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दिल्ली पुलिस की प्रोफेशनल अक्षमता का नतीजा है दिल्ली हिंसा

कॉन्स्टेबल रतनलााल के इस भरे पूरे परिवार को देखिये। यह रतनलाल का परिवार है जो दंगाइयों की गोली से मारे जाने के पहले के चित्र में दिख रहा है। अब रतनलाल नहीं रहे। इनकी अर्थी जब उठेगी तब एक लास्ट पोस्ट बजेगी, शोक परेड होगी, शस्त्र झुकेंगे और साथियों की गर्दनें भी, अधिकारी कंधे देंगे, दिल्ली सरकार एक करोड़ का मुआवजा देगी, और नौकरी के कई लाभ इनके परिवार को मिलेंगे। पर बस कॉन्स्टेबल रतनलाल नहीं रहेगा। उसका परिवार और उसके कुछ करीबी दोस्त, दुनियाभर की तमाम सच्ची, और औपचारिक शोकांजलियों, मोटी रकमों के मुआवजों और तमाम आश्वासनों के बाद भी रतनलाल को जीवनभर भी भुला नहीं पाएंगे।

पर पुलिस और सेना की नौकरी में यह खतरे तो होते ही हैं। यह एक प्रोफेशनल हेज़ार्ड है। पर अफसोस, पिछले लंबे समय से दिल्ली में जो कुछ भी हो रहा है वह दिल्ली पुलिस की पेशेवराना छवि पर बदनुमा दाग है। दंगों से राजनीतिक जमात का कुछ नहीं बिगड़ता है। वे तो साम्प्रदायिक एजेंडे पर चलते ही रहते हैं। वे ऐसे एजेंडों के वे पक्ष में रहें या विपक्ष में दोनों ही स्थितियों का लाभ उठाना उन्हें बखूबी आता है। पर दंगा चाहे, 1984 का हो, या 2002 के गुजरात दंगे हों, या 1980 का अलीगढ़ हो या 1987 का मलियाना या 1992 के देशव्यापी दंगे हों सबकी जांच पड़ताल में एक चीज बड़ी शिद्दत से उभर कर आती है कि उन दंगों में पुलिस की क्या भूमिका रही है। जैसे सभी दंगों की जांच होती है, इन दंगों की भी होगी। न्यायिक जांच हो या कोई गैर सरकारी संगठन, इन दंगों की तह में जाने की कोशिश करे,  पर सच तो उभर कर आएगा ही। आज के संचार समृद्ध युग में हर खबर हमारी मुट्ठी में है । पर थोड़ी मेहनत कीजिए और सच जान लीजिए।

पर एक बात साफ है कि दिल्ली में माहौल बिगाड़ने का एक योजनाबद्ध प्रयास किया गया और यह काफी समय से किया जा रहा है। अफसोस, इसकी भी कमान गृहमंत्री ने संभाली है। उन पर  इस प्रयास को विफल करने की भी जिम्मेदारी है। पर इस जिम्मेदारी का निर्वाह वे नहीं कर पाए। चुनाव के दौरान उनके भाषण पर न केवल चुनाव आयोग को रोक लगानी चाहिए थी बल्कि उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराना चाहिए था। पर सैकड़ों करोड़ के घोटाले में लिप्त अफसर जब चुनाव की कमान संभालेंगे तो,  उनसे यह उम्मीद करना ईश्वर को साक्षात देखना ही हुआ। फिर अनुराग ठाकुर का बयान। गद्दारों को गोली मारने का आह्वान ।

यह एक मंत्री और सरकार की क्लीवता का प्रमाण है कि वह गद्दारों के विरुद्ध तो कानूनन कुछ कर नहीं पा रहे  हैं, और जनता को भड़का कर गोली मारने की बात उनके द्वारा कही जा रही है। आईएसआई के पे रोल पर पाकिस्तान के लिये जासूसी करने वाले भाजपा आईटी सेल के गद्दारों के खिलाफ कोई उल्लेखनीय कार्रवाई सरकार ने नहीं की। डीएसपी देवेंदर सिंह जो दो आतंकियों के साथ खुले आम पकड़ा गया, उसके बारे में सबने सांस खींच ली है। अब न मीडिया खबर बताता है और न सरकार कुछ कह रही है। पुलवामा हमले में प्रयुक्त आरडीएक्स कहां से आया, यह आज तक नहीं पता लगा। उल्टे इन सबके बारे में सवाल उठाना देशद्रोह का नया इंग्रेडिएंट है।

दरअसल अब सरकार और उसके समर्थकों ने देशद्रोह की परिभाषा बदल दी है। देश सिमट कर सरकार और सरकार सिमट कर एक आदमी के रूप में आ गयी है। इसी गणितीय सूत्र के आधार पर  एक व्यक्ति की निंदा और आलोचना, सरकार की निंदा और आलोचना और सरकार के प्रति द्रोह, देश के प्रति द्रोह हो गया है। इसीलिए किसी कानून का विरोध करना, शांतिपूर्ण जनसभाएं करना, कविताएं और लोगों को रचनात्मक क्रियाकलापों से जागरूक करना जिसमें सरकार की आलोचना होती हो वह देशद्रोह हो गया है। कानून पर सवाल उठाना देशद्रोह है। फ़र्ज़ी डिग्री और फर्जी हलफनामें दिए हुए हुक्मरानों की सत्यनिष्ठा पर चर्चा करना देशद्रोह है। रोज़ी रोटी शिक्षा और स्वास्थ्य की बात करना देशद्रोह है। सरकारी कंपनियों की अनाप शनाप बिक्री पर सवाल उठाना देशद्रोह है।सेडिशन, धारा 124 A आईपीसी की नयी व्याख्या है यह। अब नए परिभाषा का युग है यह।

