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अपराधियों की गिरफ्तारी नहीं, गिरफ्तारी की आवाज उठाने वालों पर मुकदमा

झारखंड के पलामू जिले में 15 वर्षीय आदिवासी लड़की के हत्यारे की गिरफ्तारी के बजाय हत्यारे अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए आवाज उठाने वाले नेताओं व मृतका के परिजनों पर ही कई संगीन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

मालूम हो कि 28 अप्रैल 2020 को झारखंड के पलामू जिले के पाटन थानान्तर्गत मेराल निवासी रामलाल सिंह की 15 वर्षीय पुत्री सोनम कुमारी रात में घर से गायब हो गयी, गायब होने का पता चलने पर परिजनों ने उसे खोजना शुरु किया। 29 अप्रैल की सुबह मेराल गांव के एक छोर पर सुंगरहा कला बहवारिया टोला के पास सोनम की लाश उसी के दुपट्टे से पेड़ से लटकी हुई मिली। सोनम पाटन स्थित कस्तूरबा गाँधी आवासीय बालिका विद्यालय में 9 वीं की छात्रा थी, जो लाॅकडाउन की वजह से विद्यालय बंद हो जाने के कारण घर आयी थी।

परिजनों व गांव वालों ने इस हत्या को सामूहिक बलात्कार के बाद की गई हत्या कहना शुरु किया और पुलिस को भी यही बात बतायी। सोनम के पिता रामलाल सिंह ने पुलिस को एक मोबाइल नंबर दिया, जिससे सैकड़ों काॅल सोनम के मोबाइल पर आया था। पुलिस ने मोबाइल काॅल के डिटेल के आधार पर गांव के ही तीन युवकों क्रमशः पृथ्वी सिंह, विशाल व गुरदेल सिंह को हिरासत में लिया, लेकिन सोनम के परिजनों के अनुसार उन लोगों को जेल भेजने के बजाय लगभग 8 दिन पाटन थाना के ही हाजत में रखा गया और फिर कोई सबूत ना मिलने की बात कहकर छोड़ दिया गया। वैसे पुलिस के अनुसार सोनम की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बलात्कार की बात सामने नहीं आयी है।

सोनम के चाचा जयमंगल सिंह, जो बिहार मिलिट्री पुलिस (बीएमपी) में हैं और सोनम की हत्या के बाद छुट्टी पर घर आये हैं, बताते हैं कि ‘जब ये लोग हाजत से छूटकर आये, तो गांव में खुलेआम घूम-घूमकर कहते पाये गये कि हम लोगों ने सोनम के साथ दुष्कर्म करने के बाद मारकर उसे पेड़ से लटका दिया।’

जयमंगल सिंह बताते हैं कि ‘उसके बाद गांव के कई लड़कों को पुलिस पकड़कर ले गयी और उन लोगों को जमकर पीटा व सभी से यह कबूल करने के लिए बोला कि सोनम के घर वालों ने ही उसकी हत्या की है।’

वे बताते हैं कि ‘इसके बाद मैं पाटन-छतरपुर की भाजपा विधायक पुष्पा देवी के आवास पर भी गया। वहाँ विधायक पति मनोज भुइयां से हमारी मुलाकात हुई। उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि पुलिस को सही से जांच करने को बोलूंगा, लेकिन हुआ कुछ नहीं। बाद में सोनम के पिता ने तमाम उच्च अधिकारियों व मुख्यमंत्री को भी एक आवेदन के जरिये पूरे मामले की जानकारी दी, लेकिन फिर भी हत्यारों की गिरफ्तारी तो दूर वे लोग सोनम के परिजनों को ही जान से मारने की धमकी देते रहे।’

