Monday, January 24, 2022

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राकेश अस्थाना मामले में सुप्रीमकोर्ट तय करेगा कि प्रकाश सिंह फैसला इसमें लागू होगा या नहीं

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उच्चतम न्यायालय तय करेगा कि केंद्र शासित प्रदेशों के आयुक्तों/पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति के मामले में प्रकाश सिंह वाला फैसला लागू होगा या नहीं। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना की दिल्ली पुलिस आयुक्त के तौर पर नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने को मंजूरी दे दी। एनजीओ सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ से कहा कि वह सोमवार तक दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए एक विशेष अनुमति याचिका दायर करेंगे, जिसमें कहा गया है कि दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में अस्थाना की नियुक्ति में कोई अनियमितता नहीं है।

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अस्थाना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने रिट याचिका के लंबित रहने पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही उच्च न्यायालय द्वारा फैसला दिया जा चुका है। उन्होंने कहा कि हालांकि, अदालत हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार कर सकती है।

मामले में संक्षिप्त दलीलें सुनने के बाद पीठ  ने मामले को 26 नवंबर को आगे की सुनवाई के लिए निर्धारित कर दिया। पीठ ने वकील प्रशांत भूषण को केंद्र के वकील के साथ-साथ अस्थाना को भी याचिका की प्रति देने के लिए कहा है, ताकि सुनवाई में देरी की किसी भी संभावना से बचा जा सके।

इससे पहले 12 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने अस्थाना की 31 जुलाई को सेवानिवृत्ति से ठीक पहले 27 जुलाई को दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्ति के खिलाफ याचिका को खारिज कर दिया था। अपने 77 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने कहा था कि हमें प्रतिवादी संख्या 2 (अस्थाना) को अंतर-संवर्ग प्रतिनियुक्ति (इंटर-कैडर डेपुटेशन) प्रदान करने के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता है।

दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस  डी एन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की खंडपीठ ने कहा था कि निर्णयों के उपरोक्त परिप्रेक्ष्य को देखते हुए और लगभग एक दशक से अधिक समय से जारी प्रक्रिया का पालन करते हुए हमें प्रतिवादी संख्या 2 (अस्थाना) की नियुक्ति में प्रतिवादी संख्या 1 (केंद्र) की कार्रवाई में कोई अनियमितता या अवैधता नहीं दिखाई दी है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि केंद्र के पास जनहित में अधिकारियों की अंतर-कैडर प्रतिनियुक्ति करने की शक्ति और अधिकार क्षेत्र है और प्रकाश सिंह मामले में पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू नहीं होंगे। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता- अधिवक्ता सद्रे आलम और अधिवक्ता प्रशांत भूषण के नेतृत्व में एनजीओ सीपीआईएल- हस्तक्षेप का आह्वान करने वाला मामला नहीं बना पाए हैं या वे यह भी प्रदर्शित नहीं कर पाए हैं कि अस्थाना के सेवा करियर में कोई धब्बा है, जो उन्हें पद के लिए अनुपयुक्त बनाता हो।

दरअसल दिल्ली हाईकोर्ट ने राकेश अस्थाना मामले में प्रकाश सिंह और अन्य बनाम भारत संघ के सन्दर्भ  में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों पर कहा कि उक्त दिशा-निर्देश केवल संघ लोक सेवा आयोग द्वारा पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति के लिए जारी किए गए हैं, जो केवल राज्यों पर लागू होते हैं। खंडपीठ ने फैसला सुनाया था कि निर्णय और निर्देशों में एजीएमयूटी कैडर के तहत आने वाले केंद्र शासित प्रदेशों के आयुक्तों/पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति के लिए कोई उल्लेख नहीं है। अब उच्चतम न्यायालय तय करेगा कि केंद्र शासित प्रदेशों के आयुक्तों/पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति के मामले में प्रकाश सिंह वाला फैसला लागू होगा या नहीं।

दिल्ली पुलिस आयुक्त, राकेश अस्थाना 1984-बैच के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। उन्होंने जुलाई 2021 में अंतर-कैडर प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला था। इस सेवानिवृत्ति से चार दिन पहले गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में उनकी नियुक्ति का आदेश जारी किया। इसके लिए उनकी कार्यकाल की शुरू होने की तारीख 31जुलाई 2021 को उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख से एक वर्ष की अवधि के लिए बढ़ा दी गई। मामले में याचिकाकर्ता/हस्तक्षेपकर्ता ने दावा किया कि अस्थाना की नियुक्ति प्रकाश सिंह और अन्य बनाम भारत संघ मामले (I और II दोनों) के सरासर उल्लंघन में की गई।

प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था: 1. राज्य के डीजीपी का चयन राज्य सरकार द्वारा विभाग के तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से किया जाएगा, जिन्हें यूपीएससी द्वारा उनकी सेवा की अवधि, अच्छे रिकॉर्ड और अनुभव की सीमा के आधार पर उस रैंक पर पदोन्नति के लिए पैनल में रखा गया है, जिस पुलिस बल का नेतृत्व कर रहे हैं।

 2. इसके लिए डीजीपी का कम से कम दो साल का कार्यकाल होना चाहिए। चाहे उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख कुछ भी हो। 

3. उक्त पद के लिए यूपीएससी द्वारा अनुशंसित उम्मीदवारों का न्यूनतम शेष छह महीने का कार्यकाल होना चाहिए यानी ऐसे अधिकारी जिनकी सेवानिवृत्ति से पहले कम से कम छह महीने का कार्यकाल शेष हो।

याचिकाकर्ता/हस्तक्षेपकर्ता की दलील थी  कि दिल्ली पुलिस आयुक्त का पद राज्य के डीजीपी के पद के समान है और इसलिए प्रकाश सिंह के मामले में उक्त पद पर नियुक्ति करते समय केंद्र सरकार द्वारा निर्देशों का पालन किया जाना आवश्यक है।यह तर्क दिया गया कि उक्त निर्देशों के उल्लंघन में अस्थाना को यूपीएससी द्वारा पैनल में शामिल किए बिना नियुक्त किया गया। इसके अलावा, उनकी नियुक्ति के समय उनकी छह महीने की सेवा का शेष कार्यकाल नहीं था, क्योंकि वह नियुक्ति के दिन से चार महीने के भीतर सेवानिवृत्त होने वाले थे। इसके अतिरिक्त, यह तर्क दिया गया कि अस्थाना को उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि से परे केवल एक वर्ष की अवधि के लिए नियुक्त किया गया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि नियुक्त व्यक्ति के लिए न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल उपलब्ध होना चाहिए।

उनका यह भी कहना था कि अस्थाना की नियुक्ति यह संकेत देती है कि एजीएमयूटी संवर्ग के अधिकारी पुलिस बल का नेतृत्व करने के लिए सक्षम नहीं हैं और इस प्रकार इस नियुक्ति से उनका मनोबल गिराने वाला प्रभाव पड़ेगा। केंद्र का स्टैंड दूसरी ओर केंद्र ने दावा किया कि यूपीएससी द्वारा पैनल में शामिल करने के लिए प्रकाश सिंह के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी अंतिम निर्देश न्यूनतम कार्यकाल का चयन आदि डीजीपी की नियुक्ति के लिए राज्य पर लागू होते हैं, इसलिए एजीएमयूटी संवर्ग के अंतर्गत आने वाले संघ राज्य क्षेत्र के आयुक्त/पुलिस प्रमुख के पद पर नियुक्ति के लिए कोई आवेदन नहीं है।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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