कॉन्स्टेबल रतनलाल के मौत की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को लेनी पड़ेगी। नैतिक नहीं प्रोफेशनल अक्षमता की जिम्मेदारी। जब से सीएए कानून बना है तभी से यानी 19 दिसंबर 2019 से ही दिल्ली में इस कानून का प्रतिरोध शुरू हुआ है। असम और नॉर्थ ईस्ट से उठी प्रतिरोध की लहर तत्काल देशव्यापी हो गयी। कानून संवैधानिक है या असंवैधानिक, इस पर बहस बाद में होगी, पर केवल दिल्ली पुलिस के प्रोफेशनल दक्षता का मूल्यांकन करें तो उसकी भूमिका बेहद निराशाजनक रही है। शाहीनबाग में सड़क जाम है पर कोई हिंसा नहीं हुयी। दिल्ली चुनाव में शाहीनबाग को दिल्ली के विकास के मुकाबले खड़ा किया गया। गृहमंत्री से लेकर विधायक प्रत्याशी कपिल मिश्र तक के भड़काने वाले बयान आये। पर उस पर कोई कार्यवाही दिल्ली पुलिस नहीं करती है।

वारिस पठान का बयान आया उसपर भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी। शाहीनबाग में एक व्यक्ति गोपाल रामभक्त पुलिस दस्ते के सामने गोली चला रहा है, उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की गयी। कपिल मिश्र एक अल्टीमेटम दे रहे हैं कि ट्रम्प के जाने तक वह चुप हैं और उसके बाद वे क्या करेंगे यह पूछने की हिम्मत उनसे दिल्ली पुलिस की नहीं पड़ रही है। उनके खिलाफ कोई कार्यवाही अब तक नही होती है। उस बड़बोले अल्टीमेटम के चौबीस घँटे में ही दिल्ली में हिंसा भड़क उठती है। सात लोग कॉन्स्टेबल रतनलाल सहित उस हिंसा में मारे जाते हैं। अब तक उनके विरुद्ध उस भड़काने वाले बयान पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी। जानबूझकर भड़काने वाले बयानों पर कोई कार्यवाही नहीं करना क्या यह दिल्ली पुलिस की अक्षमता नहीं है ?

चाहे तीसहजारी कोर्ट में वकीलों द्वारा डीसीपी मोनिका से की गयी बदसलूकी हो, या साकेत कोर्ट के बाहर बाइक सवार पुलिस कर्मी से कैमरे के सामने वकीलों द्वारा की गयी अभद्रता हो, या जेएनयू में नकाबपोश गुंडों द्वारा भड़काई गयी हिंसा पर दिल्ली पुलिस की शर्मनाक चुप्पी हो, या जामिया यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरी में घुसकर छात्रों पर किया गया अनावश्यक बल प्रयोग हो, या अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा और कपिल मिश्र के भड़काऊ भाषण के बाद  पुलिस की शातिराना चुप्पी हो, इस सब में दिल्ली पुलिस की भूमिका बेहद निराशाजनक और निंदनीय रही है। लेकिन ऐसा क्यों है, यह आत्ममंथन और अन्तरावलोकन दिल्ली पुलिस के बड़े अफसरों को करना है न कि कनिष्ठ अफसरों को। यह अक्षमता जानबूझकर कर ओढ़ी गयी है। जब कानून व्यवस्था को राजनीतिक एजेंडे के अनुसार निर्देशित होने दिया जाएगा तो यही अधोगति होती है।

आज जब एक अतिविशिष्ट अतिथि दिल्ली में हैं, और सुबह के अखबार दंगों, हिंसा, भड़काऊ भाषण, और उन्माद की खबरों से भरे पड़े हों, सोशल मीडिया इन खबरों को विविध कोणों से इसे लाइव दिखा रहे हों तो दिल्ली शहर की कानून-व्यवस्था के बारे में क्या छवि दुनियाभर में बन रही होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। जब यह हाल दिल्ली शहर का है तो किसी अन्य दूर दराज के इलाक़ों में पुलिसिंग का क्या स्तर होगा इसका भी अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

अब भाजपा के सांसद, मनोज तिवारी और गौतम गंभीर के बयान आये हैं कि कपिल मिश्र के खिलाफ कार्रवाई की जाय। उन्हें भी ज़मीनी हालात का अंदाज़ा लग रहा होगा। पर यह चुप्पी हैरान करती है। इस चुप्पी और दंगे का असर सीधे प्रधानमंत्री की छवि पर पड़ रहा है, जिन्होंने अपनी छवि बनाने के लिये पूरी दुनिया नाप रखी है, पर जब दुनियाभर में दिल्ली की खबरों को लोग उत्कंठा और प्राथमिकता से पढ़ रहे हैं तो देश की राजधानी के प्रति, हमारी शासन क्षमता के प्रति, हमारी प्राथमिकताओं के प्रति और हम भारतीयों के प्रति वे क्या धारणा बना रहे होंगे, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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This post was last modified on February 25, 2020 5:13 pm

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