पुलिस की इस तरह की कार्रवाई से गांव के लोगों के जेहन में पुलिस की कार्यप्रणाली शक के घेरे में आ गई। इधर इस मामले को लेकर मुखर रहे छात्र संगठन आइसा की पलामू जिलाध्यक्ष दिव्या भगत ने 16 मई को इस मामले को लेकर एक ट्वीट किया, जिससे पुलिस डिपार्टमेंट फिर से हरकत में आ गई क्योंकि झारखंड पुलिस मुख्यालय से पलामू एसपी को इस मामले की जांच करने का आदेश दिया गया था।

जयमंगल सिंह बताते हैं कि ’29 मई को पाटन थाना में हम लोगों को डीएसपी संदीप गुप्ता और थाना प्रभारी आशीष खाखा ने बुलाया, जहाँ पर हत्यारा पृथ्वी भी था। पुलिस अधिकारी हम लोग को बार-बार सबूत देने को बोल रहे थे और बोले कि इन लोगों को पकड़ तो लूंगा, लेकिन सबूत के अभाव में जल्द ही छूट जाएगा। पुलिस की बात सुनकर हम लोगों का शक यकीन में बदल गया कि जरूर ही पुलिस अधिकारी अपराधी से मिले हुए हैं।’

आइसा नेत्री दिव्या भगत बताती हैं कि ‘गांव के युवाओं की पुलिस द्वारा पिटाई व लगातार मृतका के परिजनों को धमकाने से गांव में दहशत का माहौल कायम हो गया, जिसका प्रतिकार जरूरी था, इसलिए हम लोगों ने 31 मई को लाॅक डाउन के दौरान फिजिकल डिस्टेन्सिंग का पालन करते हुए मशाल जुलूस निकालना तय किया। इसकी खबर फैलते ही पाटन थाना प्रभारी आशीष खाखा के नेतृत्व में 31 मई को पुलिस गांव में आ गई, लेकिन काफी देर रहने के बाद चली गयी। हम लोगों ने भाकपा (माले) लिबरेशन व आइसा के नेतृत्व में फिजिकल डिस्टेन्सिंग का पालन करते हुए मशाल जुलूस निकाला और 1 जून को पूरे झारखंड में छात्र संगठन आइसा व महिला संगठन ऐपवा ने ‘धिक्कार दिवस’ मनाने का ऐलान किया।’

दिव्या बताती हैं कि ‘धिक्कार दिवस मनाने के बाद 1 जून को मैं और भाकपा (माले) लिबरेशन के पाटन प्रखंड सचिव पवन विश्वकर्मा दूसरे गांव में चले गए थे।’

जयमंगल सिंह बताते हैं कि ‘इधर मेराल गांव में थाना प्रभारी के नेतृत्व में पुलिस आई और गांव में ‘दीवार लेखन’ देखकर बौखला गई और ग्रामीणों के साथ थाना प्रभारी गाली-गलौज करने लगा। ग्रामीणों में पुलिस के खिलाफ आक्रोश था ही, परिणामस्वरूप ग्रामीणों ने भी पुलिस को उसी की भाषा में जवाब दिया। जिससे बौखलाकर पुलिस ने 4 राउंड फायरिंग की, जिसमें 13 साल की बच्ची रिया बाल-बाल बची। इससे जनता में आक्रोश और भी भड़क गया। मैं दूसरे घर में बैठा हुआ था, मैं दौड़ता हुआ आया और ग्रामीणों को समझाने लगा। लेकिन ग्रामीणों के आक्रोश का शिकार मैं भी बन गया और कई महिलाओं ने मेरी भी पिटाई कर दी। दरअसल पुलिस की फायरिंग के बाद महिलाओं का गुस्सा चरम पर पहुंच चुका था, खासकर पाटन थाना प्रभारी आशीष खाखा के खिलाफ। अंततः ग्रामीणों ने थाना प्रभारी को घेर लिया और पलामू एसपी के गांव आने की मांग पर अड़ गये।’

