टीवी डिबेट में गाली-गलौच: यहां भी पीड़ित ही निशाने पर

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रिपब्लिक भारत के टीवी डिबेट में पैशाचिक गाली-गलौच की घटना के बाद हाथरस की घटना याद आ रही है। इसलिए नहीं कि यह सामूहिक बलात्कार की घटना थी, बल्कि इसलिए कि जबरदस्ती रात के अंधेरे में ‘अंतिम संस्कार’  करने से लेकर उल्टे पीड़ित परिवार का ही नार्को टेस्ट कराने की नयी प्रवृत्ति सामने आयी थी। डीएम भी पीड़ित परिवार को ही समझाते नज़र आए थे। यहां तक कि घटना कवर करने पहुंच रहे पत्रकारों पर भी राजद्रोह के मुकदमे डाल दिए गये। देश सोचने को मजबूर है कि सोच कितनी तेजी से बदल रही है! पीड़ित पक्ष में ही ‘गुनहगार’ खोजने की प्रवृत्ति ने हर जगह अपनी पैठ बना ली है।

प्रताड़ित-पीड़ित पैनलिस्ट के तौर पर प्रेम कुमार ने रिपब्लिक टीवी के प्रमुख अर्णब गोस्वामी को चिट्ठी ही तो लिखी जिसका जवाब मिला नहीं। जवाब दूसरे लोगों ने देना शुरू कर दिया और वह भी सवाल पूछकर। “प्रेम कुमार को रिपब्लिक टीवी जाने की जरूरत ही क्यों थी?” “अगर शोहरत की भूख थी, पैसों की भूख थी तो अपमान कौन पीएगा?” “वे रो क्यों रहे हैं?” ऐसी ही कुछेक अन्य प्रतिक्रियाओं की बानगी देखिए…

“मुझे हैरत है कि ऐसे टुच्चे चैनल में आप जाते भी रहे हैं और अब शिकायत भी कर रहे हैं?”

“सड़क छाप एजेंडा पत्रकारिता करने वालों के यहां जाने से पहले सोचना था प्रेम जी!”

“कीचड़ में घुसना, बीजेपी के विरुद्ध या विपक्ष के हक़ में बोलना और यह सोचना कि बेदाग़ निकल आएँगे – नादानी है।“

“निश्चित रूप से वहाँ ठीकठाक पारिश्रमिक मिलता होगा।“

“जो नियमित वेतन नहीं पाते और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ जिनके ऊपर हैं, उनकी मजबूरियाँ मैं समझता हूँ।“

किसी न्यूज़ चैल पर एक पैनलिस्ट के साथ हुई गाली-गलौच एक व्यक्ति के साथ घटी घटना भर नहीं हो सकती। ऐसा भी नहीं है कि यह इस किस्म की पहली या आखिरी घटना हो। प्रश्न पूछे जा सकते हैं कि जब ऐसी ही घटना पहले घटी थी तब प्रेम कुमार कहां थे? मगर, यह सवाल तो अगली घटना के वक्त भी उठेंगे कि प्रेम कुमार के साथ जब घटना घट रही थी तब ‘अगले पीड़ित-प्रताड़ित’ कहां थे? ऐसे प्रश्नों की यही सीमा है। ये प्रश्न पूछे ही जाते हैं जिम्मेदारी से मुकरने के लिए।

अक्सर बलात्कार की पीड़िता से ‘हमदर्द’ पूछते हैं कि वह ‘टुच्चों’ के चंगुल में फंसी ही क्यों? यह सवाल प्रश्नकर्ता को ही बेनकाब करती है कि वह नालायक प्रश्न पूछने के अलावा कुछ कर ही नहीं सकता। देश में कई नामचीन पत्रकार हैं जिनके फॉलोअर्स ट्विटर, यू-ट्यूब, फेसबुक या दूसरे सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर भी लाखों में हैं। काश! ऐसे लोग खुद से पूछ लेते कि दिन-रात गालियां खाकर भी ट्विटर-फेसबुक पर ये क्यों बने रहते हैं? इसमें संदेह नहीं कि ये लोग वैचारिक संघर्ष के योद्धा हैं। लेकिन, ये युद्ध की सीमा क्षेत्र को निर्धारित करते हुए बहुतेरे संघर्ष की अनदेखी कर रहे हैं। ऐसे संघर्ष से जुड़े योद्धाओं को लांछित कर अपने लिए भी लांछन तैयार कर रहे हैं।

