Sunday, June 26, 2022

ख़ास रपट: निजी व सामाजिक संबंधों का इस्तेमाल कर उत्पाद बेंचती एमएलएम कंपनियां

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पवन कुमार मल्टीलेवल मार्केटिंग कंपनियों से इस कदर परेशान हैं कि कहते हैं इन कंपनियों ने मेरी निजी ज़िंदग़ी को यातनापूर्ण बना दिया है। कैसे और किस तरह? पूछने पर पवन कुमार बताते हैं कि उनकी सास आईएमसी कंपनी की एजेंट/मेंबर हैं। और अपनी बेटी (पवन कुमार की बीवी) के मार्फ़त दबाव बनाती हैं कि बेटी-दामाद होकर हम उनकी मदद नहीं करेंगे, आईएमसी एजेंट नहीं बनेंगे तो कौन बनेगा। वो चाहती हैं कि मैं आईएमसी एजेंट बनकर अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले सारे उत्पाद आईएमसी कंपनी का इस्तेमाल करूं। मसलन साबुन, शैम्पू, फेसवॉश, टूथपेस्ट, इम्युनिटी बूस्टर आदि। तो इसमें दिक्कत तलब बात क्या है पूछने पर पवन कुमार कहते हैं भाई साहेब 15 हजार मासिक इनकम है। जबकि आईएमसी के सारे उत्पाद सामान्य उत्पादों की तुलना में चार गुना महंगे हैं। पवन कुमार बताते हैं इस चक्कर में आये दिन बेडरूम में बीवी से चिकचिक हो जाती है। और फिर कई दिनों तक हमारे बीच अबोलापन रह जाता है।

वहीं अपनी परेशानी के अगले छोर का खुलासा करते हुये पवन कुमार आगे बताते हैं कि उनकी एक मामी मल्टीलेवल मार्केटिंग कंपनी ‘मोदीकेयर’ की एजेंट/मेंबर हैं और दूसरे लोगों को जोड़ती हैं। वो दावा करती हैं कि मोदीकेयर से जुड़ने के महज सात महीने बाद अब हर महीने उनके पास 18 हजार रुपये का चेक आता है। वहीं पवन कुमार की एक दूसरी महिला रिश्तेदार भी मोदी केयर की सदस्य हैं। वो भी दबाव बना रही हैं कि सदस्यता ले लो। अच्छे उत्पाद हैं। दोनों महिला रिश्तेदारों का एक ही लॉजिक है कि घर का सामान तो इस्तेमाल करते ही हो मोदीकेयर कंपनी का इस्तेमाल करो, कमाई भी होगी।

पर पवन कुमार हर बार पैसे का बहाना बनाकर पीछा छुड़ाते भागते हैं। पवन कुमार की केस स्टडी से एक बात स्पष्ट है कि एमएलएम कंपनियां लोगों के निजी रिश्तों को सीढ़ी बनाकर अपना कारोबार करती हैं। ये कंपनियां अपने सदस्य/एजेंट व्यक्तियों पर दबाव बनाती हैं कि वो अपने सामाजिक और पारिवारिक संबंधों का इस्तेमाल कंपनी का उत्पाद बेंचने और कंपनी का सदस्य बनाने के लिये करें। पवन कुमार की केस स्टडी से एक बात और स्पष्ट हो जाती है कि एमएलएम कंपनियां अब स्त्रियों के सहारे अपने कारोबार को आगे बढ़ा रही हैं। जबकि एक दशक पहले तक यह जिम्मेदारी पुरुषों के कंधे पर थी।  

बाबूगंज बाज़ार यादव चौराहा पर मिठाई और समोसा, सगौड़ा की दुकान चलाने वाले संजय गुप्ता ‘वेस्टीज’ का नाम सुनते ही मुस्करा पड़ते हैं। संजय बताते हैं कि वो मोबाइल शॉप चलाते थे। रिपेयरिंग और रिचार्ज का काम था। लेकिन धीरे-धीरे वो कर्ज़ में डूबते चले गये। तगादा करने वालों के चलते दुकान पर बैठना मुहाल हो गया। उसी समय एक जान पहचान वाला उन्हें ‘वेस्टीज’ के एक मीटिंग में लेकर गया। वहां जोशीले स्पीच को सुनकर उन्होंने खुद को ‘वेस्टीज’ को समर्पित कर दिया। जब वो जुड़े तो कथित एरिया मैनेजर ने उन समेत तमाम लोगों को बताया कि एक डायरी में पहले पन्ने पर अपना विश लिखो, छोटी नहीं बड़ी विश। और दो साल बाद खुद की फॉर्चूनर कार ख़रीदने की विश संजय ने अपनी डायरी के पहले पन्ने पर लिखी। संजय बताते हैं कि वो इस तरह मोटिवेट कर देते कि आप को लगता बिना पूंजी के करोड़पति बनने की चाभी आपके हाथ लग गई है।

