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केंद्र को सुप्रीम कोर्ट की फटकार; पूछा-सीबीआई, ईडी, एनआईए के दफ्तरों में क्यों नहीं लगवाए सीसीटीवी

उच्चतम न्यायालय के निर्देश को यदि केंद्र और राज्य सरकार न मानें तो अधिकतम क्या होगा? उच्चतम न्यायालय अवमानना की कार्रवाई कर सकता है, फिर अवमानना में क्या होगा? यह सब क़ानूनी विषय हैं, जिन पर आज़ादी के बाद से ही बहस चल रही है। अब उच्चतम न्यायालय भलीभांति अवगत है कि अवैध पुलिस हिरासत हो या वैध, आरोपी का जमकर उत्पीड़न यानी थर्ड डिग्री टार्चर किया जाता है। इस पर नकेल लगाने के लिए परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ  ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), राजस्व निदेशालय (डीआरआई), सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) में भी सीसीटीवी लगाने के निर्देश दिए थे, लेकिन न तो केंद्र ने न ही राज्य सरकारों ने इसका पालन किया। इस मामले पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को फिर फटकार लगाई है।

देश में पुलिस व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठते आए हैं, फिर चाहे वो पुलिस की कस्टडी में मौत के मामले हों या फिर बेवजह टॉर्चर करने के आरोप, इन तमाम चीजों को लेकर पुलिस रिफॉर्म की बात भी लगातार होती है। इसे लेकर उच्चतम न्यायालय ने दिसंबर 2020 में सरकार को ये आदेश जारी किया था कि पुलिस से संबंधित सभी दफ्तरों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं, लेकिन उसका पालन नहीं होने पर जब सरकार से सवाल किया गया तो सरकार ने कहा कि अभी उसे और वक्त चाहिए, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई।

सरकार ने इसके लिए फंड जुटाने की कोशिशों का जिक्र किया, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आप हमें बताएं कि कितना फंड जुटाया गया है। इस पर सॉलीसिटर जनरल ने कोर्ट से जवाब देने के लिए 10 दिनों का समय मांगा। कोर्ट ने आखिर में कहा कि सरकार ने पिछले आदेश में जारी निर्देशों का पालन अब तक नहीं किया है, इसीलिए हम सरकार को निर्देश जारी करते हैं कि अगले तीन हफ्तों में एक हलफनामा दाखिल कर ये बताए कि कितने वित्तीय खर्च की आवश्यकता है। साथ ही ये भी बताया जाए कि कोर्ट ने जो निर्देश जारी किए थे, उनका पालन कब तक पूरा हो जाएगा।

पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को लेकर उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकारों को भी नए निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि वो राज्यों के दिए गए हलफनामे से सहमत नहीं हैं, इसीलिए राज्यों को अब अगले पांच महीने में सीसीटीवी कैमरे लगाने को कहा गया है, जिन राज्यों में इस साल चुनाव होने जा रहे हैं, उन्हें 31 दिसंबर तक का समय दिया गया है।

पिछले साल 2 दिसंबर को उच्चतम न्यायालय ने केंद्र को जांच एजेंसियों के दफ्तरों में सीसीटीवी और रिकॉर्डिंग उपकरण लगाने के निर्देश दिए थे, जिनमें सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और नेशनल इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी (एनआईए) जैसी एजेंसियां शामिल हैं। कोर्ट ने कहा था कि क्योंकि इनमें से ज्यादातर एजेंसियां अपने ऑफिस में पूछताछ करती हैं, इसलिए सीसीटीवी अनिवार्य रूप से उन सभी कार्यालयों में लगाए जाएंगे जहां इस तरह की पूछताछ और आरोपियों की पकड़ उसी तरह होती है, जैसे किसी पुलिस स्टेशन में होती है।

सवाल है कि उच्चतम न्यायालय के उन आदेशों का अनुपालन सरकर क्यों नहीं करती जो उसके मिजाज को मेल नहीं खाते। दरअसल अदालत का आदेश लागू करने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है और कई बार वह ऐसा करने में गंभीर नहीं होती। कोर्ट के ऑर्डर लागू न होने के पीछे कई कारण होते हैं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि सरकार उस ऑर्डर को लागू करना चाहती है या नहीं। ज़्यादातर मामलों में तो निहित स्वार्थों और राजनितिक प्रतिबद्धताओं के कारण कार्यपालिका ही गंभीर नहीं होती। ऐसा प्रदूषण, ताजमहल और पुलिस सुधार जैसे उच्चतम न्यायालय के कई आदेशों को लेकर देखने को मिला है।

जहाँ तक केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), राजस्व निदेशालय (डीआरआई), सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) में भी सीसीटीवी लगाने का मामला है तो अधिकांश का इस्तेमाल विरोधियों को सबक सिखाने के लिए किया जाता है, जिसमें जमकर टार्चर किया जाता है, तो ऐसे में सरकार उस ऑर्डर को कैसे लागू करेगी?

इसी तरह पुलिस सुधारों पर 2016 में फ़ैसला आ गया था, मगर आज तक लागू नहीं हुआ, क्योंकि सरकार लागू नहीं करना चाहती। वह चाहती है कि पुलिस उसके चंगुल में ही रहे। कई बार और कारण भी होते हैं।

उच्चतम न्यायलय के फ़ैसलों को लागू न करने के अलावा कई बार ऐसा भी देखा जाता है कि सरकारें क़ानून में ही बदलाव कर देती हैं। उच्चतम न्यायालय के किसी आदेश से सहमति न होने पर रिव्यू पिटीशन डाली जा सकती है या फिर संसद में क़ानून बनाकर फ़ैसले को बदला जा सकता है।

भारत के लीगल सिस्टम में यह व्यवस्था है कि उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले को बदलने का अधिकार संसद को है तो सही, मगर ऐसा करने के लिए उसे पहले जजमेंट के आधारों को हटाना पड़ेगा। ऐसा नहीं हो सकता कि उच्चतम न्यायालय ने जो बात कही हो, सरकार उससे कुछ एकदम अलग बात कह दे।

ऐसा कई बार देखने को मिला है जब सरकार ने कोर्ट के फ़ैसलों को उलट दिया दिया यानी एकदम बदल दिया। वोडाफ़ोन, शाह बानो और एससी-एसटी एक्ट को लेकर यह देखने को मिला। उच्चतम न्यायालय  ने जब एससी-एसटी एक्ट को नरम किया तो सरकार ने इसे बदल दिया। यह उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले को बदलने का संवैधानिक तरीका है, क्योंकि संसद को ऐसा करने का अधिकार मिला है।

उच्चतम न्यायालय अगर कोई फ़ैसला सुनाता है और कुछ निर्देश देता है तो उसका अनुपालन न होने की स्थिति में उसके पास संबंधित अधिकारियों या संस्थानों आदि पर अवमानना के आधार पर कार्रवई करने का अधिकार होता है, तो क्या कोई विशेष व्यवस्था देते समय अदालत को यह भी कह देना चाहिए कि अगर उसका आदेश या निर्देश लागू नहीं किया गया तो ज़िम्मेदार पक्षों पर कार्रवाई हो सकती है?

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on March 3, 2021 12:57 pm

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