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नागरिकों की भावनाओं को कुचलते हुए लुकाशेन्को ने फिर कर लिया बेलारूस की सत्ता पर कब्जा

रविवार को हुए राष्ट्रपति के चुनाव परिणाम को लेकर सोमवार को सरकारी माध्यम जैसे कयास लगाये जा रहे थे, वो उसी के अनुरूप आए हैं। लुकाशेन्को को एक बार फिर से 80% मतों के साथ भारी बहुमत के साथ विजेता घोषित किया गया है। चुनावी मतपेटियों की जाँच से लेकर किसी भी चुनावी पर्यवेक्षक की अनुपस्थिति के चलते चुनाव परिणामों को कैसे अपने पक्ष में तय किया जा सकता है, यह बेलारूस की जनता को सहज अनुमान है।

वहीं इस निरंकुश राष्ट्रपति के खिलाफ हाल ही में अपने पति की गिरफ्तारी के बाद चुनावी महा समर में उतरी 37 वर्षीया पूर्व अध्यापिका स्वेतलाना तिखानोव्स्काया ने इस चुनाव परिणाम को यह कहकर स्वीकार करने से इंकार कर दिया है कि “इस चुनाव में मैं खुद को विजेता समझती हूं।”

और आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं। पिछले हफ्ते मिंस्क में जिस प्रकार से 60,000 से अधिक लोगों का जन समुद्र श्वेतलाना के समर्थन में उमड़ा था, उसे देखते हुए बताया जा रहा था कि कई दशकों से ऐसी एक भी रैली देखने को नहीं मिली है। लेकिन इसके बाद से ही विपक्षी नेताओं की धरपकड़ से लेकर राष्ट्रपति की तिकड़मबाजियों से इस बात के आभास फिर से हो रहे थे, कि जनता को दिए गए एकमात्र अधिकार वोटरशिप को एक बार फिर से मुंह की खानी पड़ सकती है। लेकिन यह पहली बार होने जा रहा है कि बेलारूस की आम जनता अपने तानाशाह हुक्मरान के खिलाफ खुलकर सड़कों पर आये हैं और यह विरोध-प्रदर्शन धोखाधड़ी के बावजूद रुकने नहीं जा रहा है।

इस बीच, चुनाव से एक दिन पूर्व ही बेलारूस से हिंसा आगजनी की खबरें और व्यापक पुलिस लाठीचार्ज और विपक्षी पार्टियों के नेताओं कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की खबरें सुनने में आ रही थीं। श्वेतलाना ने भी शनिवार से अपने ठिकाने को बदल लिया था और अभी उनके नए ठिकाने का नहीं पता है। ये विरोध-प्रदर्शन कई अन्य बेलारूसी शहरों में देखने को मिले हैं। राजधानी में कई मेट्रो स्टेशनों को बंद रखा गया है और अभी भी अधिकतर जगहों पर इन्टरनेट सेवाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं।

इसे तब लागू किया गया जब सरकारी एजेंसी की ओर से इस बात की घोषणा की गई कि इसने मिस श्वेतलाना की हत्या की कोशिशों को सफल नहीं होने दिया है, लेकिन इसके आगे कोई भी विवरण देना जरूरी नहीं समझा है।

95 लाख की आबादी वाले बेलारूस में कोरोनावायरस के 70,000 मामले अब तक प्रकाश में आ चुके हैं, और 600 लोगों की मौत हो चुकी है।

लिथुआनिया के विदेश मंत्री लिनस लिंकेविसिउस के ट्वीट के अनुसार वे “कई घंटों से स्वेतलाना तिखानोव्स्काया की खैर खबर की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके बारे में उनके स्टाफ तक को खबर नहीं है। वे उनकी सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हैं।”

रविवार के दिन बेलारूस के कई शहरों में इस तरह के दृश्य आम देखने को मिले हैं, एक व्यक्ति की मौत और 50 लोगों के घायल होने और 3000 लोगों की गिरफ्तारी की खबर है, जिसमें एक पत्रकार भी शामिल है।

अंतिम चुनावी नतीजों में लुकाशेन्को को 80.23% वोट और स्वेतलाना को 9.9% वोट मिलने की बात घोषित की गई है। राष्ट्रपति ने विपक्ष को मिल रहे समर्थन को “भेड़” कहा था, जिन्हें विदेशों से नियंत्रित किया जा रहा है, और उन्होंने कसम खाई थी कि वे देश को टुकड़े-टुकड़े नहीं होने देंगे।

बेलारूस होने का ऐतिहासिक महत्व:

भूराजनीतिक तौर पर बेलारूस का स्थान बेहद अहम है। रूस के पश्चिम में स्थित यह देश जितना महत्वपूर्ण रूस की सामरिक सुरक्षा के लिहाज से है, वह शायद ही कोई और जगह हो। सोवियत विघटन के बाद से ही 1994 से सत्ता पर काबिज इस राष्ट्रपति को रूस का प्रत्यक्ष समर्थन रहा है, और चाह कर भी पश्चिमी देशों और बेलारूस में कोई परिवर्तन नहीं हो सका है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस तकरीबन बंद पड़े देश में राष्ट्रपति लुकाशेन्को की ओर से पश्चिमी देशों की तरफ नरमी का रुख दिखाना शुरू हो चुका था,

