Wednesday, December 8, 2021

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छवि बदलने की छटपटाहट

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लेख- मनोज प्रभाकर

अम्बेडकर नगर की एक जनसभा मे बहुजन समाज पार्टी में रहे दो पिछड़े वर्ग के नेताओं राम अचल राजभर और लालजी वर्मा को समाजवादी पार्टी में शामिल कराते हुए अखिलेश यादव 08 नवंबर को कहते है कि “इस बार पिछड़ो का इकलाब होगा” यह साफ करता है कि समाजवादी पार्टी यूपी में गैर यादव पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को पार्टी के साथ लाने के लिए कितने फिक्रमंद है।

जबकि इससे पूर्व पिछड़े वर्ग के महत्वपूर्ण नेता ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से गठबंधन का एलान कर चुके थे। अखिलेश यादव कि यह चिंता अनायास नहीं है।

क्योंकि पिछले कई चुनावो से यह तबका समाजवादी पार्टी से दूर होता चला गया। अब जब बदली हुयी परिस्तिथियों मे उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का मुख्य मुकाबला समाजवादी पार्टी माना जा रहा है तो समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव यूपी की गैर मुस्लिम पिछड़ी जातियों जिनकी आबादी 40 से 45 फीसदी है को पार्टी से जोड़ने की कवायद शुरू कर चुके है।

पिछड़ो के साथ दलितो को सहेजने की कवायद – उत्तरप्रदेश की राजनीति में गैर मुस्लिम पिछड़ो की आबादी जहां 45 फीसदी है। वही दलितों की आबादी 25 फीसदी है। दोनों समुदायों को मिलाकर यह आबादी 70 फीसदी बनती है। यूपी में इन जातियों में जहां अनुसूचित जाति वर्ग में जाटव, चमार जातियों का पिछले कई वर्षो में बहुजन समाज पार्टी को समर्थन रहा है, वही अन्य पिछड़े वर्ग में यादव जाति का समर्थन समाजवादी पार्टी को रहा है। लेकिन उत्तरप्रदेश के चुनाव में जहां ओबीसी में गैर यादव मतदाताओं व दलितों में गैर जाटव मतदाताओं को साधकर पिछले चुनावों में जो भारतीय जनता पार्टी ने आशतीत सफलता पाई है। उससे यूपी के विपक्षी दलों के जातीय समीकरण के सहारे सत्ता में काबिज होने के सपने को धक्का लगा है। यूपी में रही पिछली कई समाजवादी पार्टी की सरकारों में कथित तौर पर यादव जाति को अधिक प्राथमिकता मिलने के आरोपो के साथ – साथ यादव जाति के लोगों की कथित तौर पर दबंग व अपराधी प्रवृत्ति के होने की छवि बनती रही है। जमीनी स्तर पर यादवों और दलित जातियों के बीच संघर्ष होता रहा है। 2012 मे उत्तरप्रदेश मे समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद यादवों को अत्यधिक प्राथमिकता दिए जाने के आरोपो के बीच पिछड़े वर्ग में महत्वपूर्ण मानी जाने वाली गैर यादव पिछड़ी जातियों खासतौर पर कुर्मी, लोधी, मौर्य, राजभर, निषाद जातियों के मतदाता समाजवादी पार्टी से दूर होते चले गए।

समाजवादी पार्टी की ही सरकार के दौरान यूपी लोकसेवा आयोग द्वारा हुयी पीसीएस अधिकारियों की भर्ती के दौरान 70 मे 54 एसडीएम यादव जाति के चयनित होने का भ्रामक दावा यूपी की गैर यादव पिछड़ी जातियों को सपा से दूर करने में अहम रहा।

दरअसल अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को लगता है कि सपा सरकार बनते ही नियुक्तियों से लेकर अहम पदों पर यादव जाति के अफसरों, नेताओं को बैठा दिया जाता है और सत्ता के प्रभाव से संसाधनो पर कब्जा कर अति पिछड़ी जातियों के हको पर डाका डालती है।

हालाकि यूपी की राजनिति में महत्वपूर्ण भूमिका रखने वाली इन गैर यादव पिछड़ी जातियों और  दलित जातियों की भूमिका को ध्यान में रखते हुए अखिलेश यादव की पार्टी ने प्रयास शुरू किए हुए है।

