Mon. Sep 16th, 2019

डीयू त्रिमूर्ति विवाद : छात्रसंघ चुनाव के पहले “छद्म राष्ट्रवाद” का तड़का

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दिल्ली विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) द्वारा “त्रिमूर्ति” स्थापित करने का विवाद गहराता जा रहा है। परिसर में एनएसयूआई और एबीवीपी आमने-सामने हैं। एबीवीपी यही चाहता भी था कि विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के पहले परिसर के माहौल में राष्ट्रवाद का तड़का लगा कर परिसर को दो ध्रुवों में बांटा जाए। इसमें वह सफल होता दिख भी रहा है। लेकिन बात इतने तक सीमित नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े तीन शख्सियतों की मूर्ति लगाने का निर्णय सिर्फ छात्रसंघ अध्यक्ष शक्ति सिंह का नहीं हो सकता है। इसके पीछे किसी गहरी साजिश से इनकार नहीं किया जा सकता है। ऐसी साजिश जिसे करने में संघ-भाजपा सिद्धहस्त है। इसकी प्रतिक्रिया होनी ही थी। एनएसयूआई ने सावरकर की मूर्ति पर कालिख पोत कर यह बता दिया कि संघ-भाजपा सावरकर को चाहे जितना बड़ा वीर बताए लेकिन इतने दुष्प्रचार के बाद भी देश का युवा सावरकर को भगत सिंह और नेताजी के समकक्ष रखने को तैयार नहीं है।
डीयू प्रशासन ने कैंपस में इस प्रतिमा को लगाने की अनुमति नहीं दी थी। लेकिन छात्र संघ अध्यक्ष शक्ति सिंह ने रात के वक्त चोरी- छिपे “त्रिमूर्ति” स्थापित किया। मुद्दा यहीं से सवालों के घेरे में आता है। कम से कम भारत का युवा इतना देशद्रोही नहीं है कि वह अपने ऐतिहासिक नायकों की प्रतिमा शिक्षण संस्थानों में लगाने का विरोध करेगा। लेकिन संघ-भाजपा भी इस छल की क्या प्रतिक्रिया होगी, पहले से ही जानती समझती है। उसे इतिहास या आजादी के नायकों से सिर्फ इतना भर ही मतलब है, जितने से चुनावी लाभ उठाया जा सके। शक्ति सिंह का डूसू के अध्यक्ष के तौर पर कार्यकाल 21 अगस्त को समाप्त हो गया है। और छात्रसंघ का चुनाव 12 सितंबर को होने वाला है। साल भर के कार्यकाल में उनकों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद नहीं आई। कार्यकाल समाप्त होने के दो दिन पहले वह प्रतिमा स्थापित करने का षड़यंत्र करते हैं।
डीयू की प्रॉक्टर नीता सहगल ने डूसू के पूर्व अध्यक्ष शक्ति सिंह को बुधवार को कारण बताओ नोटिस जारी किया और प्रशासन से अनुमति लिए बिना आवक्ष प्रतिमा स्थापित करने पर 24 घंटे में जवाब मांगा हैं। राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) ने छात्नसंघ के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा था सावरकर को बोस और सिंह के साथ एक ही स्थान पर नहीं रखा जा सकता। एनएसयूआई के दिल्ली प्रकोष्ठ के अध्यक्ष अक्षय लकड़ा ने कहा, “वे बोस और भगत सिंह के साथ ही सावरकर की आवक्ष प्रतिमा कैसे लगा सकते हैं, वह भी रातोंरात । विश्वविद्यालय प्रशासन पहले इस मामले में चुप्पी साधे था इसलिए हमें मामले को अपने हाथ में लेना पड़ा। विश्वविद्यालय एबीवीपी के इशारों पर काम कर रहा है।”
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ते हुए हम बाल-लाल-पाल, गांधी-नेहरू-पटेल, भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव और अली बंधुओं के संघर्षों को कई स्थानों पर एक साथ पढ़ते हैं। इन लोगों का नाम एक साथ इसलिए लिखा गया है क्योंकि उनके सपने और संघर्ष एक थे। संघर्ष का तरीका और विचारों की एकता थी। ढेर सारे बिंदुओं पर उनमें आपसी सहमति थी। लेकिन इतिहास से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाने वालों ने स्वतंत्रता संग्राम की एक नई त्रिमूर्ति तैयार की है।
एबीवीपी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में जो कारनामा किया है वह इनकी बौद्धिक दिवालियापन का ही सबूत है। रात में किसी समय चुपके से छात्रसंघ पदाधिकारियों का मूर्ति लगाकर फरार हो जाना कहां का राष्ट्रवाद है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जब दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ पर एबीवीपी का कब्जा है तो उन्हें इस तरह चुपके से मूर्ति लगाने की जरूरत क्यों पड़ गई?
दरअसल, सावरकर के साथ भगत सिंह और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति को एक में लगाने का नैतिक साहस संघ-भाजपा भी नहीं कर पा रही थी। इसलिए एक षड़यंत्र के तहत ऐसा किया गया। जिससे दूसरे छात्र संगठन और दल विरोध करें और फिर आसानी से उन्हें देशद्रोही होने का तमगा दिया जा सके। और कुछ दिनों बाद डूसू और डूटा के चुनावों में अन्य छात्र संगठनों और शिक्षक संगठनों को निशाना बनाया जा सके। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने एबीवीपी पर चुनावी लाभ के लिए स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को अपमानित करने का आरोप लगाया है।
