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कोरोना का कहर: बड़े ख़तरों की जद में हैं दूर दराज के इलाके

अब कई विद्वान यह लगातार सुझाव दे रहे हैं कि बडे़ शहरों में रह रहे/ अथवा शहरों में संक्रमित लोगों/मरीजों (कोरोना के संदिग्ध) को छोटे कस्बों में जाने से रोका जाए। ताकि कोरोना महामारी को फैलने से रोका जा सके। इसलिए अब राज्यों की सीमाएं, जिलों और शहरों कस्बों की सीमाएं सील की गईं या की जा रही हैं। लेकिन इस सुझाव पर पहले ही पलीता लग चुका है, ये विद्वान, भारत सरकार के उच्च नेतृत्व व अधिकारियों की तरह अपने ड्राइंगरूम से बाहर निकले ही नहीं,  और न उन्होंने पिछले सप्ताहान्त लोगों के मूवमेन्ट को देखा था। जब मुंबई और दिल्ली से चली रेलें और बसें प्रवासी लोगों को दूर दराज के उनके शहरों कस्बों गावों में पहुंचा रही थीं।

कोरोना वायरस से संक्रमित हुए मरीज (या वह संदिग्ध मरीज/व्यक्ति जो संक्रमित देश/विदेश में रहकर या वहां से यात्रा करके लौटे हैं) क्यों और कैसे देश के गावों कस्बों में पहुंचकर जनता के लिए खतरा बन गए हैं। संक्रमित देशों  से आए लोगों से संक्रमित दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों के प्रवासी कोरोना वायरस लेकर अपने गावों कस्बों में क्यों लौट रहे है।

यह प्रश्न पूछना आवश्यक हो गया है कि देश में कोरोना वायरस का पहला मरीज 31 जनवरी को मिलने के बाद विदेशों में फैल रही बीमारी को भारत में प्रवेश नहीं करने देने के लिए हवाई अड्डों पर आवश्यक व्यवस्थाएं क्यों नही कीं, एक महीने तक हवाई अड्डों से ऐसे मरीजों को निकलने दिया गया। क्यों नहीं उन्हें क्वारंन्टाइन करके उनका जांच और इलाज किया गया।

उत्तराखण्ड के कुमाऊं डिवीजन से मिली रिपोर्ट के अनुसार यहां अनेक केस आ चुके हैं। कनिका कपूर की कुख्यात लखनऊ हंगामे से चर्चित हुए पूर्व सांसद अकबर अहमद डम्पी भी अपने घर किच्छा (उ्धमसिंह नगर) पहुंचे हैं जहां स्थानीय प्रशासन ने उन्हे क्वारंटाइन में रख दिया है। अनेक केस स्थानीय अस्पतालों में दर्ज हो चुके हैं। उत्तराखण्ड की तराई के हालात बता रहे हैं कि जिस तरह से यहां प्रवासी देश विदेश हवाई अड्डों में बिना चैक हुए वापस लौट रहे हैं वह खतरनाक हो सकता है।

यहां के हालात देखकर यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि प्रवासियों के लौटने पर अगर ऐसा ही दूसरी जगहों पर हो रहा है तो हालात बेहद नाजुक हैं।और यह बड़े खतरे की घंटी है। सप्ताहान्त के बाद पिछले दो-तीन में बढ़ी इन घटनाओं को देखकर लग रहा है कि कहीं यह कथित “जनता कर्फ्यू” नोवेल कोरोनावायरस COVID-19 का अखिल भारतीय फैलाव का कारण न बने!

