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बॉम्बे हाई कोर्ट ने की अर्नब की अर्जी पर बहस, अंतरिम राहत पर कल फिर सुनवाई

बॉम्बे हाई कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि अगर अर्नब गोस्वामी को अंतरिम आदेश पर रिहा कर दिया जाता है तो क्या महाराष्ट्र पर आसमान टूट पड़ेगा? जस्टिस एसके शिंदे और एमएस कर्णिक की खंडपीठ ने रिपब्लिक टीवी के प्रमुख अर्नब गोस्वामी द्वारा उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ दायर याचिका और 2018 में आत्महत्या के मामले को निरस्त करने की पुनर्विचार याचिका में अंतरिम राहत देने से इंकार कर दिया है। खंडपीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता और राज्य को सुने बिना अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जा सकता। खंडपीठ अब गुरुवार को तीन बजे अपरान्ह इस याचिका पर सुनवाई करेगी।

जिस तरह अर्नब की गिरफ़्तारी के बाद गृह मंत्री अमित शाह, केंद्र सरकार के मंत्री, भाजपा के मुख्यमंत्री और पार्टी कैडर अर्नब के समर्थन में बयानबाजी और प्रदर्शन पर उतर आए हैं, इससे निश्चित ही न्यायपालिका पर भारी दबाव है, वरना मैंने अपने 40 साल की पत्रकारिता, जिसमें विधि पत्रकारिता शामिल है, में ऐसा कभी नहीं देखा कि किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तारी होने के बाद अगले ही दिन हाई कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई की हो, और वो भी तब, जब जमानत की अर्जी मजिस्ट्रेट के सामने लंबित हो। न्यायपालिका इस तरह चीन्ह-चीन्ह कर सुनवाई कर रही है, उससे स्वयं अपनी साख और विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रही है।

खंडपीठ ने अदन्या नाइक द्वारा दायर याचिका पर भी विचार किया और अपने पिता की आत्महत्या मामले की प्राथमिकी के संबंध में दायर ‘ए’ समरी की फिर से जांच करने की मांग की, जिसमें अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार किया गया है। रिपब्लिक टीवी प्रमुख अर्नब गोस्वामी ने भी बॉम्बे हाई कोर्ट के समक्ष एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की है, जिसमें उन्होंने मुंबई पुलिस द्वारा बुधवार को हुई अपनी ‘अवैध गिरफ्तारी’ और ‘गलत तरीके से हिरासत’ को चुनौती दी है।

गोस्वामी के लिए अंतरिम राहत की मांग करते हुए, वरिष्ठ अधिवक्ता आभा पोंडा ने अदालत के समक्ष दलील दी कि जांच पूरी तरह से अवैध है और गोस्वामी को अंतरिम राहत दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मामले को फिर से खोलने के बाद नई जांच शुरू करना आपराधिक कानून के अच्छी तरह से तय सिद्धांतों के विपरीत है। खंडपीठ ने मामले में पक्ष सुने बिना गोस्वामी को अंतरिम राहत देने से इंकार कर दिया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अर्नब गोस्वामी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में नोटिस जारी किया, जिसमें आत्महत्या मामले में गिरफ्तारी को चुनौती दी गई है।

उच्च न्यायालय के समक्ष गोस्वामी के लिए अपील करते हुए, वरिष्ठ अधिवक्ता पोंडा ने कहा कि वह केवल अंतरिम राहत के लिए बल देना चाहते थे, जिसमें 2018 में दर्ज प्राथमिकी की जांच पर रोक शामिल है। खंडपीठ ने जवाब दिया कि जब तक उत्तरदाताओं को नोटिस जारी नहीं किया गया था तब तक वह राहत देने के लिए इच्छुक नहीं था। जब अदालत ने मामले में नोटिस जारी करने के लिए कहा, तो पोंडा ने सात मिनट का समय मांगा, यह दिखाने के लिए कहा कि अंतरिम राहत क्यों दी जानी चाहिए।