राजनीति या किसी भी क्षेत्र में जोड़िया ऐसे नहीं बनती हैं। एक कालखंड में एक समान विचार और व्यवहार वाली शख्सियतों को समानताओं के आधार पर एक साथ जोड़ा जाता है। यहां तो तीनों महापुरुषों में जमीन-आसमान का अंतर है।
यह बात सहीं है कि वीडी सावरकर स्वतंत्रता संग्राम के अहम किरदार थे। लेकिन उनका सार्वजनिक और आंदोलनात्मक जीवन दो भागों में बंटा है। एक समय में वे क्रांतिकारिता और त्याग से भरे हुए नायक की भूमिका में थे। और देश की आजादी के लिए किसी भी तरह की कुर्बानी देने के लिए तत्पर दिखते हैं। लेकिन उनके जीवन का दूसरा भाग अंग्रेजों की चापलूसी और वफादारी सिद्ध करने में बीतता है। अंग्रेज अधिकारियों के लिखे पत्र में यह साफतौर पर दर्ज है कि वीडी सावरकर को अपने क्रांतिकारी जीवन पर पश्चाताप था। इसे वे कई बार व्यक्त किए थे। अपने जीवन का बहुत बड़ा भाग उन्होंने सांप्रदायिक राजनीति की विचार-भूमि तैयार करने में बिताया।
नेताजी सुभाष के जीवन और विचार को देखें ते वह देश की स्वतंत्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। देश के स्वतंत्रता संग्राम और कांग्रेस में शामिल रहे। लेकिन महात्मा गांधी से मतभेद होने के कारण कांग्रेस को छोड़ दिया। गांधी और कांग्रेस के तरीके से वह असहमत थे। देश की आजादी के लिए वे विश्व भर में जनमत बनाने में लगे थे। लेकिन भगत सिंह का रास्ता उक्त दोनों नेताओं से अलग था। उनकी लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों से देश को स्वतंत्र कराने भर सीमित नहीं था। वे आजादी के बाद भी “काले अंग्रेजों” से संघर्ष करने का आह्वान कर रहे थे। ऐसे में सावरकर के साथ नेताजी और भगत सिंह की मूर्ति लगाने को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीरज कुंदन ने कहा कि सावरकर देशविरोधी व्यक्ति थे जिन्होंने देश की आजादी में योगदान देने की बजाय अंग्रेजों से अपनी जिंदगी की भीख मांगी। जबकि सरदार भगत सिंह जैसे वीर सपूतों ने देश के लिए अपनी जान को जवानी में ही न्यौछावर कर दिया और सुभाष चन्द्र बोस ने देश की आजादी में सबसे एहम योगदान निभाया।
एनएसयूआई ने सावरकर की इस मूर्ति स्थापना को अवैध बताकर मोरिस नगर थाने में शिकायत भी दर्ज करवाई है और हटाने की मांग की है। एनएसयूआई का कहना है कि इस तरह की विभाजनकारी बातों के लिए अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यह केवल डूसू चुनाव में ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है। सावरकर को इतिहास के पन्नो में उनकी गद्दारी को देशभक्ति में बदलने के लिए एबीवीपी ऐसे कार्य कर रही है जिसे लेकर एनएसयूआई अपना विरोध जारी रखेगी और इतिहास के साथ कोई छेड़छाड़ नही करने देगी।विश्वविद्यालय में रातों रात यह त्रिमूर्ति स्थापित करने की घटना सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। भोपाल में रहने वाले वरिष्ठ लेखक राजेन्द्र शर्मा अपने फेसबुक पर लिखते हैं-
“युगल, त्रिमूर्ति, पंचायतन आदि श्रेष्ठ नायकों की आपसी मैत्री और एकता जनता के मानस पर पहले बनती हैं फिर शिल्प अथवा कलाओं में उकेरी जाती हैं। राधा- कृष्ण, सीता राम, ब्रह्मा-विष्णु-महेश, गांधी-नेहरू-सुभाष, भगतसिंह-राजगुरु-सुखदेव, विनय-बादल-दिनेश को जनता यूं ही नहीं स्वीकार करती। मार्क्स-ऐंगल्स-लेनिन जैसे उदाहरण दुनिया भर में देखे जा सकते हैं।”
नवभारत टाइम्स में कार्यरत एवं वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण अपने फेसबुक पर लिखते हैं- “ एबीवीपी को डीयू में गुपचुप सावरकर की मूर्ति लगानी थी तो हेडगेवार और गोडसे के साथ लगाती। भगत सिंह और नेताजी का भला उनसे क्या लेना-देना।”
लेकिन मैं चीख चीख कर कहना चाहता हूं कि सावरकर सुभाष और भगतसिंह को एक पांत में नहीं बिठाया जाना चाहिए। नहीं बिठाया जा सकता। ये तीनों अपने अपने कर्मों से अलग अलग रहकर अमर भी हो सकते हैं। सावरकर जी को अपने योग्य पंक्ति में सम्मानजनक स्थान जरूर मिलना ही चाहिए। मैं उनके लिए सावरकर-गोडसे-गोलवलकर की त्रिमूर्ति प्रस्तावित करता हूं। आप चाहें तो प. पू. हेडगेवार जी और डॉ. मुंजे को भी शामिल करते हुए अपने पंच परमेश्वर का पवित्र ध्यान भी कर सकते हैं।

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