और अमेरिका के रुख में बड़ी तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा था। इसके पीछे की वजह रूस और बेलारूस के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते में छिपी है, जिसे तब के रुसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन के साथ सम्पन्न किया गया था, जिसमें बाद के दिनों में रूस और बेलारूस के एकीकरण को लेकर समझौता हुआ था और बदले में लुकाशेन्को को सत्ता में बने रहने में मदद और बेलारूस में तमाम आर्थिक सहयोग रूस की ओर से दिए जाने का आश्वासन शामिल था।

लेकिन जैसे-जैसे रूस के साथ एकीकरण के लिए पुतिन प्रशासन की ओर से दबाव बढ़ने लगा, बेलारूस की जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार की लोकप्रिय आकांक्षा को भुनाते हुए राष्ट्रपति लुकाशेन्को ने इसे एक अवसर के तौर पर अपने लिए भुनाने और पश्चिम की ओर पींगें बढ़ानी शुरू कर दी थीं।

चुनाव परिणामों पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने बेलारूसी समकक्ष को बधाई दी है, हालांकि पिछले महीने लुकाशेन्को ने दर्जनों रुसी मूल के लोगों को अपने देश में तख्तापलट की साजिश के तहत गिरफ्तार किया था, और रूस के खिलाफ एक बड़ी साजिश का आरोप लगाया था। इसके साथ ही चीन, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, मोल्दोअवा और अज़रबैजान ने भी बधाई संदेश दिए हैं। लेकिन जर्मन सरकार ने स्वतंत्र चुनावों को लेकर गहरी आशंका व्यक्त की है। उसी तरह अमेरिका ने भी चुनावों को देखते हुए अपनी गहरी चिंता का इजहार किया है, और सरकार से अनुरोध किया है कि वह जनता के अधिकारों के सम्मान और शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर किसी भी प्रकार के बल प्रयोग से खुद को दूर रखे।

आपको बता दें कि विपक्षी दल की नेता स्वेतलाना ने नागरिकों को मतदान के साथ ही अपने मत किसे दिए उसे घोषित करने का आह्वान किया था, क्योंकि विपक्ष को पहले से ही पता था कि चुनावों में व्यापक धांधली होनी है।

कई मायनों में बेलारूस और कश्मीर की कहानी में एक साम्यता दिखती है। भू-राजनैतिक तौर पर रूस के लिए बेहद अहम बेलारूस में नाटो देशों की नजर कई दशकों से बनी हुई है, जिसे रूस किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता। लेकिन उसे इस बात की भी चिंता सताए जा रही है कि कहीं अंत में इसका हश्र यूक्रेन जैसा न हो, जो अब पूरी तरह से पश्चिमी साम्राज्यवाद के पक्ष में है। यह दूसरी बात है कि बेलारूस जैसे छोटे से देश में उद्योग धंधे पूरी तरह से रुसी सहयोग पर टिके हैं, और वहां से आयातित वस्तुओं से ही बेलारूस में उत्पादन और फिर उसके निर्यात का बाजार भी मुख्य तौर पर रूस ही है।

लेकिन इस छोटे से देश में अपनी पकड बनाने के लिए जिस प्रकार की छटपटाहट दोनों ही खेमों में नजर आती है, उसने लुकाशेन्को जैसे निरंकुश व्यक्ति के लिए सत्ता के निर्बाध उपभोग के दरवाजे खोल दिए हैं। कमोबेश तीसरी दुनिया के देशों की स्थिति भी इसी तरह की बनाकर रख दी गई है। इसमें नागरिक किसी भी हाल में पिसने के लिए अभिशप्त हैं।

मूल रूप से देखें तो इन देशों में समाजवाद या बहुदलीय लोकतंत्र भी सिर्फ एक धोखे से अधिक कुछ नहीं। निरंकुश सत्तावादी और चुनिन्दा अभिजात्य वर्ग के हित के लिए दशकों से अपने ही देश के नागरिकों के अबाध शोषण को रंग बिरंगे नाम दिए जाते हैं, जिसे बेलारूस की जनता ने इस बार बेहद नजदीक से चुनौती दी है।

कोरोनावायरस, ग्लोबल वार्मिंग एवं दुनिया के विनाश के बारे में जब-जब हम सोचेंगे, तो हमें देखना होगा कि लोकतंत्र, समाजवाद की दुहाई भी कहीं न कहीं ब्रह्माण्ड के शोषण के साथ दुनिया के बहुसंख्यक लोगों के शोषण की ताबीर जिस तेजी से पूंजीवाद ने लिखी है, उसे जितनी जल्दी खत्म किया जा सके, वह प्रकृति और मनुष्य के मुक्ति के लिए सबसे पहली जरूरत सिद्ध होगी।

(लेखक रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on August 11, 2020 1:11 pm

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