Mon. Sep 16th, 2019

घाटी में जारी हैं लगातार मौतें, लेकिन प्रशासन नहीं ले रहा कोई जिम्मेदारी

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कश्मीर का एक दृश्य। साभार-गूगल

शुक्रवार को भारत के मुस्लिम बहुल कश्मीर में जुम्मे की नमाज के कुछ देर बाद रफीक शगू के घर की खिड़की चकनाचूर कर अन्दर आए आंसू गैस ने एक कमरे को भर दिया जिससे उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई ।

अब जब भारतीय अधिकारियों ने हिमालयी क्षेत्र में दो हफ्ते से अधिक समय तक तालाबंदी करने के दौरान अपने सैनिकों द्वारा हुए किसी भी नागरिक की मौत को सिरे से नकार दिया है, रफीक की अपनी पत्नी के मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को सज़ा दिलाने की कोशिश एक निरर्थक प्रयोजन बन कर रह गयी है।

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शगू ने कहा, “वे (पुलिस) मौत की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं। हम जवाब चाहते हैं, लेकिन पता ही नहीं है कि न्याय कहां मिलेगा।”

एएफपी के साथ हुए एक साक्षात्कार में, शगू ने 9 अगस्त की दोपहर की भयावह घटनाओं को याद करते हुए कहा कि उनकी पत्नी फहमीदा श्रीनगर स्थित अपने घर पर अपने दो बच्चों को पढ़ा रही थीं।

शगू ने कहा कि उनके घर के आस-पास सरकारी बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच छोटी-मोटी झड़पें हुईं और फिर पुलिस ने रिहायशी घरों में आंसू गैस और काली मिर्च के गोले फेंकने शुरू कर दिए।

नरेंद्र मोदी की सरकार ने कश्मीर की स्वायत्तता खत्म करने की घोषणा से पहले दसियों हजार अतिरिक्त सैनिकों को वहां तैनात किया था ताकि निवासियों को विरोध करने से रोका जा सके। फिर भी घोषणा के चार दिन बाद से यह झड़पें शुरू हो गयीं। 

घटना को याद करते हुए शगू बताते हैं, “कमरे में धुंआ भर जाने के कारण हम एक दूसरे को देख नहीं पा रहे थे। गोलों के फटने से 3 बार धमाके की आवाज़ हुई।”

“हमने किसी तरह बच्चों को कमरे से बाहर निकाला और जैसे ही उसने हड़बड़ी में बाहर भागने की कोशिश की, वह गिर गयी। जब तक हम उसे कमरे से बाहर निकालते तब तक वह बेहोश हो चुकी थी और उसके मुंह से झाग निकल रही थी।”

उन्होंने कहा कि फहमीदा को मोटरसाइकिल पर अस्पताल ले जाया गया पर डाक्टर उसे बचा नहीं पाए। 

एएफपी ने फहमीदा की चिकित्सा रिपोर्ट देखी जहां यह उल्लेख किया गया है कि उसने “आंसू गैस के गोले की जहरीली गैस को सांस के साथ अंदर खींचा था।” और मौत का एक संभावित कारण “फेफड़ों में विषाक्त घाव” थी।

– ‘कोई मौत नहीं हुई’ –

भारतीय अधिकारियों ने तालाबंदी लागू करने के बाद से कश्मीर से आने वाली हर खबर को रोकने की भरसक कोशिश की है।

अतिरिक्त सैनिकों को तैनात करने के साथ-साथ  उन्होंने टेलीफोन, मोबाइल फोन और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं – हालांकि पिछले दिनों कुछ लैंडलाइनों को बहाल कर दिया गया है।

अधिकारियों का कहना है कि इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि कश्मीर में तालाबंदी के परिणामस्वरूप किसी की मौत हुई है, उनके अनुसार केवल आठ लोग घायल हुए हैं।  

लेकिन अस्पताल के कई सूत्रों ने एएफपी को बताया कि कम से कम 100 लोगों को चोट पहुंची है, जिन में से कुछ लोग बन्दूक की चोट से घायल हुए हैं।

पैलेट  से शिकार हुए कुछ लोगों ने एएफपी को बताया कि बहुत सारे लोगों का घर पर इलाज इस डर से किया गया कि अगर वे अस्पतालों में इलाज कराने गए तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है ।

– बेहिसाब मौतें –

एएफपी ने दो अन्य लोगों के रिश्तेदारों के साथ भी बात की, जिनका आरोप है कि सुरक्षा बलों की हिंसा के कारण उन दोनों की मृत्यु हुई।

उन में से एक 15 वर्षीय उसियाब अहमद था, जिसकी मौत 5 अगस्त को डूबने के कारण हुई थी। 

उसके परिवार ने कहा कि अहमद अपने घर के पास था जब पुलिस ने गोला बारूद और आंसू गैस के गोले दागे और प्रदर्शनकारियों का पीछा करते हुए उन्हें नदी की तरफ खदेड़ा, जहाँ डूबने के कारण उसियाब की मौत हो गयी।

“उसके शरीर को पानी से पांच घंटे के बाद बाहर निकाला गया था, यहां तक कि उसके ज़नाजे पर भी पुलिस ने हमला किया,” यह सब कुछ अहमद के एक रिश्तेदार ने एएफपी को बताया जिनकी पहचान को सुरक्षा कारणों से गुप्त रखा गया है। 

उन्होंने आगे बताया, “विरोध प्रदर्शन के आक्रामक होने की आशंका जताते हुए सुरक्षाकर्मियों ने शव को हमसे छीनने की कोशिश की।”

परिवार के कई सदस्यों और पड़ोसियों के अनुसार, मोहम्मद अयूब खान (एक अन्य पीड़ित) शनिवार को श्रीनगर डाउन-टाउन में अपने घर के बाहर खड़े थे, जब पुलिस ने पत्थर फेंकने वाले प्रदर्शनकारियों के एक छोटे समूह को तोड़ने के लिए आंसू गैस के कनस्तर फेंके ।

62 वर्षीय लकड़ी के व्यापारी, खान के सामने दो गोले गिर गए, जिससे वह सड़क पर ही ढेर हो गए, उनके मुंह से झाग निकल रही थी।

तीन बेटियों के पिता, अयूब खान को अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया, लेकिन पुलिस ने उनके शरीर को जबरन अपने कब्जे में ले लिया।

उनका अंतिम संस्कार पुलिस की निगरानी में देर रात को हुआ जिसमें परिवार के सिर्फ 10 सदस्यों को उपस्थित रहने की अनुमति दी गई। उनके छोटे भाई शबीर अहमद खान ने एएफपी को बताया कि “पुलिस अधिकारी ने हमें धमकी दी कि यदि हम मीडिया से बात करते हैं या जुलूस निकालने की कोशिश करते हैं, तो वह शव को नदी में फेंक देंगे,”

उन्होंने आगे बताया कि “हम चार पुलिस वैनों के साथ कब्रिस्तान गए थे।”

खान के परिवार ने मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए कई बार अस्पताल का दौरा किया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि पुलिस ने इसे जारी ना करने का निर्देश दिया है।

शबीर अहमद खान कहते हैं, “उनकी मौत शायद सरकार द्वारा दर्ज नहीं की जाएगी लेकिन हमारे लिए वह शहीद हैं।” 

“उनकी मृत्यु भारत की क्रूरता का एक और उदाहरण है।”

(याहू डॉट कॉम पर प्रकाशित जलीस अंद्राबी की इस रिपोर्ट को साभार लिया गया है। अग्रेंजी में प्रकाशित इस रिपोर्ट का अनुवाद विदिशा ने किया है। )

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