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Monday, September 27, 2021

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बंटवारा भाजपा का सबसे प्रिय शब्द है, अब बंगाल को विभाजित करने की तैयारी!

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कहां तो तय था कि बंगाल में भाजपा की सरकार बनेगी। कैबिनेट की पहली बैठक में सीएए लागू करने का प्रस्ताव पास करेंगे। पर बंगाल के लोगों ने नकार दिया। अब भाजपा के नेताओं को आधा बंगाल चाहिए, इसलिए बंगाल के विभाजन की बात करने लगे हैं।

विधानसभा चुनाव में पराजय के झटके से उबरने के बाद सांसद और अब केंद्र में राज्यमंत्री जॉन  बारला उत्तर बंगाल राज्य की बात करने लगे थे। इसके जवाब में भाजपा के प्रदेश नेता सफाई देते हुए कहते थे कि यह जान बारला की निजी राय है और भाजपा ने इस बाबत कोई नीतिगत फैसला नहीं लिया है। भाजपा के एक और सांसद एवं अब केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय में राज्यमंत्री निशीत प्रमाणिक भी जंगल महल सहित कई जिलों को मिलाकर एक अलग राज्य बनाने की बात कहने लगे हैं। यह भी कहते हैं कि अगर अलग राज्य नहीं तो केंद्र शासित प्रदेश ही बना दिया जाए। इस बात का संतोष रहेगा कि चलो हम नहीं तो क्या हुआ, हमारे आका तो हैं।

अभी तक तो बात इन दोनों नेताओं और कुछ विधायकों तक सीमित थी, पर अब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष उत्तर बंगाल राज्य बनाने के पक्ष में मुखर हो गए हैं। उन्होंने इसे कुछ इस तरह पेश किया है जैसे उत्तर बंगाल की पूरी आबादी ही उत्तर बंगाल राज्य बनाए जाने के पक्ष में सड़क पर उतर आई हो। कहते हैं कि लोगों की मांग को रखना क्या अलगाववाद है। फिर दलील देते हैं कि उत्तर बंगाल में पूरे 75 सालों में कोई विकास हुआ ही नहीं। इलाज के लिए लोगों को कोलकाता और रोजगार के लिए दूसरे राज्य में जाना पड़ता है। पर हैरानी की बात तो यह है कि उत्तर बंगाल के किसी भी जिले में अलग राज्य बनाए जाने की मांग को लेकर अभी तक लोगों ने एक जुलूस भी नहीं निकाला है।

दूसरी तरफ प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राहुल सिन्हा अलग उत्तर बंगाल राज्य बनाए जाने का तीखा विरोध करते हुए रविंद्र नाथ टैगोर का हवाला देते हैं। अंग्रेजों की सरकार के बंगाल विभाजन का फैसले का विरोध करते हुए रविंद्र नाथ टैगोर ने राखी दिवस मनाने की अपील की थी। राहुल सिन्हा कहते हैं कि जो बंगाल की भौगोलिक सीमा को बदलना चाहते हैं वे रविंद्र नाथ टैगोर के आदर्श और सपनों का अपमान कर रहे हैं। दरअसल वे बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और इतिहास को मिटाना चाहते हैं। इसके साथ ही अपील करते हैं कि इसका एकजुट होकर विरोध किया जाना चाहिए।

सच तो यह है कि दक्षिण बंगाल में भाजपा का पैर जम ही नहीं पाया,  पिछला विधानसभा चुनाव हो या 2019 का लोकसभा चुनाव, भाजपा का खाता कमोबेश खाली ही रह गया था। भाजपा के 19 सांसदों और 77 विधायकों (अब 72) में से अधिकांश उत्तर बंगाल के ही हैं। विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा में जो आए थे उनकी वापसी तृणमूल में होने लगी है। कमोबेश सभी ग्राम पंचायतें हाथ से निकल चुकी हैं। इसलिए भाजपा अपनी उत्तर बंगाल की राजनीतिक जमीन का इस्तेमाल अलग राज्य के आंदोलन के लिए करना चाहती है। अभी तक तो भाजपा के प्रदेश स्तर के नेता बंगाल के लोगों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए अलग राज्य से अपने को दूर रखे हुए थे।

अब भाजपा के नेता इस कदर मायूस हो गए हैं कि उन्हें उत्तर बंगाल राज्य में ही अपना सपना सच होता दिख रहा है। पर मुश्किल तो यह है कि भाजपा के नेता उत्तर बंगाल राज्य की मांग के साथ आम लोगों को जोड़ नहीं पाए हैं। दरअसल विभाजन ही भाजपा का राजनीतिक हथियार है जाति हो या धर्म हर जगह इसी का इस्तेमाल किया जाता है। बतौर मिसाल केंद्र सरकार ने सात साल बाद पहली बार गोरखालैंड के मुद्दे पर सितंबर में त्रिपक्षीय बैठक बुलाई है दार्जिलिंग से भाजपा सांसद राजू बिष्ट ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी इसके बाद ही त्रिपक्षीय बैठक बुलाए जाने का फैसला लिया गया। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र का स्थाई राजनीतिक समाधान करने के लिए  बैठक बुलाई है, तो क्या गोरखालैंड राज्य बनाए जाने का फैसला लेंगे।

लोकसभा के 2019 के चुनाव में भाजपा ने स्थाई समाधान तलाश करने की बात कही थी। इस पर्वतीय क्षेत्र के 11 जातियों को जनजाति का दर्जा देने के लिए यह बैठक बुलाई गई है। दार्जिलिंग में तृणमूल कांग्रेस के कोऑर्डिनेटर एमबी खलास कहते हैं कि केंद्र सरकार लोकसभा में एक बिल पास कर के यह काम कर सकती है। इसके लिए त्रिपक्षीय बैठक की क्या जरूरत है। दरअसल यह और कुछ नहीं शांत पहाड़ को एक बार और अशांत करने की कोशिश है। गोरखालैंड का लॉलीपॉप दिखा कर दार्जिलिंग से भाजपा के नेता संसद का चुनाव जीतेते रहे हैं।

अब इसी लॉलीपॉप का इस्तेमाल उत्तर बंगाल राज्य के लिए कर रहे हैं। उत्तर बंगाल राज्य के पुरोधा जान बारला की जमीनी हकीकत पर गौर करते हैं। अलीपुरद्वार से सांसद चुने गए जॉन बारला के  पास लक्ष्मीपुर स्टेट का एक क्वार्टर था। अब वहां वे कई मंजिली इमारत बना रहे हैं। जॉन बरला के पास उस जमीन पर मालिकाना हक साबित करने का कोई दस्तावेज नहीं है। इसके अलावा वे लोक निर्माण विभाग की जमीन पर एक मार्केटिंग काप्लेक्स बना रहे हैं। इस बाबत उनकी दलील बहुत ही दिलचस्प है कहते हैं कि जब इस जमीन पर झुग्गी झोपड़ी वालों ने कब्जा कर रखा था तब किसी ने आवाज नहीं उठाई थी। जब उन्होंने मार्केटिंग काप्लेक्स बनाना शुरू किया तो विरोध किया जा रहा है। अब कयास लगा लीजिए कि अगर जॉन बारला उत्तर बंगाल राज्य के मुख्यमंत्री बन गए  तो नतीजा क्या होगा।

(जेके सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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