उन्होंने दावा किया कि पुलिस ने 2018 के मामले में न्यायिक आदेश के बिना ही जांच शुरू कर दी थी। जब खंडपीठ ने एक बार फिर कहा कि वह दूसरी तरफ का पक्ष सुनना चाहता है, तो पोंडा ने कहा कि इसे कल सुना जा सकता है, लेकिन हर दिन केवल अवैध हिरासत हो रही है। शिकायतकर्ता एक बंद मामले को फिर से शुरू करने की कोशिश कर रहा है। मैंने अलीबाग अदालत में जमानत की अर्जी वापस ले ली, क्योंकि अदालत ने कहा कि हम उचित समय पर सुनवाई करेंगे।

न्यायालय ने कहा कि अन्य वादकारी हैं, मामले लंबित हैं। हम विचारण के लिए तैयार हैं, लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमने नोटिस जारी नहीं किया है, उत्तरदाताओं को जवाब देने का अवसर मिलना चाहिए। इस पर अर्नब के वकील हरीश साल्वे ने तब पोंडा द्वारा दिए गए तर्कों को पूरा करते हुए कहा कि अगर गोस्वामी अंतरिम आदेश पर रिहा हो जाता है, तो क्या महाराष्ट्र पर आसमान टूट पड़ेगा?

पोंडा ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ताओं ने फिर से जांच के लिए कहा है, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया है कि क्लोजर रिपोर्ट को स्थगित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने स्वयं मजिस्ट्रेट बनकर आदेश को संशोधित करने की कोशिश की है, जिसकी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 362 के तहत कार्रवाई की जाती है। इस प्रावधान में कहा गया है कि कोई भी अदालत किसी मामले का निपटारा करने वाले किसी फैसले या अंतिम आदेश में लिपिकीय या अंकगणितीय त्रुटि को सुधारने के अलावा उसमें बदलाव या समीक्षा नहीं कर सकती है।

खंडपीठ ने तब राहत देने से पहले शिकायतकर्ता अक्षता नाइक को सुनने का इरादा व्यक्त किया। खंडपीठ ने याचिका को संशोधित करने और अपनी याचिका में शिकायतकर्ता अक्षता नाइक को शामिल करने के लिए पोंडा को छूट दे दी। खंडपीठ ने अंततः सभी पक्षों को नोटिस जारी किया और उनसे अपनी दलीलों का आदान-प्रदान करने को कहा। मामले की सुनवाई अब कल दोपहर तीन बजे होगी।

खंडपीठ ने कहा कि उत्तरदाता पूर्व सूचना के हकदार हैं। हमें राज्य को नोटिस जारी करना होगा और हम छुट्टियों के बाद किसी अन्य मामले पर सुनवाई करेंगे। इस बिंदु पर, पोंडा ने अदालत से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया, क्योंकि एक नागरिक को अवैध रूपसे हिरासत में लिया गया है। संवैधानिक अदालत को एक नागरिक के बचाव में आना चाहिए, जिसके साथ गलत व्यवहार किया गया है।

हालांकि, जस्टिस शिंदे ने माना कि याचिकाकर्ता के पास अन्य उपाय हैं और वह रिमांड आदेश को चुनौती दे सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे, जो गोस्वामी के लिए भी उपस्थित हुए, उन्होंने अदालत से हस्तक्षेप की अनुमति मांगी और कहा कि प्रश्न में एक नागरिक की स्वतंत्रता शामिल है। उन्होंने कहा कि गोस्वामी एक पत्रकार हैं। कृपया उन्हें अंतरिम राहत उपाय के रूप में जारी करें और बाद में मामले को विस्तार से सुनें। हालांकि जस्टिस शिंदे अंतरिम राहत पारित करने पर सहमत नहीं हुए और कहा कि वह इसके लिए कारण बताएंगे।

मुंबई में इंटीरियर डिजायनर अन्वय नाइक और उनकी मां कुमुद ने मई 2018 में आत्महत्या कर ली थी। सुसाइड नोट में अर्नब समेत तीन लोगों पर आरोप लगाए थे। सुसाइड नोट के मुताबिक अर्नब और दूसरे आरोपियों ने नाइक को अलग-अलग प्रोजेक्ट के लिए डिजायनर रखा था, लेकिन करीब 5.40 करोड़ रुपये का पेमेंट नहीं किया। इससे अन्वय की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई और उन्होंने सुसाइड कर लिया। अन्वय की पत्नी ने कहा कि सुशांत केस में तो सुसाइड नोट भी नहीं था, लेकिन मेरे पति के केस में है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 5, 2020 7:43 pm

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