Wednesday, October 27, 2021

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बाल संरक्षण कर्मियों ने अपनी मांगों को लेकर निकाला मौन जुलूस

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रांची। ऑल इंडिया एसोसिएशन फ़ॉर चाइल्ड प्रोटेक्शन के आह्वान पर 15 सितंबर को झारखंड के जिला बाल संरक्षण इकाई देवघर के कर्मियों ने काला बिल्ला लगाकर बाल संरक्षण कर्मियों के प्रति सरकार की उदासीनता के खिलाफ मौन जुलूस निकालकर विरोध दर्ज किया।

बाल संरक्षण कर्मियों का कहना है कि वित्तीय वर्ष 2014 से आज तक एक बार भी हमारे मानदेय में न तो वृद्धि हुई है और न ही सरकार द्वारा देश के बदलते परिवेश, हालात, महंगाई और परिस्थितियों के अनुसार हमारी मासिक परिलब्धियों में कोई पुनर्निर्धारण ही हुआ है। वित्तीय 2013 -14 की तुलना में वर्तमान में महंगाई दुगुनी हो चुकी है।  मगर हमारा मानदेय स्थिर है। जो किसी भी स्थिति में उचित नहीं है।

ज्ञात हो कि बाल संरक्षण कर्मी देश में बच्चों के मौलिक अधिकारों -जीने का अधिकार, सुरक्षा, बाल व्यापार पर रोकथाम, बाल श्रम उन्मूलन, बाल विवाह पर रोक, कन्या भ्रूण हत्या, बाल शोषण सहित बच्चों के सर्वांगीण विकास में बाधक सभी मुद्दों में सुधार के लिए कार्य करते हैं।

इस कोरोना काल में भी बाल संरक्षण कर्मियों ने अपनी जान हथेली पर लेकर कोविड -19 से मृत माता-पिता /अभिभावकों के बच्चों के लिए दिन- रात मेहनत कर उन्हें पोषण, सुरक्षा और संरक्षण प्रदान किया है। उनका कहना है कि इसके बाद भी सरकार हमारे बाल बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक मानवीय सुविधाओं में न्यूनतम वेतन / स्थायी कर्मियों के समान देय छुट्टी आदि देने में नाकाम रही है। हम दूसरों के अनाथ /असहाय / लाचार बच्चों को संवैधानिक और मानवीय अधिकार दिलाने में मदद करते हैं, मगर हमारे बच्चे अल्प मानदेय के कारण उत्पन्न अभाव के चलते उचित पोषण, शिक्षा और सुरक्षा से वंचित रह जाते हैं।

दुःख तो तब होता है, जब ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर काम करने वाले कर्मियों का मानदेय भी 5-6 महीनों तक सरकारी पेंच में फंस कर फाइलों में महीनों तक बाबुओं और पदाधिकारियों के टेबल पर घूमता रहता है और अनावश्यक रुप से विलम्ब कराया जाता है।

 इस मौन विरोध द्वारा उन्होंने सरकार से निम्न मांगें की हैं-

1.बाल संरक्षण कर्मी उच्च योग्यता और अनुभवधारी हैं, अतः उनके मानदेय को शैक्षणिक योग्यता और अनुभव के आधार पर संतुलित कर पुनर्निर्धारण किया जाए। इस पुर्ननिर्धारण में श्रम कानूनों और न्यूनतम वेतन अधिनियम कर प्रावधानों को भी ध्यान रखा जाए।

2.बाल संरक्षण कर्मियो को मणिपुर सरकार के तर्ज पर वेतनमान /ग्रेड पे / स्थायीकरण दिया जाए।

3.जिस प्रकार न्यायालय बच्चों के मुद्दों पर स्वतः संज्ञान लेकर बच्चों के अधिकारों को दिलाने के लिए कार्यपालिका को निर्देशित करती है, उसी प्रकार बच्चों के हितों के लिए काम करने वाले बाल संरक्षण कर्मियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए सरकार को स्वत: संज्ञान लेकर निर्देशित करना चाहिए।

4.बाल संरक्षण कर्मियों को Epf, 50 लाख बीमा, भविष्य सुरक्षा  और नौकरी की सुरक्षा तथा देय पारश्रमिक में 10%वार्षिक वृद्धि का प्रावधान किया जाए।

5.सीमित उप समाहर्ता की परीक्षा में बैठने का अवसर देने के साथ 10 वर्ष उम्र सीमा में छूट और आसन्न सभी बहाली में 50% पदों पर आरक्षण दिया जाए।

झारखण्ड बाल संरक्षण के मुद्दों पर अति संवेदनशील राज्य है, जहां बाल व्यापार एक गम्भीर मुद्दा है, फिर भी सरकारी उदासीनता के कारण इस पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है। केंद्र सरकार के अति उदासीन रवैये के कारण कर्मियों में भारी रोष है।

झारखण्ड सरकार ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में राज्य के समस्त अनुबंध कर्मियों को आवश्यक मानवीय सुविधाओं के साथ समान काम, समान वेतन और स्थायीकरण करने का वादा किया था, मगर सरकार के 20 महीनों के कार्यकाल में अनुबन्ध कर्मियों को निराशा ही हाथ लगी है। अनुबंध कर्मियों ने झारखंड सरकार को अपने चुनावी घोषणा पत्र के अनुसार वादे धरातल पर जल्द उतारने का अनुरोध किया है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रव्यापी मौन सांकेतिक विरोध के बाद भी सरकार उनकी मांगों पर विचार नहीं करती है तो जल्द ही सभी अनुबंध कर्मियों के साथ संयुक्त रूप से जोरदार आंदोलन की रूप रेखा तैयार किया जाएगा।

मौन विरोध प्रदर्शन में मीरा कुमारी, जिला बाल संरक्षण पदाधिकारी, आशुतोष कुमार, श्वेता कुमारी, सुषमा प्रिया, अमृता कुमारी, रणधीर कुमार, आशीष बलियासे, संजय यादव, अनुपमा शर्मा समेत सभी कर्मी  मौजूद थे।

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