया जाए तो दोपहर के 2 बजे तक “जनचौक” ने रामबाबू के गांव में रहकर इसका अवलोकन किया कि कोई भी जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी नजर नहीं आया।

फौरी तौर पर घोरावल विधानसभा के विधायक अनिल मौर्य खुद गांव आने के बजाए वाराणसी एयरपोर्ट पर रामबाबू को रिसीव कर अपने वाहन से रामबाबू को गांव तक भिजवा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। इससे भी घोर आश्चर्य की बात तो यह है कि गांव के प्रधान ने तो झांकना भी गंवारा नहीं समझा।

(सोनभद्र के बहुअरा से संतोष देव गिरी की रिपोर्ट)

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