इसी को देखकर लग रहा है कि सरकार को हर महत्वपूर्ण निर्णय बिना तैयारी के जल्दबाजी और हड़बड़ी में लेने की आदत पड़ गई है, यह आशंका है कि कोरोना वायरस की बीमारी के फैलाव को रोकने के लिए लिया गया जनता कर्फ्यू का निर्णय नोटबंदी की तरह जनता के लिए घातक न हो जाए।

देश में कोरोना वायरस से निपटने की मान्य चिकित्सीय सुविधाओं की घोर कमी के बीच नोटबंदी की तरह इस निर्णय को लेने के पीछे मोदी जी या सरकार की कोई जमीनी तैयारी नहीं दिखी है और न अन्य देशों के अनुभव से सीख ली गई है।

19 मार्च को प्रधानमंत्री जी ने टीवी पर आकर पर 22 मार्च को जनता कर्फ्यू या जिसे यूरोप में लाक डाउन कहा जाता है, करने की घोषणा की। इससे पहले सरकारी स्तर पर कोरोना वायरस से हो रही महामारी को रोकने के लिए कोई नीतिगत घोषणा नहीं की थी।

केरल जहां कोरोना का प्रभाव अपेक्षित रूप से अथिक था वहां की सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों के अलावा अन्य किसी राज्य में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुए थे। जबकि केरल के बाहर मुम्बई और दिल्ली में कोरोना के वायरस का असर दिख रहा था। मार्च के आरम्भ में ही इसके लक्षण दिखने लगे थे। और लोग इसके बारे में आशंका प्रकट करने लगे थे।

मार्च के पहले पखवाड़े जब कोरोना रोकने के लिए सोशल मीडिया में गौमूत्र से लेकर मंत्र और धूप सेंकने के अचूक नुस्खे धड़ल्ले से चल रहे थे, उसी बीच कोरोना का कहर अपने डैने फैलाने लगा था। उत्तर भारत में जब मुर्गे मछली की दूकानें बंद करके कोरोना रोकने के अचूक फार्मूले आजमाए जा रहे थे तभी कोरोना से पहली मौत की खबर आई (जो आज चार तक पहुंच गई है)।

बड़े शहरों में इसके बारे में गम्भीर खबरें आने लगीं। बंगलुरू, मुम्बई सहित सभी बड़े और औद्यौगिक शहरों/क्षेत्रों में सभी सामाजिक गतिविधियों के बंद होने और बड़ी कम्पनियों के घर से काम करने की सुविधा देनी आरम्भ कर दी। यह सब बातें स्थिति की गम्भीरता को बढ़ा रही थीं, लेकिन सरकार की तरफ से कोई एक्शन होता नहीं दिख रहा था। विदेशों से फ्लाइट्स लगातार आ रहीं थीं, और सभी हवाई अड्डों पर आने वाले यात्रियों की कोरोना की जांच की पक्की व्यवस्था नहीं थी, विशेषकर कोरोना प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों की निगरानी सख्ती से नहीं हुई, संदिग्ध मरीजों को क्वारंटाइन में रखने की व्यवस्था भी नहीं हुई थी।

कोरोना बीमारी फैलने का अगर चार्ट देखें तो पाएंगे कि यह बीमारी हवाईअड्डों वाले शहरों में से आरम्भ हुई और वहीं से फैली। सभी संदिग्ध मरीज विदेश से आए, यदि बीमारी कि आहट सुनते ही हवाई अड्डों पर जांच की जाती तो यह हालत नहीं होती। दिल्ली, मुंबई जैसे हवाई अड्डों की सिक्योरिटी जांच से बचकर जब यात्री बाहर आ गए तो राज्य की राजधानियों व छोटे शहरों के हवाईअड्डों में जांच की क्या स्थिति होगी यह आसानी से समझा जा सकता है। इस तरह बीमारी फैलती रही, और इसके साथ इसकी दहशत फैलती रही।

लखनऊ के कनिका कपूर का काण्ड ने भी हवाईअड्डों पर बाहर से आने वाले संदिग्ध मरीजों की जांच व्यवस्था की पोलपट्टी खोल दी। मीडिया से जुड़ा होने के कारण इस मामले में जैसे-जैसे खुलासे होते गए वैसे वैसे इसकी दहशत कई गुना बढ़ती गई।

