झारखंड: स्कूलों के मध्याह्न भोजन की केंद्रीकृत किचन व्यवस्था फेल, पुरानी व्यवस्था लागू करने की मांग

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रांची। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के चार प्रखंडों- सादर, झिंकपानी, खुंटपानी और तांतनगर के सभी सरकारी विद्यालयों में केंद्रीकृत मॉडल के तहत मध्याह्न भोजन के लिए लागू केंद्रीकृत किचन व्यवस्था पर खाद्य सुरक्षा जन अधिकार मंच, पश्चिमी सिंहभूम द्वारा किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर 17 दिसम्बर 2023 को जन चर्चा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सर्वेक्षण रिपोर्ट को जारी किया गया। सर्वेक्षण में पाया गया कि इन विद्यालयों के बच्चे इस नयी व्यवस्था से त्रस्त हैं और पुराने विकेन्द्रीकृत मॉडल के अंतर्गत मिलने वाली मध्याह्न भोजन व्यवस्था को पुनः लागू करने की मांग कर रहे हैं।

केंद्रीकृत किचन व्यवस्था क्या है, जानने के लिए बताना जरूरी हो जाता है कि मध्यान्ह भोजन योजना (Mid-Day Meal Scheme) भारत सरकार द्वारा 15 अगस्त 1995 को शुरू की गयी थी। इस योजना को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई करने वाले तथा भूखे रहने वाले बच्चों के लिए खाद्य सामग्री उपलब्ध कराके उन्हें एक स्वस्थ आहार देने के उद्देश्य से शुरू की गयी थी।

संसद और विधान सभाओं द्वारा संयुक्त रूप से निर्णय लिया गया था कि यह योजना राज्य सरकारों द्वारा चलाई जाएगी और इसके लिए राज्य सरकारों को अपनी स्वयं की गतिशीलता के अनुसार आवश्यक व्यवस्थाएं करनी होंगी। इसके बाद से ही यह योजना लगातार बढ़ती हुई आज देश के सभी राज्यों में चलाई जा रही है। इस योजना को तीन तरह के मॉडल के तहत चलाया जाता है। विकेंद्रीकृत मॉडल, केंद्रीकृत मॉडल और अंतरराष्ट्रीय सहायता।

विकेन्द्रीकृत मॉडल में स्थानीय रसोइया और उनके सहायक द्वारा भोजन पकाया जाता है। इस मॉडल के तहत विद्यालय पर ही एक कक्ष में खाना बनाया जाता है। इस व्यवस्था में बच्चों के माता-पिता, विद्यालय कमेटी के पदाधिकारी व सदस्य और स्कूल के शिक्षक इस बात पर निगरानी रख पाते हैं कि रसोइया द्वारा खाना ठीक से बनाया जा रहा है या नहीं। इसके लिए स्थानीय बाजार से भोजन पकाने की सामाग्री ली जाती है। ऐसे में भोजन की गुणवत्ता पर भी निगरानी रहती है।

वहीं केंद्रीकृत मॉडल के तहत एक बाहरी संगठन या संस्था द्वारा खाना बनाया जाता है और इस खाने को स्कूलों में भेजा जाता है। कहना ना होगा कि इस खाना में कई तरह की विसंगतियों की आशंका बनी रहती है। कई बार ऐसा देखने को मिला है कि केंद्रीकृत रसोई में बनने वाले खाने की स्वच्छता व गुणवत्ता को लेकर जब कई जगहों पर बनाए गए खाने के सैंपल का टेस्ट किया गया, तो इन जगहों पर बनाए गए खाने की गुणवत्ता काफी खराब पाई गई। बावजूद सरकार ने इसे लागू रखा है।

अंतरराष्ट्रीय सहायता माॅडल के अंतर्गत कई अंतर्राष्ट्रीय स्वैच्छिक और दान संगठनों द्वारा दिल्ली, मद्रास और नगर निगम के स्कूलों में दूध पाउडर प्रदान किए जाते हैं। केयर (CARE) नामक संगठन द्वारा सोया भोजन, गेहूं, और वनस्पति तेल कई स्कूल को दिए जाते है, जबकि यूनिसेफ द्वारा उच्च प्रोटीन खाद्य पदार्थ और शैक्षणिक सहायता स्कूलों के बच्चों को दी जाती है।

खाद्य सुरक्षा जन अधिकार मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रम में चारों प्रखंड से अनेक अभिभावक, बच्चे, रसोइया व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया व केंद्रीकृत मॉडल के तहत दिए जा रहे भोजन की गुणवत्ता को लेकर अपने अनुभवों को रखा। जन चर्चा में शिक्षा विभाग के मध्याह्न भोजन के नोडल पदाधिकारी एवं राज्य के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी भाग लिया।