अम्बेडकर नगर की जनसभा में अखिलेश यादव के एक और बयान इसको समझ सकते है जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री कहते है कि “देश को खुशहाली, विकास और सामाजिक समानता के रास्ते पर लाने के लिए डॉ. लोहिया और डॉ. अम्बेडकर के वैचारिक अनुयायियों को एक होना पड़ेगा और इसके लिए उन्होंने प्रयास भी किए थे” उनका इशारा 2019 लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी से समाजवादी पार्टी से हुए गठबंधन को लेकर था जिसको चुनाव बाद बीएसपी द्वारा तोड़ दिया गया था। अखिलेश यादव मायावती द्वारा सपा से गठबंधन तोड़ने को लेकर दलित समाज में भावुक इस्तेमाल कर रहे है और दलित मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में है और इसमे बड़े पैमाने पर सफलता भी पायी है। जब बहुजन समाज पार्टी के परम्परागत मतदाता मानी जाने वाली जाटव समेत अन्य दलित जातियों नेता व कार्यकर्ता 2019 लोकसभा चुनाव से पहले व बाद में जुड़े है जिनमें इन्द्रजीत सरोज, आरके चौधरी, कमलाकांत गौतम, तिलकचन्द्र अहिरवार, बलिहारी बाबु, घूराराम, महेश आर्या, मिठाई लाल भारती, सर्वेश अम्बेडकर, विजय कुमार, महादीन गौतम, सीएल वर्मा, त्रिभुवन दत्त, योगेश वर्मा, विनोद तेजियान, राहुल भारती, रमेश गौतम प्रमुख है।

हाल ही में समाजवादी पार्टी को घोषित 72 सदस्यीय राज्य कमेटी में यादव प्रभाव वाली सपा की छवि से इतर होने की बानगी दिखी।

घोषित कमेटी मे जहां अध्यक्ष उत्तरप्रदेश की ओबीसी (कुर्मी) बिरादरी के नरेश उत्तम पटेल को पुनः बनाया गया है वही बनाए गए तीन महासचिव में निषाद जाति के राजनरायन बिद, गडरिया बिरादरी के श्याम पाल और दलित (जाटव) तिलक चंद्र अहिरवार है। सपा की घोषित 72 सदस्यीय कमेटी में जहां 09 मुसलमान है वही मात्र 04 यादव है।

इस बीच समाजवादी पार्टी ने दलित, पिछड़ी जाति समूहों को साधने को लेकर पहले ही राष्ट्रीय लोकदल, केशव देव मौर्य की पार्टी महान दल व संजय चौहान की जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) से गठबंधन का एलान कर चुके है। वही लोग बताते है कि आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर, अपना दल की कृष्णा पटेल बीएसपी (कांशीराम) की सावित्रीबाई फूले से गठबंधन के संकेत दे चुके है।

ओमप्रकाश राजभर से गठबंधन कर जहां समाजवादी पार्टी ने पूर्वाचल में मजबूती से पाव जमाने की कोशिश की है। पूर्व विधान सभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर के बेटे कमलाकांत राजभर के साथ पिछड़े वर्ग के दो बड़े नेताओं राम अचल राजभर, लालजी वर्मा को साथ मे लेकर एक बड़ा दाव चला है।

बैनर में अब लोहिया के साथ अम्बेडकर और पटेल भी – समाजवादी पार्टी दलित, पिछड़ी जातियों के वैचारिक नायकों को भी अपने पर्चे, पोस्टर, होर्डिंग, बैनर समेत प्रचार सामग्री में जगह देने की शुरुआत की है। अब सपा के बैनर में डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ डॉ. अम्बेडकर और सरदार पटेल समेत जननायक कर्पूरी ठाकुर, चौधरी चरण सिंह को भी जगह मिलनी शुरू हुयी।

समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल जहां पटेल किसान यात्रा को पूरी कर चुके है। वही इन्द्रजीत सरोज जनादेश यात्रा और आरके चौधरी संविधान बचाओ और भाजपा हटाओ यात्रा पर है।

राह नहीं आसान – पिछले कई चुनावो से समाजवादी पार्टी से मोहभंग कर चुके गैर यादव पिछड़ों और दलितों को सपा से जोड़ना अब आसान नहीं रहा है। इसी बीच केन्द्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल पिछड़ों की सशक्त व जनाधार वाली नेता के तौर पर उभरी है। वह फिलहाल भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की सहयोगी है उनका असर मध्य यूपी व पूर्वाचल की प्रभावशाली कुर्मी जाति के वोटरों में सबसे ज्यादा माना जाता है।

पिछड़े वर्ग के ही केशव प्रसाद मौर्य, स्वामी प्रसाद मौर्य, स्वतंत्र देव सिंह, बीएल वर्मा, एसपी बघेल, साध्वी निरंजन ज्योति मजबूती से भाजपा की पैरोकारी कर रहे है।

सपा शासनाकाल में अनुसूचित जातियों के खत्म किए “प्रमोशन में आरक्षण” का जिन्न बार – बार सामने आ ही जाता है।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में रहते हैं।)

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