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सीएम येदियुरप्पा और 61 माननीयों के खिलाफ मुकदमे वापसी पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक

कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसी हफ्ते 21 और 22 दिसंबर को राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ दो महत्वपूर्ण आदेश पारित किए हैं। कर्नाटक हाई कोर्ट ने मंगलवार 22 दिसंबर को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ दर्ज एक आपराधिक शिकायत को खारिज करने से इनकार कर दिया है। वहीं सोमवार 21 दिसंबर को कर्नाटक हाई कोर्ट ने येदियुरप्पा सरकार के 31 अगस्त की तारीख वाले सरकारी आदेश पर रोक लगा दी। इसके तहत निर्वाचित प्रतिनिधियों और मंत्रियों के खिलाफ 61 आपराधिक मामलों में मुकदमा वापस लेने का फैसला किया गया था।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने मंगलवार को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ दर्ज एक आपराधिक शिकायत को खारिज करने से इनकार कर दिया। यह आरोप है कि येदियुरप्पा ने फरवरी 2006 और अक्तूबर 2007 के बीच, राज्य के उपमुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान भूमि के को गैर अधिसूचित करके उद्यमियों को आवंटित किया था।

जस्टिस जॉन माइकल क्यून्हा की एकल पीठ ने 21 दिसंबर, 2005 को कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस द्वारा धारा 13 (1) (घ) के तहत सपठित अपराधों के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (2) के तहत दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) को रद्द करने से इनकार कर दिया। वर्ष 1988 वासुदेव रेड्डी द्वारा दायर एक निजी शिकायत के आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई थी।

एकल पीठ ने येदियुरप्पा के खिलाफ जांच में देरी के लिए लोकायुक्त पुलिस की खिंचाई करते हुए कहा कि परिस्थितियों से स्पष्ट रूप से संकेत मिलता है कि देरी साभिप्राय और जानबूझकर की गई है। एकल पीठ ने कहा कि चूंकि लोकायुक्त पुलिस की जांच अभी भी जारी है, इसलिए लोकायुक्त पुलिस के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई का कोई आदेश पारित नहीं किया जा रहा है। एकल पीठ ने जांच में ढिलाई बरतने के लिए लोकायुक्त पुलिस को फटकार लगाई।

कर्नाटक उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस अभय श्रीनिवास ओका और जस्टिस  विश्वजीत शेट्टी की खंडपीठ ने सोमवार को 31 अगस्त के राज्य सरकार के फैसले पर रोक लगा दी, जिसके तहत निर्वाचित प्रतिनिधियों और मंत्रियों के खिलाफ 61 मामलों आपराधिक मामलों में मुकदमा वापस लेने का फैसला किया गया था। खंडपीठ ने आदेश दिया कि हम निर्देश देते हैं कि 31 अगस्त, 2020 (सरकार) के आदेश के आधार पर आगे कोई कदम नहीं उठाया जाएगा।

खंडपीठ 31 अगस्त के आदेश को चुनौती देते हुए पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज, कर्नाटक द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मांग की गई थी कि निर्वाचित प्रतिनिधियों और मंत्रियों के खिलाफ 61 मामलों में आपराधिक मुकदमा वापस लेने के राज्य सरकार के फैसले पर रोक लगाई जाए। राज्य सरकार ने सीआपीसी की धारा 321 के तहत 61 मामलों में अभियोजन न चलाने की सहमति प्रदान की थी। अदालत ने राज्य सरकार को याचिका पर अपना जवाब 22 जनवरी, 2021 तक दर्ज करने का निर्देश दिया है और मामले को 29 जनवरी, 2021 को आगे की सुनवाई के लिए पोस्ट कर दिया है।

याचिका के अनुसार, अभियोजन से मुक्त किए जा रहे मामलों में राज्य के कानून मंत्री जेसी मधुस्वामी, पर्यटन मंत्री सीटी रवि और कृषि मंत्री बीसी पाटिल शामिल हैं। होसपत विधायक आनंद सिंह के खिलाफ 2017 से एक मामला भी वापस लेने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट क्लिफ्टन डी’रोजारियो ने तर्क दिया था कि यह फैसला कानून के शासन के खिलाफ था।

खंडपीठ ने पहले एसके शुक्ला और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले  का हवाला दिया था। खंडपीठ ने कहा था कि सीआरपीसी की धारा 321 के तहत कार्रवाई केवल न्यायालय की अनुमति से वापस की जा सकती है। खंडपीठ ने कहा था कि यहां तक कि अगर कोई आवेदन सीआरपीसी की धारा 321 के तहत किया जाता है, तो न्यायालय यह आकलन करने के लिए बाध्य है कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं और न्यायालय के पास आवेदन खारिज करने का अधिकार है।

उच्चतम न्यायालय के फैसले में यह भी कहा गया है कि भले ही सरकार, सरकारी वकील को किसी मामले के अभियोजन से हटने का निर्देश दे, बाद में मामले के तथ्यों पर अपने विवेक से या तो निर्देशों से सहमत हो सकते हैं और न्यायालय में वापसी से पहले याचिका दायर कर सकते हैं या मुकदमा चलाने के लिए असहमत हो सकते हैं और अभियोजन पक्ष के लिए एक अच्छा मामला पाया जाता है तो केस वापस लेने की याचिका दायर करने से इनकार कर सकते हैं। निर्णय में यह भी कहा कि लोक अभियोजक असहमत होने की स्थिति में उसे संक्षिप्त विवरणी लौटानी होगी। कहा गया है कि लोक अभियोजक राज्य सरकार के आदेशों पर एक पोस्ट बॉक्स की तरह काम नहीं कर सकता है और उसे निष्पक्ष रूप से कार्य करना होगा, क्योंकि वह न्यायालय का एक अधिकारी भी है। मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी।

गौरतलब है कि कर्नाटक सरकार ने राज्य के गृह मंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली एक उप-समिति के सुझावों पर 31 अगस्त, 2020 को यह निर्णय लिया था। राज्य के पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक, अभियोजन निदेशक और सरकारी मुकदमा और कानून विभाग ने मामलों को वापस लेने के खिलाफ सिफारिश की थी। जिन मामलों को वापस लिया जा रहा था, उनमें राज्य के कानून मंत्री जेसी मधुस्वामी और पर्यटन मंत्री सीटी रवि पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 143 (गैरकानूनी सभा) और 147 (दंगा फैलाना) के तहत आरोप हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on December 23, 2020 4:44 pm

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