चारों प्रखण्ड के 370 सरकारी विद्यालयों जो अधिकांशतः ग्रामीण क्षेत्रों में हैं, में जनवरी-अप्रैल 2023 से मध्याह्न भोजन में केंद्रीकृत किचन व्यवस्था लागू की गयी है। यह किचन अन्नामृत फ़ाउंडेशन द्वारा चलाया जा रहा है, जो इस्कॉन मंदिर की संस्था है। चाईबासा में केंद्रीकृत किचन की स्थापना टाटा स्टील व ज़िला प्रशासन के सहयोग से की गई है, जिसमें खाना बनाकर गाड़ी के माध्यम से विद्यालयों में भेजा जाता है।

कार्यक्रम में बताया गया कि केंद्रीकृत किचन से मिल रहे मध्याह्न भोजन की व्यवस्था को समझने के लिए मंच द्वारा सितंबर व नवम्बर 2023 में चारों प्रखंडों के 23 पंचायतों के 42 विद्यालयों में सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण के दौरान विद्यालय के छात्रों, शिक्षकों व रसोइयों से विस्तृत चर्चा की गई।

सर्वेक्षण में जो नतीजे आए वे काफी चौकाने वाले हैं-

  • सभी 42 विद्यालयों के छात्रों ने कहा कि पहले जो विद्यालय में ही रसोइयों द्वारा मध्याह्न भोजन बनता था, वह सेंट्रल किचन से मिल रहे भोजन से बेहतर था।
  • 92% विद्यालयों के शिक्षकों ने भी कहा कि विद्यालयों में ही बन रहे भोजन की गुणवत्ता व स्वाद सेंट्रल किचन के भोजन से बेहतर था।
  • 90% विद्यालयों के शिक्षकों ने यह भी कहा कि अभी की तुलना में बच्चे पहले ज़्यादा खाते थे, जब विद्यालय में ही खाना बनता था। अब खराब गुणवत्ता और स्वाद पसंद ना आने के कारण बच्चों द्वारा भोजन फेंकना आम बात हो गयी है। सर्वेक्षण के दौरान भी कई विद्यालयों में बच्चे मध्याह्न भोजन को फेंकते दिखा गया।
  • अधिकांश विद्यालयों के शिक्षकों ने स्वीकार किया कि पहले जब विद्यालय में ही भोजन बनता था, वे खुद भी वह खाना खाते थे। लेकिन अब वे अपना टिफ़िन लेकर आते हैं।

सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया गया कि सर्वेक्षण के दौरान बच्चों ने कहा कि पहले जब विद्यालय में भोजन बनता था, तब गर्म, ताज़ा और स्वादिष्ट भोजन मिलता था। हरी साग-सब्जी भी मिलती थी। रोज़ दाल मिलती थी। लेकिन सेंट्रल किचन के खाने में एक अजीब सी गंध रहती है। स्वाद घर के खाने से बिलकुल अलग होता है।

सर्दी में तो खाना जल्द ही ठंडा हो जाता है। हरी साग सब्जी कभी नहीं मिलती है। सब्जी में केवल आलू-पटल रहता है, जिसके बड़े-बड़े टुकड़े रहते हैं, ऊपर वे कभी-कभी पूरी तरह पके हुए भी नहीं होते हैं। कई बार चावल बासी रहता है और लस-लस करता है, जिसे खाया नहीं जाता है। दाल पानी जैसी रहती है और कई बार तो पूरी उबली हुई भी नहीं होती। कई बार दाल खट्टी भी हो जाती है।

अधिकांश शिक्षकों और रसोईयों ने ऐसी ही टिप्पणियां की। उनका कहना था कि चूंकि खाना बिना प्याज, लहसुन और स्थानीय पसंद अनुरूप मसाले के बिना मशीन में बनता है और ताज़ा नहीं मिलता है, इसलिए स्वाद सही नहीं होता है और खराब हो जाता है।

बच्चों, शिक्षकों व रसोइयों ने कहा कि गर्मी के मौसम में भोजन (चावल-दाल) अक्सर खराब हो जा रहा था, जिसके कारण बच्चे खा नहीं पा रहे थे। जब विद्यालय में ही मध्याह्न भोजन बनाता था, तब शिक्षक व ग्रामीण उसकी निगरानी कर सकते थे। लेकिन अब शिक्षकों और ग्रामीणों का सेंट्रल किचन से आ रहे भोजन की गुणवत्ता और स्वाद की समस्या पर किसी प्रकार का हस्तक्षेप संभव नहीं है।

सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह भी बात सामने आई कि केंद्रीकृत किचन व्यवस्था लागू होने के बाद लगभग एक चौथाई सर्वेक्षित विद्यालयों में बच्चों को नियमित रूप से दो अंडा प्रति सप्ताह मिलना बंद हो गया है। अन्नामृत फ़ाउंडेशन अंडा नहीं देती है। अंडे का पैसा अभी भी विद्यालय को भेजा जाता है। चूंकि अब विद्यालय में भोजन नहीं बनता है व अंडा पकाने के लिए अलग से पैसा नहीं दिया जाता है, ऐसे में अनेक विद्यालयों में बच्चों को अंडा नहीं मिलता है।