टीवी पर एक पैनलिस्ट के तौर पर एक पत्रकार का संघर्ष पहले से ज्यादा मुश्किल हुआ है। सत्ता विरोधी राय रखने वाले को पत्रकार कहा तक नहीं जाता। पक्षकार के रूप में वह रंग दिया जाने लगता है। फिर भी अगर वह विरोध की आवश्यक परंपरा से जुड़े रहने के लिए जुटा रहता है तो इस जीवटता को ‘पैसों का लालच’, ‘पारिवारिक जिम्मेदारी उठाने की मजबूरी’, ‘ठीक-ठाक पारिश्रमिक का लालच’ से जोड़कर छद्म सहानुभूति दिखाने की सोच वास्तव में खुद सहानुभूति के लायक है। ऐसा इसलिए कि इस चश्मे में उन लोगों को कठघरे में खड़े करने का नजरिया नहीं है जो विरोध की आवाज़ दबाने की सुपारी लिए हुए बैठे हैं। मेजर गौरव आर्या जैसे सुपारी किलर को बख्श देना वास्तव में इन आंखों का मोतियाबिंद है।

ऐसे लोग ये मान बैठते हैं कि न्यूज़ चैनल अर्णब गोस्वामी या ऐसे ही लोगों की जागीर है। ऐसी मान्यता में प्रेम कुमारों का सरेआम चीरहरण इन्हें स्वाभाविक लगता है। इतना स्वाभाविक कि बोलने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। ये नहीं जानते या मानते कि ऑटो में बैठने वाली सवारी का भी हक होता है जो ऑटो वाले से कमतर नहीं होता। फिर न्यूज़ चैनल तो भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अनुमति से संविधान सम्मत तरीके से संचालित होने वाला जनसंचार का माध्यम है। इसे किसी की जागीर बनने की छूट कैसे दे दी जाए?

यह न भूलें कि न्यूज़ चैनल की डिबेट में जाने वाला प्रेम कुमार अगर पैसे के लोभ में वहां जाता है तो अर्णब गोस्वामी को खुली चिट्ठी लिखकर उसी लोभ से विरक्ति का भाव भी दिखाता है। गाली-गलौच सुनना प्रेम कुमार के वश में नहीं होता, मगर प्रतिकार करना उसके वश में होता है। वह लाइव टीवी पर भी प्रतिकार करता है और ऑफलाइन भी चिट्ठी लिखता है। इस बेचैनी को समाज के सामने लाता है।

ज्यादातर लोगों ने ‘इज्जत बचाने’ का विकल्प चुन रखा है। ऐसे लोग खुद को निर्लोभी और मशहूर होने की लालसा से दूर बताकर ‘बेइज्जती’ झेल रहे प्रेमकुमारों को और बेइज्जत करने में पर-पीड़ा सुख महसूस करते हैं। मगर, ये भूल रहे हैं कि बेटियां बनकर घरों में कैद होने से ‘इज्जत बचे रहने’ का अहसास भर होता है, वास्तव में ऐसे अपराध और अधिक बढ़ाने के वे जिम्मेदार हैं। इस तरह पैशाचिक प्रवृत्ति से जो लड़ाई है उससे दूर हो जाते हैं ऐसे ‘इज्जतदार’ लोग।

न तो बलात्कार की घटना ‘इज्जत का लुट जाना’ है और न ही किसी पैनलिस्ट पत्रकार से हुई लाइव गाली-गलौच से उसकी प्रतिष्ठा चली जाती है। यह इज्जत या प्रतिष्ठा का प्रश्न ही नहीं है। इज्जत या प्रतिष्ठा से जोड़कर हम पैशाचिक प्रवृत्ति से संघर्ष को, और इसके लिए आवश्यक वैचारिक रूपरेखा को ही कमजोर कर रहे हैं हम। घर बैठ कर ‘इज्जत बचाने’ की मानसिकता से बेहतर है ‘इज्जत लुटाकर’ संघर्ष करना। संघर्ष जब इज्जत से जुड़ जाती है तो हमेशा वह कमजोर हो जाती है।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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