राकेश रमण

ख़ैर छः महीने की मगज़मारी के बाद संजय को समय रहते ही समझ आ गई कि बिना मेहनत और पूंजी के पैसे नहीं बनाये जा सकते। जैसे तैसे संजय भागकर काम की तलाश में पहले मुंबई और फिर अपने जीजा के यहां प्रतापगढ़ चले गये। और उनकी दुकान पर मिठाई समोसा, गुझिया, सगौड़ा बनाने के गुर सीखे। दो साल जीजा की दुकान पर काम करने के बाद उन्होंने खुद की कन्फेक्शनरी दुकान खोली। संजय बताते हैं कि उन्होंने वो मिठाइयां बनाने की कला सीखी जो बाज़ार में कोई नहीं बनाता था। और तिथि त्योहार लोग शहर से लाकर बेचते थे। आज संजय कर्ज़ से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं, बाजार और आस-पास के गांवों में उनकी दुकान मशहूर है। संजय बताते हैं कि एमएलएम कंपनियां बेवकूफ़ बनाती हैं, आपको करोड़पति बनाने का सपना देकर आपसे 4-5 हजार रुपये का शुल्क लेकर आपको अपना सामान बेंचने वाला एजेंट बनाती हैं।

संजय के मुंह से एमएलएम कंपनी का जिक्र सुनकर राम लखन यादव अपने अतीत की घटना का जिक्र छेड़ देते हैं। कहते हैं कोई पच्चीस साल पहले की बात होगी। मेरे साले का साला चार लोगों को लिवाकर मेरे घर आया। और पीछे पड़ गया कि एमवे की सदस्यता ले लूँ। सामान इस्तेमाल करने के साथ ही कमाई का भी लालच दिया। उनके पास एक कैसेट थी जिसे उन्होंने टेप रिकार्डर पर चलाया था उसमें कई लोगों ने अपनी कहानियां सुनाई थी कि कैसे उन्होंने बिना कुछ किये सिर्फ़ एमवे के रोजमर्रा के उत्पाद का इस्तेमाल करके पैसे बनाये और आलीशान ज़िंदग़ी जी रहे हैं। राम लखन यादव बताते हैं कि उस समय एमवे की सदस्यता किट की क़ीमत 3500 रुपये थी जबकि मेरी मासिक कमाई तीन हजार रुपये थी। मैंने उन्हें मना कर दिया था वो नाराज़ भी हुये लेकिन मेरे पास कोई रास्ता नहीं था। मैं उतने महंगे उत्पादों का इस्तेमाल नहीं कर सकता था, मेरी उतनी समाई नहीं थी, न ही उतनी कमाई।   

कनौजा गांव के राकेश रमण पांडेय आजकल बिजली के सामान बेंचते हैं। इससे पहले अपने पहले काम के तौर पर उन्होंने ‘डीएक्सएन’ नामक एक एमएलएम कंपनी पकड़ी थी। किसी को पेट दर्द होता राकेश उसे डीएक्सएन कंपनी का प्रोटीन सप्लीमेंट बेंच देते। किसी किसान का बच्चा कम नंबर लाता तो उसके पिता को याददास्त बढ़ाने वाला टेबलेट बताकर डीएक्सएन का विटामिन टैबलेट बेंच देते। माने राकेश के पिता सरकारी शिक्षक थे और दादा पुरोहित। जबकि खुद राकेश आरएसएस कार्यकर्ता के तौर पर काम करते थे। तो अपनी तीनों पीढ़ियों के जान पहचान वालों को वो जबर्दस्ती डीएक्सएन के उत्पाद बेंच देते थे। डीएक्सएन का काम छोड़ क्यों दिया पूछने पर राकेश कहते हैं डीएक्सएन कंपनी बहुत बढ़िया थी उसके उत्पाद भी एक नंबर की क्वालिटी के थे। लेकिन उत्पाद महंगे होने के नाते कंपनी का कारोबार भारत में नहीं चल पाया। और कंपनी ने भारत से अपना कारोबार समेट लिया।  

इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेशे से वकील अनिल मिश्रा अपने पुराने दिनों को याद करते हुये बताते हैं कि वो 2006-07 का साल था। मेरे बहन बहनोई साहिबाबाद में रहते थे। घर की माली हालत ठीक नहीं थी तो मैं भी बीए पास करने के बाद कमाने के लिये ग़ाज़ियाबाद चला गया। वहां एक श्रीवास्तव जी एयरटेल की पोस्टपेड सिम बेंचने के लिये एक छोटा सा कॉल सेंटर चलाते थे। मेरा फील्ड का काम था, ग्राहकों से ज़रूरी डॉक्यूमेंट लेकर ऑफिस में जमा करवाने का। अनिल आगे बताते हैं कि दो महीने काम करने के बाद उन्हें पता चला कि उनका बॉस ‘आरसीएम’ नामक एक एमएलएम कंपनी से जुड़ा था और उसके उत्पादों का पिकअप सेंटर भी ले रखा था। अनिल बताते हैं कि एक दिन उनके उस बॉस ने उनकी एक महीने की सैलरी जो कि उस वक़्त साढ़े तीन हजार रुपये थी ज़ब्त कर ली और उन्हें आरसीएम का एक सूट लेंथ का कपड़ा पकड़ाकर बोले आज से तुम आरसीएम के सदस्य हो।

तुम्हारी तनख्वाह सदस्यता शुल्क के तौर पर जमा करा दी है। अपनी दीदी-जीजा और दोस्तों-रिश्तेदारों को आरसीएम से जोड़ो, आरसीएम के सामान खुद इस्तेमाल करो और अपने जान पहचान के लोगों को इस्तेमाल करने के लिये कहो।  कितने लोगों को आप जोड़ पाये पूछने पर अनिल बताते हैं कि किसी को भी नहीं। 3500 रुपये सदस्यता शुल्क देकर कंपनी का सामान बेंचो और अपने रिश्तेदारी नातेदारी, दोस्ती के संबंधों का सत्यानाश करो, लोग इतने भी बेवकूफ नहीं।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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