लोगों ने बताया कि केंद्रीकृत किचन व्यवस्था से स्थानीय आजीविका पर भी बुरा असर पड़ा है। पहले गांव व स्थानीय हाट से ही किसानों से मौसम के अनुसार साग-सब्जी खरीद कर विद्यालय में मध्याह्न भोजन बनाया जाता था। लेकिन सेंट्रल किचन व्यवस्था लागू होने के बाद यह बंद हो गया है।

वहीं रसोइयों का कई महीनों से भुगतान बकाया है। सर्वेक्षण के दौरान रसोइयों ने इस डर को साझा किया कि केंद्रीकृत किचन के कारण आने वाले दिनों में रसोइयों, जो गांव की सबसे वंचित वर्ग से होती हैं, की नौकरी समाप्त हो सकती है।

गौर करने की बात है कि 2023 के मॉनसून सत्र में मझगांव विधायक निरल पूर्ति ने केंद्रीकृत किचन से मिल रहे खराब भोजन और बच्चों द्वारा न खाने पर विधानसभा में सवाल उठाया था। इसपर विभाग ने कहा था कि अगर सुधार नहीं हुआ तो केंद्रीकृत किचन के संचालन में बदलाव किया जाएगा। लेकिन आजतक इसमें बदलाव नहीं हुआ, जबकि लोग लगातार ज़िला प्रशासन में इसकी शिकायत कर रहे हैं।

जन चर्चा में सर्वेक्षण की रिपोर्ट को सुनने के बाद विशेष वक्ताओं ने अपनी अपनी बातें रखीं।

मुखिया संघ के अध्यक्ष हरिन तमसोय ने कहा कि विभागीय पदाधिकारियों को भी केंद्रीकृत किचन का भोजन ही खाना चाहिए।

सनयारी उरांव (नरेगा सहायता केंद्र, लोहरदगा) ने कहा कि लोहरदगा में भी अन्नामृता फाउंडेशन द्वारा केंद्रीकृत किचन में ऐसी ही समस्याएं है।

झारखंड नरेगा वॉच के राज्य सयोजक जेम्स हेरेंज ने कहा कि मध्याह्न भोजन गरीबों के लिए भीख नहीं है, बल्कि यह संविधान से निकला हुआ अधिकार है। उन्होंने कहा कि आदिवासी बच्चों को जबरदस्ती खराब खाना खिलाना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

दीपक तुबिद (पोषण शोधकर्ता) ने कहा कि बच्चों के पोषण के लिए प्रोटीन, जिसका आदिवासी क्षेत्रों में प्रमुख स्रोत मांस मछली है, वो बहुत जरूरी है। लेकिन अभी मध्याह्न भोजन में यह पर्याप्त नहीं मिलता है।

भोजन के अधिकार अभियान के बलराम ने कहा कि अन्नमृत फ़ाउंडेशन द्वारा मध्याह्न भोजन में प्याज़, लहसुन व अंडा न देना ISKCON के खास धार्मिक विचार से प्रेरित है। बच्चों पर कोई खास धार्मिक सोच थोपना व इन खाद्य पदार्थों से वंचित करना संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।

शिक्षा पदाधिकारी ने कहा कि केंद्रीकृत किचन के विरुद्ध शिकायत पहले भी आई हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि सर्वेक्षण की बातों का संज्ञान लिया जायेगा।

ज़िले के बच्चे केंद्रीकृत किचन से लगभग एक साल से त्रस्त हैं। सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि केंद्रीकृत किचन के कारण बच्चों के सेहत, पोषण व विद्यालय आने की इच्छा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। मध्याह्न भोजन में बच्चों को सही पोषणयुक्त भोजन न मिलना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का उल्लंघन भी है। 

कार्यक्रम में आए सभी प्रतिभागियों और मंच ने कार्यक्रम के आखिरी में मांग किया कि तुरंत ज़िले के चारो प्रखंडों में मध्याह्न भोजन में केंद्रीकृत किचन व्यवस्था को बंद कर पूर्व की तरह विद्यालय में ही खाना बनाने की व्यवस्था को लागू की जाए। आने वाले दिनों में किसी भी संस्था/कंपनी को मध्याह्न भोजन बनाने का ठेका न दिया जाए।

कार्यक्रम का संचालन कमला देवी व नारायण कांडेयांग ने किया। सर्वे कर्ताओं में अशोक मुंडरी, डोबरो बारी, हेलेन सूंडी, जयंती मेलगंडी, मानकी तुबिड, नरेश पूर्ति, रमेश जेराई, सिराज दत्ता व सिदियु कायम समेत मंच के कई कार्यकर्ताओं ने अपनी अपनी बातें रखीं।

(झारखंड से विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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