दिव्या बताती हैं कि ‘जब हम दोनों को इस घटना की जानकारी हुई, तो हम दोनों भी मेराल पहुंचे। कुछ ही देर में डीएसपी संदीप गुप्ता व एसडीओ के नेतृत्व में लगभग 200 पुलिस वहाँ पहुंची और सभी ग्रामीणों के बीच डीएसपी ने कहा कि 24 घंटे के अंदर सोनम के हत्यारे गिरफ्तार होंगे। लेकिन गांव से जाने के बाद पुलिस ने हम लोगों पर झूठा आरोप लगाकर धारा – 147/148/149/188/109/341/342/323/325/327/307/353/427/269/270/120 बी भारतीय दंड विधान, 03 लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम व 53 आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया।’

जयमंगल सिंह बताते हैं कि ‘मुकदमे में हम लोगों की मदद करने वाली आइसा नेत्री दिव्या भगत, माले नेता पवन विश्वकर्मा के साथ-साथ मेरा यानी जयमंगल सिंह, मृतका सोनम के भाई मधु कुमार, मृतका की बहन पूनम कुमारी, मेरी रिश्तेदार सुचिता देवी, रंजीता बाला, सुगन बाला, जयराम सिंह, अखिलेश, पंकज, अयोध्या, राहुल पासवान समेत 18 लोग नामजद व 200 अज्ञात पर एफआईआर दर्ज है, जिसमें कई नाबालिग हैं। मैंने तो एक पुलिस होने के नाते पुलिस का बचाव ही किया और महिलाओं से पिटाई भी खाई, फिर भी मेरे ऊपर मुकदमा कर दिया गया।’

आइसा नेत्री दिव्या भगत कहती हैं कि ”नेताओं और ग्रामीणों पर 307, मतलब जान से मारने कि कोशिश करने का इल्ज़ाम लगाना यह साबित करता है कि पुलिस ग्रामीणों की आवाज दबाने के लिए किसी हद तक जा सकती है। आज जब पूरे विश्व में पुलिस के काम करने के तरीके पर आवाज उठ रहा है, आंदोलन हो रहा है तो झारखंड पलामू की पुलिस भी उसी तरफ इशारा कर रही है कि पुलिस नियमों में रिफॉर्म की आवश्यकता है। आम जनता और खास कर गरीब, दलित, माइनॉरिटी, आदिवासी को पुलिस बराबर का इंसान नहीं बल्कि दोयम दर्जे का नागरिक समझती है, जिसे जब चाहे जैसे चाहे मारा, पीटा या झूठी धाराओं में फंसाया जा सकता है। मेराल, पाटन रेप और हत्या कांड में एसपी से लेकर पूरा पुलिस महकमा अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए उल्टा ग्रामीणों को झूठी धाराओं में फंसा रहा है। क्या पुलिस को कोई विशेष इम्यूनिटी प्राप्त है? झारखंड में पुलिसिया राज है क्या? हमलोगों ने पुलिस अधिकारियों से शांतिपूर्ण वार्ता की। डीएसपी कुर्सी पर बैठा हुआ था। अगर हम लोगों की नीयत पुलिसवालों की जान मारने की होती, तो फिर उन्हें कुर्सी पर क्यों बैठाते ? यह सब पुलिस-अपराधी गठजोड़ की एक साजिश है ताकि अन्याय के खिलाफ कोई आवाज ना उठाये। मैं इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग करती हूँ, ताकि पुलिस-अपराधी गठजोड़ से पर्दा हट सके।”

इधर भाकपा (माले) लिबरेशन के झारखंड राज्य सचिव जनार्दन प्रसाद ने भी एक ट्वीट में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व डीजीपी एमवी राव को टैग करते हुए लिखा है कि ‘नीचे जिन लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया है, वे एक बच्ची के साथ बलात्कार व हत्या के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग हैं। क्या रघुवर सरकार की तरह प्रशासन अपराधियों को बचाने के लिए उनके खिलाफ आवाज उठाने वालों को ही दंडित करती रहेगी? उचित जांच कर कार्रवाई की जाय।’

(रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल रामगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on June 3, 2020 5:28 pm

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