प्रधानमंत्री की घोषणा से कुछ पहले ही हवाई अड्डों पर जांच बढ़ाई गई जिसका एक परिणाम विदेश से आए एक संदिग्ध मरीज की सफदरजंग अस्पताल की छत से कूदकर खुदकुशी करने के रूप में दिखा। सभी बड़े शहरों में कोरोना बीमारी का अच्छा खासा प्रचार हो गया था, राज्य सरकारों/स्थानीय प्रशासन ने इस बीमारी को लेकर दिशा निर्देश जारी करने आरम्भ कर दिए थे।

19 को अचानक प्रधानमंत्री के इस विषय में संदेश देने की घोषणा होती है। उनकी घोषणा और उसका ऐलान करने के बीच दहशत और बढ़ती है। प्रधानमंत्री द्वारा 22 को जनता कर्फ्यू के “आयोजन” की घोषणा के सात ही यह बात पुख्ता हो जाती है कि सभी असुरक्षित हो गए हैं। दिल्ली मुम्बई जैसे शहरों के बाजार तीन दिन बंद करने और संस्थानों को 31 मार्च तक बंद करने की घोषणा होती है। रूकी हुई दहशत का एक विस्फोट होता है , और देश में अफरा- तफरी बढ़ जाती है।

पंजाब सहित अनेक क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन सेवाओं व ट्रेनों के बंद करने की घोषणा से यह बात तो पुख्ता होती गई कि छोटे शहर भी खतरे में आ गए हैं।

इसके साथ ही छोटे शहरों और गांव से बड़े शहरों में रहकर रोजी-रोटी से जुड़े लोगों के लिए शहर एकदम असुरक्षित लगने लगे, और वह बहुत तेजी से शहर छोड़कर अपने अपने इलाकों में लौटने लगे।

शहर से निकलने वाले लोग जिनमें संदिग्ध कोरोना संक्रमित भी होंगे वह जैसे तैसे शहरों से भागने लगे ठीक इटली और स्पेन की तरह। यूरोप में तो लोगों के पास व्यक्तिगत गाड़ियां होती हैं। जब उनके फैलने से इतना बड़ा बीमारी का विस्फोट हो गया है, तो कल्पना करें देश में शहरों से गांव की ओर ट्रेनों और बसों में ठूंस ठूंसकर भाग रहे लोग अपने साथ कितनी बड़ी मात्रा में इस बीमारी को देशभर में फैला रहे हैं। यह सोचकर सिहरन हो रही है।

जिस जनता कर्फ्यू को बीमारी के संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए लागू किया जा रहा है अब उससे पूरे देश को संक्रमित होने की आशंका हो गई है। दिल्ली मुम्बई व अन्य शहरों से देश के विभिन्न क्षेत्रों में जाने वाली ट्रेनों का जो हाल दिखाई दे रहा है वह चेतावनी दे रहा है कि संक्रमण के फैलाव को रोकने के नाम पर लागू किए गए जनता कर्फ्यू से संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ने की आशंका है।

जनता कर्फ्यू की की घोषणा से पहले, व इस तरह की लाक डाउन की घोषणा की आशंका को “सूंघने वाले पढ़े लिखे” सुविधा सम्पन्न लोग पहले ही संक्रमित क्षेत्र छोड़कर दूसरे सुरक्षित शहरों को निकल पड़े थे। फिर जैसे ही यह घोषणा हुई कि प्रधानमंत्री जी घोषणा करने वाले हैं ऐसे लोग भाग निकले, फिर जब घोषणा हो गई तो उसके कुछ घंटे बाद ही लोग सुरक्षित क्षेत्रों को भागने लगे।

लखनऊ के कुख्यात कनिका कपूर काण्ड के बाद यह सिद्ध होता जा रहा था कि हवाई अड्डों से देश में प्रविष्ट हुई है और अब करोनो महामारी भारत के लिए बड़ा खतरा बन गई है, केरल में इस करोनो महामारी और उसके प्रभाव के प्रचार व यूरोप,केरल के शहरों सहित बंगलुरु जैसे आईटी हब में दो हफ्तों से चले लाकडाउन से देश की जनता यह जान चुकी थी कि यह स्थिति यहां कभी भी आ सकती है। लेकिन लाक डाउन को जनता कर्फ्यू बनाकर और कथित कर्फ्यू की घोषणा करने व कर्फ्यू लगाने के बीच के समय में शहरों राज्यों की सीमाएं सील न करने से करोनो महामारी के संदिग्ध मरीज दिल्ली मुम्बई से गांव गांव पहुंच चुके हैं।

