Sunday, March 3, 2024

नरेंद्र मोदी पर बनी बीबीसी डाक्यूमेंट्री को ऑस्ट्रेलिया में कैनबरा की संसद में दिखाया जायेगा  

जी-7 की बैठक में भारत को विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में जापान बुलाया गया था। इस यात्रा के बाद आज प्रधानमंत्री पापुआ न्यू गिनी की यात्रा पर हैं। इसके बाद कल वे अपनी यात्रा के तीसरे चरण के दौरान ऑस्ट्रेलिया की तीन दिवसीय यात्रा पर होंगे। हालांकि ऑस्ट्रेलिया की यह यात्रा विशेष रूप से क्वैड ग्रुप की बैठक के लिए तय की गई थी। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) में कर्ज-सीमा का संकट इस स्तर तक पहुंच गया है कि राष्ट्रपति बाईडेन के लिए बैठक में आ पाना संभव नहीं रहा। 

प्रधानमंत्री मोदी इन तीन दिनों की यात्रा में सिडनी में ही रहने वाले हैं। मोदी इस दौरान ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बनीज से मुलाक़ात करेंगे। इसके साथ वे ऑस्ट्रेलियन सीईओ और प्रमुख व्यवसाइयों से मुलाक़ात करेंगे। अगले दिन सिडनी में भारतीय प्रवासी समुदाय के साथ एक विशाल आयोजन है। लेकिन यह भी सुनने में आ रहा है कि ठीक इसी स्थान पर अगले दिन प्रवासी भारतीय संगठनों के एक समूह के द्वारा बेहद चर्चित एवं विवादास्पद बीबीसी डाक्यूमेंट्री फिल्म की स्क्रीनिंग की जा रही है। इस समूह का प्रयास है कि इसके माध्यम से मोदी शासनकाल के दौरान भारत के बुनियादी संवैधानिक सिद्धांतों से परे होते जाने की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित किया जा सके। 

ऑस्ट्रेलिया में भारतीय प्रवासियों के बीच में विचारों की विविधता का नमूना इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सिडनी यात्रा के दौरान देखने को मिलने जा रहा है, जहां मंगलवार के दिन एक मेगा सामुदायिक कार्यक्रम के पश्चात अगले ही दिन शाम को बीबीसी डाक्यूमेंट्री इंडिया: द मोदी क्वेश्चन की स्क्रीनिंग का कार्यक्रम तय है। 

भारतीय मूल के प्रवासी संगठनों के द्वारा बीबीसी डाक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग का प्रबंध किया जा रहा है। उनकी यह कोशिश भारत में मोदी शासनकाल के दौरान संविधान के बुनियादी सिद्धांतों से लगातार पीछे हटने की ओर दुनिया का ध्यान खींचना है। यह आयोजन ऑस्ट्रेलिया की कैनबरा के संसद सदन में किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया में संसद भवन के विभिन्न हिस्सों को किराये पर मुहैया कराया जाता है। चूंकि यह स्क्रीनिंग भारतीय प्रवासी समूहों के द्वारा एक नितांत निजी प्रयास है, जिसका आयोजन अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन, एमनेस्टी इंटरनेशनल के साथ किया जा रहा है। एमनेस्टी के अलावा स्क्रीनिंग में शामिल संगठनों में हिन्दूज फॉर ह्यूमन राइट्स ऑस्ट्रेलिया एंड न्यूजीलैंड, मुस्लिम कलेक्टिव सहित पेरियार-आंबेडकर थॉट सर्किल, द ह्यूमनिज्म प्रोजेक्ट और सेंटर फॉर कल्चर-सेंटर एप्रोच टू रिसर्च एंड इवैल्यूएशन शामिल हैं। 

ऑस्ट्रेलिया की अपनी तीन दिवसीय यात्रा के दौरान मोदी सिडनी में ही रहने वाले हैं। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बनीज के साथ अपनी द्विपक्षीय वार्ता के साथ वे अल्बनीज के साथ एक विशाल सामुदायिक आयोजन में शामिल होंगे। अगली शाम जिस दौरान बीबीसी डाक्यूमेंट्री दिखाई जा रही होगी, पूरी संभावना है कि मोदी ऑस्ट्रेलिया से रवाना हो चुके होंगे। 

दो हिस्सों में बनी बीबीसी की यह डाक्यूमेंट्री गुजरात में उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान 2002 में हुए नरसंहार में मोदी की भूमिका का परीक्षण करती है। दूसरा हिस्सा उनके 2014 में पीएम के पदभार ग्रहण के बाद भारत में लोकतंत्र के क्षरण को रेखांकित करता है। स्क्रीनिंग के बाद इस पर चर्चा का सत्र रखा गया है, और मुख्य चर्चा गुजरात दंगों पर केंद्रित रहेगी। इसके साथ ही 2014 के बाद के भारत पर भी चर्चा की जायेगी। उल्लेखनीय रूप से वक्ताओं में जेल में बंद गुजरात पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट की बेटी आकाशी भट्ट भी होंगी, जो मुखर रूप से मोदी के खिलाफ बोल रही हैं। आकाशी भट्ट के अलावा एमनेस्टी इंटरनेशनल के पूर्व भारतीय प्रमुख आकार पटेल भी होंगे। 

यही नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया के दो सांसद डेविड शूब्रिज और जॉर्डन स्टील (ऑस्ट्रेलियन ग्रींस पार्टी) भी स्क्रीनिंग और बातचीत का हिस्सा होंगे। इन सांसदों के साथ उप-नेता मेहरीन फारुखी के द्वारा पीएम अल्बनीज को एक पत्र लिख अनुरोध किया है कि वे “ मानवाधिकार हनन की लगातार जारी घटनाओं को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के सामने हमारी चिंताओं को रखें, जिसके चलते विभिन्न अल्पसंख्यक समूहों का उत्पीड़न जारी है।’

विभिन्न देशों में मौजूद भारतीय प्रवासियों की अच्छी-खासी तादाद कई पश्चिमी राजनीतिज्ञों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। उक्त पत्र में समुदाय के भीतर मौजूद डर एवं आशंकाओं के उदाहरण दिए गये हैं। 

पत्र में कहा गया है, “व्यापक भारतीय प्रवासियों के बीच में से अनेकों लोगों से हमने सुन रखा है। इसमें पंजाबी, कश्मीरी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, मुस्लिम एवं सिख समुदाय के लोग शामिल हैं, जो भारत में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को लेकर बेहद चिंतित हैं। मौजूदा भारतीय लोकतंत्र की जो स्थिति है, उसमें उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और देश के भीतर विरोध के हक और आंदोलन करने की आजादी को लेकर सवाल बने हुए हैं।”

( रविंद्र पटवाल जनचौक की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

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