22 जनता कर्फ्यू और 24 मार्च तक ढीले ढाले लाकडाउन के बाद भी सीमाओं को सील करने की व्यवस्थाएं ढीली ढाली रहीं,  जिससे व्यक्तिगत वाहन वाले लोग संक्रमित शहरों से दूर दराज के गावों कस्बों में पहुंच गए हैं।

नैनीताल के होटलों द्वारा 21 मार्च से  स्वेच्छा से लॉकडाउन करने के कारण पहाड़ के दूरदराज के छोटे छोटे होटलों में होम स्टे के तहत पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के लोग भरे हुए हैं जो कि आने वाले दिनों में बड़ी समस्या बनने जा रहे हैं।

इस तरस संक्रमित लोगों/संक्रमित क्षेत्रों के लोगों ने कई चरणों में देश भर में इस जानलेवा कोरोनो वायरस का फैलाव किया है। जनता कर्फ्यू के नाम पर जो तमाशा किया गया है उसमें इस महामारी को रोकने के मान्य सिद्धान्तों का पालन नहीं किया गया और न ही यूरोप में महामारी फैलने के कारकों के अनुभव से सीख ली गई थी।

यदि 19 मार्च को की गई जनता कर्फ्यू की घोषणा के साथ राज्यों की सीमाएं सील कर दी जातीं व आवाजाही प्रतिबंधित कर दी जाती तो यह नौबत नहीं आती।

संक्रमित सुविधा सम्पन्न लोगों अथवा संक्रमित क्षेत्रों काम करने वाले प्रवासियों की गांव छोेटे शहरों में एंट्री/ वापसी और फैलाव से, सबसे अधिक खतरा भी छोटे शहरों और गांवों को होने की आशंका है। घनी आबादी और छोटे घरों के कारण यहां संक्रमण तेजी से फैलने की आशंका है। फिर छोटे शहरों/गांव में मेलजोल और सामाजिकता के कारण इसको फैलने में बहुत मदद मिलती है, और सबसे खतरनाक यह है कि ऐसे इलाकों में इलाज की छोटी भी सुविधाएं नहीं हैं।

उत्तराखण्ड और हिमाचल की ठंडी जलवायु में संक्रमित लोगों का वायरस कब तक पलता रहेगा यह भविष्य का एक और बड़ा प्रश्न बन गया है। क्योंकि मैदानी क्षेत्रों में अगले 15-20 दिनों में तापमान बढ़ने लगेगा लेकिन पर्वतीय इलाकों में नोवेल कोरोनावायरस COVID-19 को पलने, पनपने और फैलने लायक मौसम पूरे वर्ष रहने वाला है।

अब यह कहना बेकार है कि इस बीमारी के वाहक अधिकांश सुविधा सम्पन्न लोग रहे हैं। संक्रमित देशों की यात्रा करने वाले, या वहां काम करने वाले हवाई जहाज से आकर जगह जगह संक्रमण फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं।

मोदी जी स्वयं यह आशंका प्रकट कर रहे हैं कि वाहनों में भर कर यात्रा करना खतरनाक हो सकता है। जबकि तीर हाथ से निकल चुका है।

ऐसे में बिना सोचे समझे और बिना तैयारी के लागू किए गए इस जनता कर्फ्यू से जो अचानक संक्रमित लोगों का अखिल भारतीय फैलाव हुआ है, वह क्या कहर बरपाएगा यह आने वाले दिन बताएंगे।

(इस्लाम हुसैन स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल उत्तराखंड में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 26, 2020 2:39 pm

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